पर्यावरण को बचा पाएगा एनजीटी का स्वत: संज्ञान का अधिकार?

नई दिल्ली, 21 अक्टूबर। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के पास एनजीटी एक्ट के तहत स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार है. कोर्ट ने यह भी कहा कि एनजीटी के लिए जो भूमिका निर्धारित है, उसमें वह ऐसा नहीं कर सकता कि जब तक कोई उसका दरवाजा न खटखटाए, वह मूकदर्शक बना देखता रहे.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से एनजीटी को मजबूती मिल सकती है

एनजीटी के स्वत: संज्ञान लेने के मसले पर आई अपीलों पर फैसला देते हुए एएम खानविलकर, ऋषिकेश रॉय और सीटी रविकुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट फैसला दे चुका है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के तहत स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार भी आता है और एनजीटी को संविधान के मामले में अनुच्छेद 21 को लागू कराने के लिए संवैधानिक आदेश के तहत स्थापित किया गया है.

एनजीटी भारत की पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी विशेष न्यायिक संस्था है. पर्यावरण से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए इसे साल 2010 में शुरू किया गया था. इसका मुख्यालय दिल्ली में है. नियमों के मुताबिक इसके पास आने वाले पर्यावरण संबंधी हर मुद्दे को छह महीने में निपटाना जरूरी होता है.

एनजीटी मजबूत हुआ

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया है कि एनजीटी एक ट्राइब्यूनल है और कानून का अंग है और इस तरह यह अपनी मर्जी से काम नहीं कर सकता. इसका मतलब है कि इसके पास न्यायिक समीक्षा की शक्ति नहीं है और न ही यह मामलों का स्वत: संज्ञान ले सकता है. जानकार मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से एनजीटी की शक्तियां बढ़ी हैं.

भारत में पानी से जुड़ी समस्याओं बारे में काम करने वाले मंथन अध्ययन केंद्र के संस्थापक श्रीपद धर्माधिकारी कहते हैं, "एनजीटी कोर्ट न होकर एक अधिकरण है, जो सिर्फ कानूनी तर्कों के बजाए किसी पर्यावरणीय मामले पर स्थान और स्थिति की गंभीरता के हिसाब से विचार कर सकता है. ऐसे में स्वत: संज्ञान लेने के अधिकार से बहुत फायदा होगा."

पर्यावरण के लिए लगातार चुनौतियां बढ़ रही हैं

नियुक्तियों में पारदर्शिता जरूरी

ज्यादातर जानकार मानते हैं कि एनजीटी को मिली शक्तियों से तब तक कोई फायदा नहीं होगा, जब तक एनजीटी के सदस्यों के चयन में निष्पक्षता नहीं आती. नियुक्तियों को पारदर्शी बनाना जरूरी है. जानकार यह भी कहते हैं कि एनजीटी में चयन की प्रक्रिया को राजनीतिक दबावों से मुक्त बनाने की जरूरत है. इससे आधी समस्याएं खुद-ब-खुद दूर हो जाएंगी. साथ ही पेशेवर और विशेषज्ञ लोगों को भी इसमें जगह मिलने लगेगी.

श्रीपद धर्माधिकारी भी भविष्य में एनजीटी की भूमिका को लेकर आशावादी हैं. एनजीटी की उपयोगिता का जिक्र करते हुए वह इसके थर्मल पावर प्लांट्स के प्रदूषण पर नियंत्रण, बांधों पर रोक, गोवा के मोपा एयरपोर्ट जैसे फैसलों का उल्लेख करते हैं. हालांकि वह भी अधिकरण में खाली पड़े पदों पर चिंता जताते हैं. उनका कहना है, "समय पर नियुक्तियां होनी चाहिए. एनजीटी को सिर्फ सरकारी विशेषज्ञों से बचने की जरूरत भी है. ज्यादा अच्छा होगा कि एनजीटी में सभी विशेषज्ञ नौकरशाही से ही न नियुक्त किए जाएं बल्कि इसमें पर्यावरण से जुड़े कुछ निजी क्षेत्र और एनजीओ के लोगों को भी जगह दी जाए."

आम जनता का ध्यान रखना जरूरी

लेकिन नेशनल सॉलिड वेस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के संस्थापक और अध्यक्ष डॉ अमिय कुमार साहू वर्तमान एनजीटी को पर्यावरण का संरक्षण कर पाने के मामले में पर्याप्त नहीं मानते. वह कहते हैं, "एनजीटी के सदस्यों में अब भी विशेषज्ञता की कमी है. इसके चलते कई बार फैसले अनुभवहीन होते हैं. एक ऐसे ही फैसले में मैसूर में हर घर में कचरे का इस्तेमाल कर कंपोस्टिंग का आदेश दे दिया गया. ऐसा कुछ भी कर पाना साधारण लोगों के लिए असंभव होता है. हर कोई कंपोस्टिंग को नहीं समझ सकता. इसलिए एनजीटी में ऐसे विशेषज्ञों की जरूरत है, जो आम जनता के हिसाब से सुझाव दे सकें."

श्रीपद धर्माधिकारी यह भी कहते हैं कि राजनीतिक दबाव हमेशा रहते हैं लेकिन एनजीटी के लिए इस तरह नियम बनाने की जरूरत है कि इसके अधिकारी किसी भी दबाव में न आएं. जानकार यह भी मानते हैं कि पहले कई बार ऐसा होता रहा है कि एनजीटी बिल्कुल आखिरी समय पर पहुंचता था, जब पर्यावरण को पर्याप्त नुकसान हो चुका होता था. आशा है कि अब स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार मिलने के बाद एनजीटी ऐसे कई नुकसान को रोक पाने में सफल रहेगा.

Source: DW

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