Imran Khan: पाकिस्तान के सामने आगे कुआं पीछे खाई!

पाकिस्तान में इस समय एक तरफ इमरान खान की लोकप्रियता है तो दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना, जो कि अपने सबसे कमजोर दौर में है। पाकिस्तान के लिए यह दोनों ही स्थिति सही नहीं है।

Imran Khan and Pakistan

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की जितनी लोकप्रियता अभी दिख रही है, उतनी शायद ही किसी पाकिस्तानी पीएम की कभी देखी गई हो। उन्हें गिरफ्तार किया गया तो उनके समर्थकों ने उस पाकिस्तानी सेना के खिलाफ हल्ला बोल दिया, जिसके इशारे के बिना वहां सरकारों के कामकाज में पत्ते भी नहीं हिलते हैं।

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लोकप्रियता में इमरान ने सबको पीछे छोड़ा
इमरान खान की लोकप्रियता देखने से एक बात तो तय है कि पहली बार पाकिस्तान में लोकतंत्र इतना मजूबत लग रहा है। पाकिस्तानी राजनीति की परख रखने वाले लोगों का मानना है कि आज चुनाव हो जाए तो इमरान को जीतने से कोई रोक नहीं सकता।

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चुनावों के बात जीत कर लौट सकते हैं इमरान
इमरान आज पाकिस्तानी लोकतंत्र में इतने मजबूत बनकर उभरे हैं कि उनके विरोधी, दुश्मन, आलोचक और यहां तक कि सेना के कमांडर भी उनसे कहीं न कहीं सहमे हुए हैं। उनमें यही मंथन चल रहा है कि अगर चुनाव करवाए गए और उन्हें चुनाव लड़ने का मौका मिला, तो उनकी सत्ता में वापसी निश्चित है और वह भी बड़ी जीत के साथ।

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इमरान की वजह से दोराहे पर पाकिस्तान?
लेकिन, इमरान खान का चुनाव के माध्यम से फिर से सत्ता में आना पाकिस्तानी लोकतंत्र के लिए जितना ही अच्छा होगा, एक देश के रूप में वह पाकिस्तान के लिए उतना ही घातक भी साबित हो सकता है। इसकी खास वजहें हैं, जिसके संकेत अपने कार्यप्रणालियों से इमरान ने खुद ही बार-बार दिए हैं।

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इमरान की वापसी पाकिस्तान के लिए घातक क्यों?
पाकिस्तान में इमरान की लोकप्रियता के पीछे उनके लोकलुभावन सियासी हथकंडे, प्रतिशोध से भरा शासन का तरीका, इस्लामियत की राजनीति, पश्चिम के खिलाफ लोगों की भावनाएं भड़काना (पाकिस्तान के लिए पश्चिमी देश हमेशा से सोने के अंडे देने वाली मुर्गी रहे हैं), जनता के दिमाग में भारत के खिलाफ जहर भरना और आधुनिक अर्थशास्त्र के सिद्धांतों की ऐसी की तैसी करते रहना। यह ऐसी बातें हैं, जिसकी वजह से पाकिस्तान और गर्त में जा सकता है।

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    लोकतंत्र जरूरी है, लेकिन अनुशासन के साथ
    एक लोकतंत्र भी तभी सफल हो सकता है, जब उसमें संवैधानिक संस्थाओं के प्रति कुछ अनुशासन हो, कुछ मर्यादाओं का पालन हो। सरकार को जनता का समर्थन हो, लेकिन सरकार के समर्थक बेलगाम हो जाएं तो फिर वैसा लोकतंत्र किसी आपदा से कम नहीं होगा। यही वजह है कि मौजूदा संकट के दौर में पाकिस्तान के कथित लिबरल और तथाकथित लोकतंत्र के समर्थक भी पाकिस्तानी सेना के साथ खड़े नजर आते हैं।

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    पाकिस्तान की मौजूदा सरकार के प्रति भी विश्वसनीयता का अभाव
    यह भी तथ्य है कि पाकिस्तान की मौजूदा गठबंधन सरकार में न तो 23 करोड़ की आबादी वाले देश का शासन चलाने की विश्वसनीयता दिखाई पड़ती है और न ही देश की अर्थव्यवस्था ही ऐसी है कि कोई उसे संभालने की कोशिश भी कर पाए। पाकिस्तान के बाकी संवैधानिक संस्थान जैसे की न्यायपालिका, चुनाव आयोग, कथित भ्रष्टाचार-निरोधी संस्था नेशनल अकाउंटिबिलिटी ब्यूरो की विश्वसनीयता पहले से ही सवालों के घेरे में रही हैं। ये संस्थाएं वहां लोकतंत्र और राष्ट्र हित की रक्षा करने में नाकाम साबित हुए हैं।

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    बहुत ही कमजोर स्थिति में है पाकिस्तानी सेना
    पाकिस्तान का अपना एक अलग इतिहास रहा है। वहां जब हालात अस्थिरता वाले होते हैं तो पाकिस्तानी सेना सत्ता को सीधे अपने हाथों में ले लेती है। आम दिनों में यह पीछे से उसे चलाने की कोशिश करती आई है। लेकिन, इस समय पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या ये हो चुकी है कि पाकिस्तानी सेना भी अबतक की सबसे कमजोर स्थिति में पहुंच चुकी है। इमरान की गिरफ्तारी के बाद जिस तरह से पाकिस्तानी सेना को निशाना बनाया गया, वह आश्चर्यजनक है।

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    पाकिस्तान के सामने आगे कुआं पीछे खाई!
    इस तरह से पाकिस्तान इस समय ऐसी स्थिति में आ चुका है, जिससे उबरना उसके लिए बहुत ही मुश्किल है। लोकतंत्र बचाने के नाम पर चुनाव होते हैं तो इमरान की वापसी लगभग अवश्यम्भावी है। लेकिन, अगर कमजोर सेना वाले पाकिस्तान में यथास्थिति ज्यादा दिन तक बनी रही तो हालात दिनों-दिन बद से बदतर होने की आशंका है।

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