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Maharashtra: किन परिस्थितियों में शरद पवार ने किया था NCP का गठन? भतीजे के चलते धोना पड़ा अपनी पार्टी से हाथ

महाराष्ट्र ही नहीं देश के जाने माने नेता शरद पवार की पहचान जिस नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) से हुआ करती थी, वो पहचान अब उनसे छिन गई है।

पार्टी में अपने ही भतीजे अजित पवार की बगावत और उनके समर्थक विधायकों के अलग होने से ना केवल शरद पवार को बड़ा झटका लगा, बल्कि वे पार्टी पर अपना आधिपत्य भी भतीजे अजित पवार के हाथों गंवा बैठे।

Sharad Pawar NCP

चुनाव आयोग ने पार्टी सिंबल और नाम दोनों अजित पवार खेमे को सौंप दिया है। अब शरद पवार उम्र की इस दहलीज पर एक नई पार्टी के साथ महाराष्ट्र के राजनीतिक तूफान के बीच खड़े हैं। चुनाव आयोग ने उनकी पार्टी को एनसीपी शरदचंद्र पवार नाम दिया है। पवार को इस नई पार्टी को मजबूती देने के लिए नए सिरे से मेहनत करनी होगी।

शरद पवार ने एनसीपी का गठन 1999 में किया था। पार्टी का गठन जिन परिस्थितियों में हुआ वो भी काफी दिलचस्प कहानी है। बहुत कम उम्र में ही राजनीति के अखाड़े में उतरे शरद पवार ने खुद को इस अखाड़े का महाबली साबित कर दिया था। शरद को देख कर कांग्रेस पार्टी बहुत चकित थी। बात 90 के दशक की है। साल 1987 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खुद शरद पवार को कांग्रेस के साथ जुड़ने का निमंत्रण भिजवाया था।

खुद प्रधानमंत्री की ओर से ऐसी पेशकश पाकर शरद पवार मना नहीं कर सके। इससे पहले वे इंदिरा के दौर में भी कांग्रेस पार्टी के नेता हुआ करते थे। लेकिन इंदिरा के आपातकाल के फैसले से नाराज होकर वो पार्टी से अलग हो गए थे। उस दौर में भी उन्होंने अपना दम दिखाते हुए, महाराष्ट्र में जनता पार्टी के सहयोग से सरकार का गठन कर लिया था और खुद सीएम की कुर्सी पर आसीन हुए थे।

हालांकि जब साल 1980 में जब इंदिरा सरकार वापस सत्ता में आईं तब महाराष्ट्र में पवार सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था। इसके बाद शरद पवार ने साल 1983 में एक बड़ा कदम उठाते हुए, एक नए दल 'कांग्रेस पार्टी सोशलिस्ट' का गठन किया था।

राजीव गांधी के बुलावे पर वे 1987 में फिर से कांग्रेस के साथ जुड़ तो गए लेकिन अपनी कुछ शर्तों के साथ। कांग्रेस के साथ दूसरी बार जुड़ते ही महाराष्ट्र के तत्कालीन सीएम रहे शंकर राव चव्हाण की जगह उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया गया था।

1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद, शरद पवार, नरसिम्हा राव और एनडी तिवारी के नाम की चर्चा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर होने लगी। मौका नरसिम्हा राव को मिला और इस तरह से शरद का सुनहरा ख्वाब, ख्वाब ही रह गया।

साल 1998 में शरद का कांग्रेस से मोह भंग हो गया। पीए संगमा और तारिक अनवर की आवाज में आवाज मिलाकर, सोनिया गांधी के कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल खड़े करने लगे। पार्टी ने कार्रवाई की और उन्हें निष्कासित कर दिया गया। जिसके बाद शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी अस्तित्व में आई। हालांकि पार्टी में दो फाड़ के बाद उनकी 24 साल की मेहनत उनके हाथ से निकलकर भतीजे अजित पवार के पास चली गई।

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