क्या मिल जाएगी भाजपा को महाराष्ट्र की जनता की सहानुभूति
मुंबई। महाराष्ट्र में सत्ता के लिए छटपटा रही भाजपा हर जतन करने को तैयार है। जल्द ही रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाषण देते नजर आएंगे। लेकिन इन सबके बावजूद भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा आलाकमान में कई तरह की आशंकाएं उभर आई हैं। यह आशंकाएं हार या जीत को लेकर हैं।

महाराष्ट्र को लेकर भाजपा में इस तरह की कश्मकश इसलिए वाजिब भी लग रही है क्योंकि एनसीपी-कांग्रेस की सत्ता के सामने शिवसेना के साथ मिलकर भी भाजपा महाराष्ट्र की सत्ता पर कब्जा न कर सकी। इसकी छटपटाहट भाजपा में बेचैनी में तब्दील हुई है।
भाजपा ने न चाहते हुए भी शिवसेना से गठबंधन तोड़ दिया। जिससे नरेंद्र मोदी की हवा को लेकर भाजपा में विश्वास कम होता दिखाई दिया है।
इसका उदाहरण कहा जा सकता है कि हाल ही नितिन गडकरी ने कहा है कि समय की मांग होने पर हम शिवसेना से फिर से दोस्ती करने को तैयार हैं। यानी इसका सीधा अर्थ यह निकाला जा सकता है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अगर भाजपा को किसी समर्थन की जरूरत होती है तो वह शिवसेना से दुबारा गठबंधन कर सरकार बनाएगी।
महाराष्ट्र में गठबंधन का बिखराव क्यों
महाराष्ट्र में गठबंधनों का बिखराव सत्ता की लालसा की वजह से हुआ है। सही मायनों में कहा जाए तो एनसीपी, कांग्रेस हो या शिवसेना, भाजपा यह चारों पार्टियां अपनी जीत को लेकर अपने अंदर एक शंका पाले हुए थीं और हैं। कांग्रेस लोकसभा चुनाव की हार से ही अभी पूरी तरह से नहीं उबर पराई है जिससे महाराष्ट्र चुनाव में कांग्रेस अपनी जीत को लेकर नकारात्मक दिशा में सोच रही है।
तो वहीं भाजपा इतने सालों से कोशिश करने पर भी महाराष्ट्र में सरकार नहीं बना सकी है। जिसके कारण नरेंद्र मोदी को आगे करने पर भी अपनी जीत व हार को लेकर बन रहे समीकरणों पर पूरी तरह से विश्वास नहीं हो रहा था।
दरअसल, निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि एनसीपी, शिवसेना, कांग्रेस, भाजपा मुख्यमंत्री पद के लिए अलग-थलग होकर राजनीति कर रहे हैं। इसे अवसरवाद भी कह सकते हैं। जिसका पलड़ा भारी होगा पार्टियां आपस में उसी के साथ गठबंधन एन वक्त पर कर सकती हैं।












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