चुनावी माहौल में भी दिल्ली के कई दिग्गजों को कोई पूछने वाला नहीं
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। बीते दिल्ली विधान सभा चुनाव के दौरान बहुत से नेता सुर्खियां बटोर रहे थे। लेकिन, उनमें से बहुत से इस बार या तो सामने नहीं आ रहे या पार्टी ने उन्हें पर्दे के पीछे रहने के लिए ही कह दिया है।

शीला दीक्षित पिछले चुनाव में कांग्रेस की कैंपेन को गति दे रही थीं। वे अपनी सरकार के कामकाज का हिसाब दे रही थीं। अब वे इस चुनाव में कहीं नहीं हैं। वे लगभग राजनीति से रिटायर हो चुकी हैं। उनके खाफ गोल मार्केट से चुनाव लड़ने वाले भाजपा के तेज-तर्राज नेता विजेन्द्र गुप्ता भी इस बार कहीं नहीं हैं।
कहां गए विजेन्द्र गुप्ता
यह बात समझ से परे है कि भाजपा का इतना संभावनाओं से लबरेज नेता को क्या हो गया। क्या उसे पार्टी ने ही शांत कर दिया या फिर वो खुद शांत हो गया। लेकिन, गुप्ता फिलहाल कहीं नहीं दिख रहे। ना तो टीवी की बहसों में और ना ही पार्टी के दफ्तर में। क्या वे इस चुनाव में लडेगें, इस बारे में कोई सही जानकारी नहीं देता।
संदीप दीक्षित नदारद
शीला दीक्षित के सांसद रह चुके पुत्र संदीप दीक्षित भी दिल्ली चुनाव से अपने को दूर किए हुए हैं। वो पार्टी की किसी सभा में नहीं दिखते।
लाइमलाइट में नहीं कई और
पिछले चुनाव में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार डा. हर्षवर्धन इस बार लाइमलाइट में नहीं हैं। वे केन्द्र सरकार में मंत्री हैं। वे बीता लोकसभा चुनाव जीत गए थे चांदनी चौक सीट से। उसके बाद से वे दिल्ली की राजनीति से गायब हैँ। वे कैंपेन में भी नहीं दिख रहे। किरण बेदी के पार्टी में आने के बाद वे फिलहाल कहीं नहीं हैं।
अब कौन पूछे मल्होत्रा-खुराना को
एक दौर में विजय कुमार मल्होत्रा भी दिल्ली भाजपा के शिखर नेता होते थे। पिछले चुनाव में पार्टी ने उन्हें टिकट भी नहीं दिया था। उनके पुत्र तो चुनाव ही हार गए थे ग्रेटर कैलाश से। इस बार वे टिकट मांगते भी नहीं दिख रहे। मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री थे दिल्ली के 1993 में। वे अब लगभघ घर में ही रहते हैं। वो राजनीति से दूर हो चुके हैं।
उधर, एक दौर में दिल्ली कांग्रेस के बड़बोले नेता रामाकांत गोस्वामी को तो पार्टी ने टिकट तक नहीं दिया राजेन्द्र नगर से। वो दिल्ली सरकार में मंत्री भी थे। उनके पिता गोस्वामी गिरधारी लाल बिड़ला मंदिर के मुख्य पुजारी हुआ करते थे एक दौर में। नेहरु परिवार से करीबी घरोपा था उनका।












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