2 साल में 2 बड़े सियासी घमासान: बीजेपी ने तोड़ा महाराष्ट्र का बड़ा विपक्षी मोर्चा

Maharashtra NCP Crisis: महाराष्ट्र में एक बार फिर बड़ा सियासी घमासान देखने को मिला है। इससे पहले साल 2019 में ऐसा ही घटनाक्रम देखा गया था, जब शिवसेना के नेता एकनाथ शिंदे ने पार्टी से बगावत कर बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली थी। और उद्धव ठाकरे को सत्ता से बेखदल कर दिया था।

वहीं अब इस बार शरद पवार की पार्टी एनसीपी में ऐसा हुआ है। शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने पार्टी विधायकों के साथ रविवार को महाराष्ट्र की शिंदे-फडणवीस सरकार को अपना समर्थन दे दिया, जिसके बाद राजभवन में उन्होंने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

Maharashtra NCP Crisis

अजित पवार के अलावा उनकी पार्टी के 8 नेताओं ने मंत्री पद की जिनमें छगन भुजबल, हसन मुश्रीफ, दिलीप वाल्से पाटिल, धनंजय मुंडे, अनिल भाईदास पाटिल, बाबूराव अत्रम, संजय बनसोडे और अदिति तटकरे का नाम शामिल है।

सूत्रों के मुताबिक अजित पवार का दावा है कि उन्हें राज्य विधानसभा में राकांपा के कुल 53 विधायकों में से 40 से अधिक का समर्थन प्राप्त है। अजित पवार ने यह कदम ऐसे वक्त में उठाया, जब हाल ही में राकांपा का कार्यकारी अध्यक्षों को नियुक्त किया गया था।

अजित पवार के बागी तेवर से एक तरफ जहां एनसीपी को बड़ा झटका है। उसी तरह ऐसे में भाजपा-शिवसेना को टक्कर देने वाले महाविकास अघाड़ी गठबंधन को भी बड़ा झटका लगा है। इतना ही नहीं अजित पवार और अन्य नेताओं ने अपने बयान में साफ कहा है कि वह एनसीपी के तौर पर एनडीए सरकार को अपना समर्थन दिया है।

बीजेपी ने दो बार बनाई रणनीति!

महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के विपक्षी गठबंधन को तोड़ने के लिए भाजपा ने पिछले दो वर्षों में दो बार रणनीति बनाई, पहले एकनाथ शिंदे के 40 शिवसेना विधायकों के साथ पार्टी से बाहर आने के ठीक एक साल बाद अब अजित पवार एनसीपी विधायकों को तोड़कर बीजेपी के खेमे में चले गए।

बीजेपी के लिए एमवीए गठबंधन बड़ी मुसीबत

एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार एमवीए गठबंधन को तोड़ना चाहती थी, क्योंकि यह उनके सामने एक बड़ी चुनौती थी। शरद पवार विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अपने ही गुट को एकजुट नहीं रख सके।

भाजपा सूत्रों ने कहा है कि अजित पवार का दावा है कि उन्हें राज्य विधानसभा में राकांपा के कुल 53 विधायकों में से 40 से अधिक का समर्थन प्राप्त है। दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों से बचने के लिए अजीत पवार के पास 36 से अधिक विधायक होने चाहिए।

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