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नागालैंड में सारे दलों ने मिलकर बनाई सरकार, विपक्ष खत्म

नई दिल्ली, 19 अगस्त। नागालैंड में सत्तारूढ़ पीपल्स डेमोक्रेटिक एलायंस (पीडीए) और मुख्य विपक्षी पार्टी नागा पीपल्स फ्रंट (एनपीएफ) ने सर्वदलीय सरकार- नागालैंड यूनाइटेड गवर्नमेंट की स्थापना के लिए एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं. उनका कहना है कि नागा राजनीतिक समस्या के स्थायी शांतिपूर्ण समाधान के लिए उन्होंने आपसी प्रतिद्वन्द्विता को भुला कर हाथ मिलाने का फैसला किया है.

Provided by Deutsche Welle

एनपीएफ वर्ष 2018 में चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हो गया था. लेकिन साथ ही सवाल उठने लगे हैं कि आखिर विपक्ष-शून्यता की स्थिति पहले से ही उग्रवाद और दूसरी समस्याओं से जूझ रहे राज्य के आम लोगों के हितों के लिए नुकसानदेह तो नहीं साबित होगी.

आम राय से फैसला

इस पूर्वोत्तर राज्य में सर्वदलीय सरकार के गठन का यह दूसरा मौका होगा. इससे पहले वर्ष 2015 में विपक्षी कांग्रेस के आठ विधायकों के सत्तारूढ़ नागा पीपल्स फ्रंट (एनपीएफ) में शामिल होने पर ऐसी सरकार बनी थी.

सत्तारूढ़ पीडीए के घटक दलों - बीजेपी, नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेस पार्टी (एनडीपीपी) और दो निर्दलीय विधायकों ने राजधानी कोहिमा में आयोजित एक बैठक में आम राय से सर्वदलीय सरकार के गठन का फैसला किया.

संसदीय कार्य मंत्री नेबा क्रोनू बताते हैं, "बैठक में प्रमुख विपक्षी पार्टी एनपीएफ को प्रस्तावित नागा यूनाइटेड गवर्नमेंट में शामिल करने की औपचारिकताओं पर विचार-विमर्श कर इस प्रस्ताव को आम राय से स्वीकार कर लिया गया. इस प्रस्ताव पर मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, उप-मुख्यमंत्री यानथूंगो पैट्टन और विपक्ष के नेता टीआर जेलियांग और एनपीएफ और उसके सहयोगी के अध्यक्षों ने हस्ताक्षर किए हैं."

प्रस्ताव में कहा गया है कि नागा राजनीतिक समस्या एक बेहद अहम मुद्दा है जो दशकों से लंबित है. इसके स्थायी और स्वीकार्य राजनीतिक समाधान के लिए ही तमाम दलों ने हाथ मिलाने का फैसला किया है. राज्य की 60 सदस्यीय विधानसभा में एनडीपीपी के 20, बीजेपी के 12 और एनपीएफ के 25 विधायकों के अलावा दो निर्दलीय भी हैं. एक सीट फिलहाल खाली है.

इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाली पार्टियों का कहना है कि राज्य में स्थायी शांति बहाल करने के लिए वे सकारात्मक विचारधारा के साथ नागा शांति प्रक्रिया को बढ़ावा देने का प्रयास करेंगी ताकि इस समस्या का शीघ्र समाधान हो सके.

तमाम राजनीतिक पार्टियों ने नागा संगठनों से आपसी मतभेद भुलाकर राज्य के हित में एकजुट होने की अपील की है. उन्होंने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से बातचीत करने की बात भी कही है.

संदेह भी कई हैं

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सर्वदलीय सरकार के गठन का मकसद तो सराहनीय है लेकिन इसके बनते ही समस्या के स्थायी समाधान का दावा उतना विश्वसनीय नहीं नजर आता.

पहली बात तो यह है कि केंद्र सरकार मुख्य रूप से उग्रवादी संगठनों और खासकर एनएससीए (आई-एम) के साथ ही नागा शांति प्रक्रिया चलाती रही है. दरअसल, राष्ट्रीय संप्रभुता का सवाल ही इस शांति प्रक्रिया में सबसे बड़ा रोड़ा है. एनएससीएन असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नागा-बहुल इलाकों को मिला कर ग्रेटर नागालिम के गठन की मांग करता रहा है.

