महाराष्ट्र में उद्धव अभी से कांग्रेस को दिखाने लगे हैं बीजेपी वाला डर? MVA के सामने रख दी ये शर्त!

Maharashtra Vidhan Sabha Chunav: महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी (MVA) में विधानसभा चुनावों को लेकर अभी से गोटियां सेट होने लगी हैं। लगता है कि उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना (यूबीटी) ने चुनाव से पहले ही कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी को अपनी राजनीतिक पैंतरेबाजी दिखानी शुरू कर दी है।

दरअसल, शिवसेना (यूबीटी) की ओर से अभी से सहयोगी दलों के नेतृत्व को यह संकेत देना शुरू कर दिया गया है कि अगर महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में आता है तो उद्धव ठाकरे ही इसकी अगुवाई करेंगे।

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कांग्रेस को बीजेपी वाला डर दिखाने की कोशिश?
2019 के विधानसभा चुनावों का बाद मुख्यमंत्री बनने के लिए उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना ने भाजपा के साथ गठबंधन में जीतने के बावजूद उससे नाता तोड़ लिया था। फिर वह जिस कांग्रेस और एनसीपी के खिलाफ चुनाव जीतकर आई थी, उसी से हाथ मिला लिया था। इसी की वजह से उद्धव को नवंबर 2019 से जून 2022 तक मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला।

कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी को जता दी गई इच्छा!
शिवसेना (यूबीटी) सुप्रीमो पिछले हफ्ते ही बेटे आदित्य ठाकरे के साथ दिल्ली में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, उनकी मां सोनिया गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मिल आए थे। बाद में उनकी मुलाकात शरद पवार से भी हुई थी। माना जा रहा है कि उद्धव की पार्टी की ओर से तभी सहयोगी दलों के शीर्ष नेताओं के सामने यह मंशा बता दी गई थी।

शिवसेना (यूबीटी) उद्धव को ही देखना चाहती है मुख्यमंत्री उम्मीदवार!
ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक महा विकास अघाड़ी के एक वरिष्ठ नेता ने अपना नाम नहीं जाहिर होने देने की गुजारिश करते हुए बताया, 'तथ्य ये है कि शिवसेना (यूबीटी) उद्धव ठाकरे को भविष्य की एमवीए सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में चाहती है और इसके लिए चुनाव से पहले एक आपसी समझ होनी चाहिए, यह बात कांग्रेस और एनसीपी नेताओं को साफ तौर पर बता दी गई है। सभी सहयोगी नेतृत्व के मसले पर किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए प्रतिबद्ध हैं, ठीक वैसे ही जैसे हम सीट बंटवारे पर सही तरीके से बातचीत के लिए प्रतिबद्ध हैं।'

कांग्रेस और एनसीपी(एससीपी) के सामने बढ़ी चुनौती!
लेकिन, उद्धव के मंसूबे पर पिघलने के लिए कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) किस हद तक तैयार होती है यह सीट बंटवारे के दौरान ही देखने को मिल सकता है। क्योंकि, लोकसभा चुनावों के बाद यह मामला ज्यादा पेचीदा हो गया है। लोकसभा चुनावों में उद्धव ठाकरे की पार्टी गठबंधन में मोल-भाव करने में ज्यादा सफल रही और 48 में से 21 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए। लेकिन, उसके सिर्फ 9 ही उम्मीदवार जीत सके।

वहीं कांग्रेस सिर्फ 17 सीटों पर जीत दर्ज करके 13 सीटें जीती और एनसीपी (एससीपी) मात्र 10 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर 8 सीटों पर विजय हासिल कर ली। इसके बारे में उद्धव की पार्टी की ओर से यह दलील दी जा रही है कि विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे में लोकसभा चुनावों वाला परिणाम पैमाना नहीं हो सकता, क्योंकि वह कई सीटें कम अंतर से हारी है।

उद्धव के दबाव के आगे झुकना है मजबूरी?
एमवीए के कुछ नेताओं ने इशारा किया है कि कांग्रेस चाहती है कि मुख्यमंत्री पद का मसला चुनाव परिणामों के बाद के लिए रखा जाए। लेकिन, गठबंधन का एक तबका यह दलील दे रहा है कि अगर झारखंड में जेएमएम-कांग्रेस और राजद गठबंधन की ओर सीएम का चेहरा हेमंत सोरेन ही हैं तो उस हिसाब से महाराष्ट्र में उद्धव को ही आगे रखना चाहिए।

विपक्षी गठबंधन के ऐसे नेताओं की यह भी दलील है कि महाराष्ट्र में एमवीए के पास उद्धव ठाकरे और शरद पवार ही सबसे बड़े चेहरे हैं और लोकसभा चुनावों में सत्ताधारी महायुति गठबंधन को उन्हीं की वजह से फायदा मिला है। इनका मानना है कि राज्य में कांग्रेस के पास इन दो नेताओं की टक्कर का कोई चेहरा भी नहीं है।

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शायद यही वजह है कि मुख्यमंत्री पद पर अभी से दावा बनाए रखने के लिए शिवसेना-यूबीटी विधानसभा चुनावों में भी सबसे ज्यादा सीटों पर लड़ना चाहती है, चाहे लोकसभा चुनावों में गठबंधन में उसका प्रदर्शन सबसे फीका ही रहा हो।

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