बिहार में गहराया पेयजल संकट, पानी को तरस रहे लोग
पटना। क्या अजीब विडंबना है की मुख्य सचिव के स्तर पर लगातार हो रही समीक्षा के बाबजूद पेयजल संकट गहराता जा रहा है। संकट का यह आलम है कि मनुष्य को तो छोड़िए जानवर भी पानी के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। वहीं संकट का फायदा पानी के कारोबारी उठा रहे हैं।
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मार्च के पहले यहां 15 रुपये गैलन पानी मिलता था, अब वे 40 से 50 रुपये गैलन पानी बेच रहे हैं। राज्य मे 25 प्रतिशत चापाकल ने पानी देना या तो बंद कर दिया है या फिर वे बंद होने के कगार पर हैं। अधिकारी पानी के स्रोतों को दुरुस्त करने का दावा करते हैं, परंतु धरातल पर इसकी समीक्षा होती है तो उनकी पोल खुलने लगती है।
आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारियों के अनुसार राज्य के दक्षिणी भाग के 18 जिले के भूजल में गिरावट मार्च की तुलना में 1 से 5 फीट तक गिरा है। इसमें पटना, नालंदा, जहानाबाद, अरवल, बक्सर, रोहतास, कैमूर, मुंगेर, जमुई, भागलपुर, बांका, गया नवादा, भोजपुर, शाहपुरा एवं लक्खिसराय और औरंगाबाद में गंभीर स्थिति है। उत्तर बिहार के शिवहर, ढाका, सहरसा, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मोतिहारी और वैशाली समेत अन्य 14 जिलों में अंडर ग्राउंड वाटर लेवल एक से पांच फीट नीचे चला गया है।
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सरकार के समक्ष चिंता यह है कि अगर मौसम विभाग का पूर्वानुमान सही साबित हुआ तो फिर क्या होगा। मौसम विभाग ने अपने पूर्वानुमान में कहा है कि 9 मई से लेकर जून के दूसरे सप्ताह तक प्रचंड गर्मी पड़ेगी ।गर्मी की तपिश से पेयजल संकट और गहराने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
बिहार वॉटर क्राइसिस
पानी के संकट से निजात पाने के लिए जो दावे किए जा रहे हैं, उसके अनुसार राज्य में कुल 10,242 राजकीय नलकूप हैं। इसमें मात्र 3,819 चालू हैं। यांत्रिक दोष से 862, विद्युत दोष से 641, संयुक्त दोष से 2665,अन्य दोष से 2,161 यानी कुल 6,645 नलकूप बंद हैं। पिछले सप्ताह मात्र 66 नलकूपों को चालू कराया गया है। वहीं अधिकारियों के दावे पर सरकार को विश्वास नहीं है। लघु जल संसाधन और पीएचडी विभाग से कहा गया है कि जितने भी नलकूप और बंद पड़े चापाकलो को ठीक कराने की सूचना दी जा रही है उसे वेबसाइट पर अपलोड करें ताकि उसका सत्यापन दूसरे स्रोतों से कराया जा सके।
शहरी क्षेत्रों में पानी के संकट को दूर करने के लिए मुख्य सचिव ने प्याऊ खोलने को कहा था। वहीं गंभीर पेयजल संकट वाले इलाके में टैंकर से पानी पहुंचाने को कहा था, लेकिन एक दो जिले को छोड़कर कहीं भी यह व्यवस्था शुरू नहीं हो सका है। ग्रामीण इलाकों में जो भी ग्रामीण जलापूर्ति योजना का निर्माण हुआ था, वह सभी बंद हो गये है। कहीं पाइप है तो कहीं मोटर नहीं तो अगर कहीं दोनों है तो स्टाफ नहीं। अधिकांश योजनाओं में लगे बिजली ट्रांसफार्मर चोरी कर लिए गये है।
पशुपालन विभाग का दावा है कि पेयजल संकट के मध्यनजर 1640 पशु शिविर खोले गए हैं। इनमें 1469 जल स्रोत उपलब्ध कराए गये हैं। परंतु हकीकत कुछ और ही है। इस संकट में सबसे बुरा हाल मवेशियों का है। उत्तरी बिहार में नीलगाय और घोड़परास का आतंक रहा है। आम दिनों में आबादी से दूर निचले इलाकों में उनका बसेरा है, परंतु ताल तलैया सुख जाने से वह पानी के लिए आबादी वाले इलाके में मारे मारे फिर रहे हैं।












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