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भारत में दहेज प्रथा पर छिड़ी नई बहस

Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 11 दिसंबर। भारत में महिलाओं ने शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में बहुत प्रगति की है, लेकिन शादियों में दहेज की समस्या बनी हुई है. पिछले दशकों में लगातार नए बने नए कानूनों के बावजूद इसके रोकने में कोई कामयाबी नहीं मिली है. अब सुप्रीम कोर्ट ने दहेज-निरोधक कानून पर पुनर्विचार की भी जरूरत बताई है. देश में शिक्षा के प्रचार-प्रसार और समाज के लगातार आधुनिक होने के बावजूद दहेज प्रथा पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है. दहेज के लिए हत्या और उत्पीड़न के भी हजारों मामले सामने आते रहे हैं. लेकिन साथ ही दहेज निरोधक कानून के दुरुपयोग के मामले भी अक्सर सामने आते हैं. इससे इस कानून पर सवाल उठते रहे हैं.

क्या कहा शीर्ष अदालत ने

शादी-विवाह में दिए-लिए जाने वाले दहेज को लेकर एक लंबे समय से बहस होती आ रही है. दहेज को कुप्रथा बताया जाता है. इसके खिलाफ कड़े कानून भी बनाए गए हैं. लेकिन इन सबके बावजूद शादियों में दहेज के लेनदेन पर रोक नहीं लग पाई है. दहेज जैसी कुप्रथा पर रोक लगाए जाने के मकसद से अधिकारियों को जिम्मेदार बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने इस सप्ताह इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि दहेज एक सामाजिक बुराई है और इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन बदलाव समाज के भीतर से आना चाहिए कि परिवार में शामिल होने वाली महिला के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है और लोग उसके प्रति कितना सम्मान दिखाते हैं. शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाओं की स्थिति पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है. कानून होने के बावजूद दहेज जैसी सामाजिक बुराई के कायम रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने कानून पर फिर विचार करने की जरूरत बताई है.

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सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर याचिका को विधि आयोग के पास भेज दिया और कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उस तरह का कोई उपाय इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के बाहर है, जिसमें अनिवार्य रूप से विधायी सुधारों की आवश्यकता होती है. साबू सेबेस्टियन और अन्य की ओर से यह याचिका दायर की गई थी.

न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना की खंडपीठ ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर मौजूदा कानून के तहत उठाए जाने वाले कदमों पर विचार करने को लेकर बातचीत शुरू की जा सकती है. अदालत की राय में अगर विधि आयोग इस मुद्दे के तमाम पहलुओं पर विचार करे तो उचित होगा. उसका कहना था कि याचिकाकर्ता इस मामले को विधि आयोग के समक्ष उठाने के लिए स्वतंत्र है.

जारी है दहेज प्रथा

भारत में शादी के मौकों पर लेन-देन यानी दहेज की प्रथा आदिकाल से चली आ रही है. पहले यह वधू पक्ष की सहमति से उपहार के तौर पर दिया जाता था. लेकिन हाल के वर्षों में यह एक सौदा और शादी की अनिवार्य शर्त बन गया है. विश्व बैंक ने इसी साल जुलाई में एक अध्ययन में कहा था कि बीते कुछ दशकों में भारत के गांवों में दहेज प्रथा काफ़ी हद तक स्थिर रही है. लेकिन यह जस की तस है.

विश्व बैंक की अर्थशास्त्री एस अनुकृति, निशीथ प्रकाश और सुंगोह क्वोन की टीम ने 1960 से लेकर 2008 के दौरान ग्रामीण इलाके में हुई 40 हजार शादियों के अध्ययन में पाया कि 95 फीसदी शादियों में दहेज दिया गया. बावजूद इसके कि वर्ष 1961 से ही भारत में दहेज को गैर-कानूनी घोषित किया जा चुका है. यह शोध भारत के 17 राज्यों पर आधारित है. इसमें ग्रामीण भारत पर ही ध्यान केंद्रित किया गया है जहां भारत की बहुसंख्यक आबादी रहती है.

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दहेज में परिवार की बचत और आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च होता है. वर्ष 2007 में ग्रामीण भारत में कुल दहेज वार्षिक घरेलू आय का 14 फीसदी था. देश में वर्ष 2008 से लेकर अब तक समाज में काफी बदलाव आए हैं. लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि दहेज के लेन-देन के तौर-तरीकों में अब तक कोई बदलाव देखने को नहीं मिला है. अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि दहेज प्रथा सभी प्रमुख धर्मों में प्रचलित है. दिलचस्प बात यह है कि ईसाई और सिख समुदाय में हिंदुओं और मुसलमानों की तुलना में औसत दहेज में बढ़ोतरी हुई है.

