'आप' का असर राजनीति में फैला सादगी का संक्रमण

Politicians are following Arvind Kejriwal's way
नई दिल्ली | दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की अप्रत्याशित सफलता के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सादगी का संक्रमण दिल्ली से बाहर भी होने लगा है। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, नेताओं ने शासन में सादगी और पारदर्शिता की घोषणाएं की हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि इन घोषणाओं में दम कितना है या कि स्वयं केजरीवाल अपनी बनाई कसौटी पर कितना खरे उतर पाएंगे? केजरीवाल ने चुनाव से पहले और चुनाव बाद भी सुरक्षा, लालबत्ती, बड़े सरकारी बंगले न लेने, तथा आम आदमी की सहभागिता से काम करने जैसी कई घोषणाएं की और उसे अमल में लाने की उन्होंने कोशिश भी की है। इसके बाद उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड आदि राज्यों के मुख्यमंत्रियों में भी केजरीवाल की नकल करने की जैसे होड़ मच गई।

वयोवृद्ध गांधीवादी विचारक रामचंद्र राही इसे राजनीति में अच्छाई, सादगी का संक्रमण मानते हैं। उन्होंने आईएएनएस से कहा, "(अरविंद) केजरीवाल ने एक बुनियादी बात पकड़ी है कि लोकतंत्र को लोक से जुड़ा क्यों नहीं होना चाहिए। केजरीवाल ने राजनीति को एक नई दिशा दी है।" राही कहते हैं, "यह अलग बात है कि हम इसके बहुत दूर तक जाने की संभावना नहीं देखते। लेकिन इस मुहिम ने राजनीति में और राजनीति से बाहर भी कॉरपोरेट को एक झटका तो दिया है, थोड़ी आशा तो जगी है।" राही आगे कहते हैं कि "राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण अगर सादगी का नाटक भी हो रहा है, तो भी हमें आशावान रहना चाहिए, क्योंकि झूठ अक्सर सच के लबादे में आगे बढ़ता है।" राही कहते हैं, "राहुल गांधी हालांकि पहले से कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वे पृष्ठभूमि के कारण मार खा जा रहे हैं। फिर भी उनमें स्वाभाविकता है।"

वरिष्ठ वामपंथी विचारक अजय तिवारी केजरीवाल की सादगी को एक आडंबररहित राजनीति मानते हैं, लेकिन यह भी कि केजरीवाल के भीतर राजनीतक परिवर्तन की इच्छा है। उन्होंने कहा, "केजरीवाल परिवर्तन की बात कर रहे हैं। बाकी लोग इनके आचरण की नकल कर रहे हैं, और जनता को धोखा दे रहे हैं। उनके भीतर परिवर्तन की इच्छा नहीं है।" तिवारी मानते हैं कि "अरविंद की राजनीतिक परिवर्तन की इच्छा के कारण ही उनका आचरण सादगीपूर्ण है। इसी के कारण वह जनता पर नैतिक अनुशासन कर पा रहे हैं, जो गांधी, नेहरू, सुभाष के बाद शायद पहली बार किसी शख्स को नसीब हुआ है।" तिवारी ने कहा, "हालांकि केजरीवाल के पास नैतिकता का जो पक्ष है, वह वामपंथी पहले से कर रहे हैं। माणिक सरकार, वी.एस. अच्युतानंदन आज भी कहीं अधिक सादगी से जी रहे हैं। लेकिन वे उसका लाभ नहीं उठा पाए, क्योंकि वे व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं। वे जनता को अपनी बात नहीं समझा पाए। अरविंद ने व्यवस्था परिवर्तन नहीं, राजनीतिक परिवर्तन की बात की, जो जनता को सीधे दिख रही है, अपील कर रही है।" तिवारी ने स्वीकार किया कि वामपंथियों ने सत्ता का नेतृत्व किया, लेकिन जनता की सहभागिता नहीं की। यदि कम्युनिस्ट ऐसा कर पाते तो वे व्यवस्था परिवर्तन की ओर जाते, लेकिन वे चूक गए।

तिवारी मानते हैं कि "जनता पारंपरिक राजनीति से ऊब गई है, उसमें असाधारण गुस्सा है। उसमें परिवर्तन की इच्छा थी, लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं पता था और केजरीवाल ने जनता की इस इच्छा को मूर्त रूप दिया है। उसे उनका आडंबरविहीन आचरण भा रहा है।" तिवारी यह भी मानते हैं कि अरविंद से बहुत लंबी उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था बदले बगैर उनकी मुहिम बहुत दूर तक नहीं जा पाएगी, और वह व्यवस्था परिवर्तन की बात न करके मौजूदा व्यवस्था को दुरुस्त करने की बात कर रहे हैं।

समाजसेवी व पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह इसे जन उभार मानते हैं। वह कहते हैं कि राजनीति को अपना चोला बदलने को बाध्य होना पड़ा है। टीम अन्ना की कोर समिति के पूर्व सदस्य, मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र हालांकि यह भी मानते हैं कि दिल्ली और दिल्ली के बाहर चली सादगी की हवा में मिलावट ज्यादा है। उन्होंने कहा, "जनता बात समझ रही है और इस मुहिम में शामिल लोग भी समझ रहे हैं। लेकिन फिर भी एक हवा चली है, जिसका रुख सादगी, सहजता, और बराबरी की ओर तो है।"

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