वर्ष 2015 में फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर के बावजूद अब तक शांति बहाली के लिए कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका है. नागा संगठन अलग झंडे और संविधान की मांग पर अड़े हैं. जानकारों का कहना है कि सर्वदलीय सरकार के गठन के बावजूद स्थानीय राजनीतिक पार्टियां एनएससीएन पर कोई दबाव डालने की हालत में नहीं होंगी. उल्टे कई विधायक चुनाव जीतने के लिए ऐसे संगठनों पर ही निर्भर हैं. इसके अलावा विपक्ष-शून्य होने की स्थिति में राज्य विधानसभा की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं.

विपक्ष का काम सदन में पारित होने वाले कानूनों और तमाम चर्चाओं में आम लोगों के हितों का ख्याल रखते हुए सरकार की जवाबदेही तय करना है. अभी हाल तक विपक्षी एनपीएफ के विधायक कोविड प्रबंधन के मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं. लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ बैठक के बाद सर्वदलीय सरकार की पहल के बाद विपक्ष ने चुप्पी साध ली है.

विधानसभा में भी प्रस्ताव

इससे पहले इस महीने नागालैंड विधानसभा के वर्षाकालीन अधिवेशन के पहले दिन भी सदन में नागालैंड समस्या छाई रही थी. सदन में आम राय से पारित एक प्रस्ताव में नागा राजनीतिक समस्या के शीघ्र समाधान की अपील की गई. प्रस्ताव में तमाम नागा संगठनों से इस दिशा में सामूहिक प्रयास करने की भी अपील की गई. राज्य के सभी सांसदों और विधायकों ने शांति प्रक्रिया तेज करने की दिशा में काम करने और नागा मुद्दे के शीघ्र समाधान के लिए केंद्र पर दबाव बनाने का फैसला किया है.

राज्य में शांति बहाली के मकसद से केंद्र सरकार ने सबसे बड़े उग्रवादी संगठन एनएससीएन (आई-एम) के साथ ठीक 24 साल पहले वर्ष 1997 में युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ्रेमवर्क एग्रीमेंट के प्रारूप पर हस्ताक्षर करने के बाद शांति प्रक्रिया के मंजिल तक पहुंचने की कुछ उम्मीद जरूर पैदा हुई थी लेकिन बावजूद उसके इस प्रक्रिया में अक्सर गतिरोध पैदा होते रहे हैं.

तस्वीरों मेंः क्या होता है विशेष राज्य का दर्जा

केंद्र सरकार ने तीन अगस्त 2015 को एनएससीएन के इसाक मुइवा गुट के साथ एक फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन उसके प्रावधानों को गोपनीय रखा गया था. बाद में वर्ष 2017 में नागा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप जैसे सात विद्रोही गुटों को शांति समझौते में शामिल किए जाने से कुछ नागा संगठनों ने निराशा जताई थी और इसे शांति प्रक्रिया को लंबा खींचने का बहाना बताया था.

कुछ दिनों पहले एनएससीएन ने फ्रेमवर्क समझौते के प्रावधानों को सार्वजनिक करते हुए लंबे अरसे तक शांति प्रक्रिया में मध्यस्थ रहे एन. रवि पर साझा संप्रभुता का हवाला देते हुए मूल समझौते में कुछ लाइनें बदलने का आरोप लगाया था.

एक पर्यवेक्षक सुनील ओ. सिंह कहते हैं, "यह सही है कि शांति पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता. यही बात सरकार की जवाबदेही तय करने पर भी लागू होती है. इस मामले में राज्य में सत्तारूढ़ दलों का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है. यहां अक्सर केंद्र के इशारों पर अपनी सहूलियत के हिसाब गठबंधन बनते-टूटते रहते हैं."

उनका कहना है कि अब इस अतीत को झुठलाने की जिम्मेदारी सर्वदलीय सरकार के कंधों पर होगी. उसके पास ऐसा करने के लिए वर्ष 2023 तक होने वाले अगले चुनाव तक ही समय है.

Source: DW

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