अध्ययन में पाया गया कि दक्षिणी राज्य केरल ने 1970 के दशक से दहेज में वृद्धि दर्ज की गई है और हाल के वर्षों में भी वहां दहेज की औसत सर्वाधिक रही है. यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट में उक्त याचिका केरल में दहेज प्रथा से उपजी भयावह स्थिति के मुद्दे पर ही दायर की गई थी.

दहेज प्रथा की शुरुआत

भारत में दहेज प्रथा कब से शुरू हुई, इस बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है. लेकिन माना जाता है कि यह उत्तर वैदिक काल से ही चल रही है. अथर्ववेद के अनुसार उत्तर वैदिक काल में वहतु के रूप में इस प्रथा का प्रचलन शुरू हुआ जिसका स्वरूप मौजूदा दहेज प्रथा से एकदम अलग था. तब युवती का पिता उसे पति के घर विदा करते समय कुछ तोहफे देता था. लेकिन उसे दहेज नहीं, उपहार माना जाता था. मध्य काल में इस वहतु को स्त्री धन के नाम से पहचान मिलने लगी. इसका स्वरूप भी वहतु के ही समान था. पिता अपनी इच्छा और काबिलियत के अनुरूप धन या तोहफे देकर बेटी को विदा करता था. इसके पीछे सोच यह थी कि जो उपहार वो अपनी बेटी को दे रहा है वह किसी परेशानी में या फिर किसी बुरे समय में उसके और उसके ससुराल वालों के काम आएगा.

मौजूदा दौर में दहेज व्यवस्था एक ऐसी प्रथा का रूप ग्रहण कर चुकी है जिसके तहत युवती के माता-पिता और परिवार वालों का सम्मान दहेज में दिए गए धन-दौलत पर ही निर्भर करता है. सीधे कहें तो दहेज को सामाजिक मान-प्रतिष्ठा से जोड़ दिया गया है. वर-पक्ष भी सरेआम अपने बेटे का सौदा करता है. प्राचीन परंपराओं के नाम पर युवती के परिवार वालों पर दबाव डाल कर उनको प्रताड़ित किया जाता है. इस व्यवस्था ने समाज के सभी वर्गों को अपनी चपेट में ले लिया है.

कानून भी बेअसर

दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए अब तक न जाने कितने नियम-कानून बनाए जा चुके हैं. लेकिन उनमें से कोई भी असरदार साबित नहीं हुआ है. वर्ष 1961 में सबसे पहले दहेज निरोधक कानून अस्तित्व में आया जिसके अनुसार दहेज देना और लेना दोनों ही गैरकानूनी घोषित किए गए. लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका कोई लाभ नहीं मिल पाया. आज भी वर-पक्ष खुलेआम दहेज की मांग करता है. वर्ष 1985 में दहेज निषेध नियमों को तैयार किया गया था. इन नियमों के अनुसार शादी के समय दिए गए उपहारों की एक हस्ताक्षरित सूची बनाकर रखा जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को विधि आयोग के पास भेजते हुए दहेज निरोधक कानून पर पुनर्विचार की जरूरत बताई है. लेकिन सामाजिक संगठनों का कहना है कि महज कानून बनाना इस समस्या का समाधान नहीं है. कई मामलों में इस कानून का दुरुपयोग भी होता रहा है. एक महिला संगठन की संयोजक गीता बनर्जी कहती हैं, "समाज में हर किस्म के लोग हैं. कोई भी कानून तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक उसे समाज का समर्थन नहीं मिले."

एक अन्य संगठन के प्रमुख सुशांत कर कहते हैं, "दहेज आधुनिक समाज के माथे पर कलंक बन चुका है. हैरत की बात यह है कि पढ़े-लिखे लोग भी बेहिचक इसकी मांग करते हैं. इस कलंक को मिटाने के लिए समाज की सोच और नजरिया बदलना जरूरी है. इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिल कर दहेज-विरोधी साक्षरता के प्रचार-प्रसार पर जोर देना चाहिए." उनका कहना है कि इस मामले में कानून और अदालतें ज्यादा कुछ नहीं कर सकतीं. युवा पीढ़ी में जागरूकता पैदा किए बिना यह समस्या लगातार गंभीर होती जाएगी.

Source: DW

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