पाकिस्तान में असली ताक़त किसके पास?
'डॉन लीक्स' का मामला भी कोई कम अहम नहीं है. क्योंकि इससे संसद की सर्वोच्चता, लोकतंत्र के भविष्य और पाकिस्तान के अपने पड़ोसियों से संबंध जा मिलते हैं।
पाकिस्तान में आजकल दो लीक्स ख़ूब चर्चा में हैं. एक 'पनामा लीक्स' का मुद्दा जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी करके फैसला सुरक्षित रखा है और दूसरा 'डॉन लीक्स' का विवाद जो प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के लिए लगातार सिरदर्द बना हुआ है.
'पनामा लीक्स' का ताल्लुक सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के राजनीतिक भविष्य से है.
अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने नवाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़़ फ़ैसला दे दिया कि पनामा लीक्स में सामने आने वाली ऑफशोर कंपनियों और लंदन की जायदादों से इनका ताल्लुक बनता है तो इससे उनके राजनीतिक भविष्य पर बेहद गंभीर परिणाम सामने आएंगे.
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दूसरा, 'डॉन लीक्स' का मामला भी कोई कम अहम नहीं है. क्योंकि इससे संसद की सर्वोच्चता, लोकतंत्र के भविष्य और पाकिस्तान के अपने पड़ोसियों से संबंध जा मिलते हैं.
अंतरराष्ट्रीय बिरादरी
'डॉन लीक्स' का विवाद पिछले साल 6 अक्टूबर को शुरू हुआ जब मुल्क के सबसे बड़े अंग्रेज़ी अखबार 'डॉन' में सुरक्षा सूरतेहाल पर होने वाली एक मीटिंग के बारे में एक ख़बर छपी.
इस ख़बर में कहा गया था कि देश के लोकतांत्रिक नेतृत्व ने फौजी जनरलों को खबरदार किया है कि अगर उन्होंने चरमपंथी संगठनों और उनके नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई न की तो पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अलग-थलग पड़ जाएगा.
ख़बर में जैश-ए-मोहम्मद के लीडर मसूद अज़हर, लश्कर-ए-तयैबा के रहनुमा हाफ़िज़ सईद और हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की बात की गई थी.
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इस ख़बर के छपने के साथ ही सत्ता के गलियारों में खासी हलचल मची. एक तरफ प्रधानमंत्री के प्रवक्ता ने इसे अटकलबाज़ी और गुमराह करने वाला बताते हुए रद्द कर दिया.
सरकार पर दबाव
दूसरी तरफ खबर लिखने वाले डॉन के सीनियर जर्नलिस्ट सायरिल अलमैदा का नाम एक्ज़िट कंट्रोल लिस्ट में डाल दिया.
फौज ने मीटिंग की डीटेल के लीक होने के मामले को बहुत गंभीरता से लिया और सरकार पर दबाव डाला गया कि वह ज़िम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करे.
इस पर सरकार ने पहले तो अखबार के खिलाफ एक कमिटी बनाई और इसकी शुरुआती रिपोर्ट आने पर सूचना मंत्री परवेज़ रशीद को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
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बाद में सरकार ने मामले की आगे की जांच के लिए एक आयोग गठित किया. इस जांच आयोग ने अभी तक अपनी रिपोर्ट जारी नहीं की है.
पाक फौज
'डॉन' अखबार में सुरक्षा मीटिंग के बारे में खबर छपे पांच महीना गुजर चुका है. लेकिन फौज इस मामले में अपने स्टैंड से पीछे हटने को तैयार नज़र नहीं आती है.
आर्मी चीफ जर्नल कमर जावेद बाजवा निजी तौर पर सरकार के प्रति थोड़ा नरम रवैया रखते हैं. लेकिन फौज एक संगठन के तौर पर अपने स्टैंड पर डटी हुई है और वक्त-वक्त पर सरकार का ध्यान इस ओर दिलाती रहती है.
डॉन लीक्स के मामले पर सुस्त सरकारी रवैये पर फौज ने गुरुवार को इसकी याद एक बार फिर से दिलाई.
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जब कोर कमांडरों की मीटिंग में ये मुद्दा उठा. इजलास के बाद जारी होने वाले प्रेस रिलीज में इसका जिक्र किया गया.
पांच मुद्दे
पाकिस्तान के ज्यादातर अखबारों ने 'डॉन लीक्स' के मामले को सुर्खियों में देने से गुरेज किया है.
लेकिन कराची से छपने वाले जमात-ए-इस्लामी के समर्थक अखबार 'उमत' ने इसे लीड स्टोरी से भी ऊपर जगह दी और अपने पाठकों को बताया कि फौज ने हुकूमत को 'डॉन लीक्स' समेत पांच मुद्दों पर चेतावनी दी है.
'उमत' अखबार इससे पहले तीन मार्च को भी अपनी एक खबर में इस बारे में इशारा कर चुका है कि फौज डॉन लीक्स के मामले को अभी तक नहीं भूली है.
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इस विवाद का अगला शिकार पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के सलाहकार तारेक फ़ातमी हो सकते हैं.
वे उस मीटिंग में मौजूद थे जिसकी जानकारी डॉन अखबार को लीक की गई थी.
जैसे-जैसे वक्त गुजर रहा है 'डॉन लीक्स' का मामला एक कसौटी की शक्ल ले रहा है कि पाकिस्तान में अधिकार और ताकत किनके पास हैं- इस्लामाबाद में 'प्राइम मिनिस्टर हाउस' या जुड़वां शहर रावलपिंडी में फौजी हेडक्वॉर्टर के पास.












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