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2012 के बाद से नक्सलवाद की राह छोड़ने वाली 12 महिलाओं ने शुरू किया बिजनेस, हर तरफ हो रही है तारीफ

नई दिल्ली, 21 नवंबर। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले की रहने वाली 31 साल की आदिवासी महिला जानकी सुरेंद्र नारुते की कहानी उन युवाओं या भटके हुए लोगों के लिए है जो किसी के द्वारा गुमराह होने के बाद देश के दुश्मन बने हुए हैं। ऐसे लोग जानकी से प्रेरित हो सकते हैं। दरअसल, जानकी 2012 तक नक्सली थी और गढ़चिरौली में अक्सर नक्सली घटनाओं को अंजाम देती थी, लेकिन पुलिस के सामने सरेंडर करने के बाद जानकी मुख्यधारा में लौट आई और सामान्य जीवन जीने की ठानी। आज इतने सालों के बाद जानकी और लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं, क्योंकि आज की तारीख में वो अपना बिजनेस करती हैं।

33 साल की सगुना ने भी 2014 में किया था सरेंडर

33 साल की सगुना ने भी 2014 में किया था सरेंडर

जानकी का कहना है कि उन्हें अब जीवन जीने का एक उद्देश्य मिल गया है। जानकारी अपना बिजनेस करती हैं और अन्य लोगों को भी अपने बिजनेस के जरिए रोजगार देती हैं। ऐसी ही एक और आदिवासी महिला हैं 33 साल की सगुना साईनाथ, जिन्होंने 2014 में सुरक्षाबलों के सामने सरेंडर किया था और आज वो अपना बिजनेस कर रही हैं। सगुना मानती हैं कि पुलिस ने उन्हें जीवन जीने का एक उद्देश्य दिया है। उन्होंने कहा, "जब से मैंने आत्मसमर्पण किया है, तब से बहुत कुछ बदल गया है। मैंने अपना खुद का एक घर बना लिया है। मैं अब एक व्यवसाय कर रही हूं और आखिरकार मुझे पता है कि मुझे जीवन में क्या करना है।"

33 साल की सगुना ने भी 2014 में किया था सरेंडर

33 साल की सगुना ने भी 2014 में किया था सरेंडर

जानकी का कहना है कि उन्हें अब जीवन जीने का एक उद्देश्य मिल गया है। जानकारी अपना बिजनेस करती हैं और अन्य लोगों को भी अपने बिजनेस के जरिए रोजगार देती हैं। ऐसी ही एक और आदिवासी महिला हैं 33 साल की सगुना साईनाथ, जिन्होंने 2014 में सुरक्षाबलों के सामने सरेंडर किया था और आज वो अपना बिजनेस कर रही हैं। सगुना मानती हैं कि पुलिस ने उन्हें जीवन जीने का एक उद्देश्य दिया है। उन्होंने कहा, "जब से मैंने आत्मसमर्पण किया है, तब से बहुत कुछ बदल गया है। मैंने अपना खुद का एक घर बना लिया है। मैं अब एक व्यवसाय कर रही हूं और आखिरकार मुझे पता है कि मुझे जीवन में क्या करना है।"

12 महिलाओं ने शुरू किया बिजनेस

आपको बता दें कि सरेंडर करने वाली 12 महिलाओं ने नक्सलियों के लिए राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त पुनर्वास योजना के तहत अचार, पापड़ और फ्लोर क्लीनर को बनाने की ट्रेनिंग ली थी। वर्धा जिले के महात्मा गांधी ग्रामीण औद्योगीकरण संस्थान ने उन्हें ये ट्रेनिंग दी थी। एक हफ्ते की ट्रेनिंग का ये नतीजा निकलकर सामने आया है कि महिलाएं अब अपने प्रोडक्ट बाजार में बिक्री और सप्लाई के लिए भेज रही हैं।

राज्य सरकार की मदद से शुरू किया बिजनेस

राज्य सरकार की मदद से शुरू किया बिजनेस

इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक, जानकी और सगुना उन 12 महिलाओं में शामिल हैं, जो हाल ही में महाराष्ट्र सरकार की मदद से ट्रेनिंग लेकर एक उद्यमी बनी हैं। इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में इन दोनों महिलाओं ने बताया है कि जब से उन्होंने नक्सलवाद को छोड़ा है, तब से उनकी लाइफ में बहुत बदलाव आ गया है। उन्होंने बताया कि पहले हमे कोई नहीं जानता था, लेकिन पुलिस ने हमारी मदद की और हमें सरकार से ट्रेनिंग दिलवाई और आज हम अपना कारोबार शुरू कर सके हैं।

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