Maharashtra Election: घनसावंगी में शिवसेना के बुलंद हौसले से शरद पवार गुट की हवा हो सकती है टाइट
Maharashtra Assembly Election 2024: महाराष्ट्र के जालना जिले में घनसावंगी निर्वाचन क्षेत्र एक महत्वपूर्ण चुनावी रण है। इस क्षेत्र में ही अंतरावाली सरती गांव है, जो मराठा आरक्षण आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इस निर्वाचन क्षेत्र में घनसांगवी तालुका, अंबाड और जालना जिले के कुछ हिस्से शामिल हैं। वर्तमान में, शरद पवार का एनसीपी का यहां दबदबा है, जहां राजेश टोपे अपने पांचवें कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।
पिछले चुनाव में राजेश टोपे को शिवसेना के हिकमत उधान से कड़ी चुनौती मिली थी, जो अभी एकनाथ शिंदे के साथ हैं। टोपे महज साढ़े तीन हजार वोटों से जीत गए थे। लेकिन, इस बार एनसीपी में मतभेद के कारण समीकरण बदल गए हैं, जिससे टोपे के लिए मुकाबला चुनौतीपूर्ण हो गया है।

मराठा आंदोलन का प्रभाव
मनोज जरांगे पाटिल की गतिविधियों का केंद्र अंतरावली-सरती गांव इसी निर्वाचन क्षेत्र में आता है। हालांकि जरांगे पाटिल को भाजपा का विरोधी माना जाता है, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि हाल के घटनाक्रम से यह धारणा बदल सकती है। भाजपा और महायुति ने मराठों के लिए अलग से आरक्षण और अन्य पहलों का भरोसा दिया है।
देवेंद्र फडणवीस की आलोचना करने के बावजूद मनोज जरांगे पाटिल ने एकनाथ शिंदे के बारे में सकारात्मक बातें कही हैं। खास बात यह है कि उन्होंने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का सार्वजनिक रूप से विरोध नहीं किया है। इससे घनसावंगी में मतदाताओं की भावना प्रभावित हो सकती है, जहां मराठा मतदाता प्रमुख हैं।
कई प्रत्याशियों की मौजूदगी से दिलचस्प है समीकरण
राजेश टोपे और हिकमत उधान के अलावा, निर्दलीय उम्मीदवार सतीश घाटगे भी मैदान में हैं। वंचित बहुजन अघाड़ी से शिवाजी चोथे और कावेरी खटके भी चुनाव लड़ रहे हैं। कई उम्मीदवारों की मौजूदगी इस चुनाव को और दिलचस्प बना रही है।
शिंदे की शिवसेना की ओर से यहां उम्मीदवार उतारने के फैसले से पता चलता है कि मनोज जरांगे का प्रभाव महायुति के खिलाफ नहीं होगा, जैसी कि उम्मीद थी। मराठा मतदाताओं की बहुलता के कारण उनकी प्राथमिकताएं नतीजों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती हैं।
घनसावंगी में यह चुनाव कई कारकों के कारण अप्रत्याशित होता जा रहा है। एनसीपी के भीतर आंतरिक विभाजन और मनोज जरांगे पाटिल के रुख ने इस चुनावी लड़ाई में कई तरह की पेचीदगियां पैदा हुई हैं।
घनसावंगी विधानसभा क्षेत्र में चुनावी माहौल गर्म हो रहा है, क्योंकि शिवसेना शिंदे गुट के डॉ. हिकमत उधान का प्रभाव स्पष्ट दिख रहा है।
राजेश टोपे के लिए चुनौतियां
राजेश टोपे को घनसावंगी में मुश्किल राजनीतिक समीकरण की वजह से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। ऐतिहासिक रूप से, बहुकोणीय मुकाबलों में उन्हें फायदा मिला है, लेकिन इस बार वोटों का विभाजन समस्या पैदा कर सकता है। शिवसेना शिंदे गुट को मराठा मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है, जबकि ओबीसी मतदाताओं पर भाजपा का बहुत अच्छा प्रभाव है। जातियों का यह समीकरण हिकमत उधान को लाभ पहुंचा सकता है।
जालना जिले में भाजपा का प्रभाव
महायुति की ओर से शुरू की गई व्यापक विकास परियोजनाओं के कारण भाजपा ने जालना जिले में अपनी मजबूत उपस्थिति स्थापित की है। पार्टी के पास भोकरदन, बदनापुर और परतुर तालुकों में विधायक हैं और घनसांगवी और जालना तालुकों में इसका काफी प्रभाव है। कई सरकारी योजनाओं ने यहां हजारों लोगों को लाभान्वित किया है, जिससे भाजपा का प्रभाव और मजबूत हुआ है।
भाजपा नेताओं के विकास कार्य
वरिष्ठ भाजपा नेता रावसाहेब दानवे और अन्य विधायकों ने पिछले कुछ सालों में घनसावंगी और उसके आस-पास के इलाकों में करोड़ों रुपए की विकास परियोजनाएं क्रियान्वित की हैं। इससे भाजपा और शिंदे गुट की स्थिति मजबूत हुई है, जो कभी शरद पवार का गढ़ हुआ करता था। नतीजतन, डॉ. उधान आगामी विधानसभा चुनावों के लिए मजबूत नजर आ रहे हैं।
निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दे: गन्ना और बुनियादी ढांचा
इस निर्वाचन क्षेत्र में गन्ना और उसका मूल्य निर्धारण मुख्य मुद्दे बने हुए हैं। दोनों प्रमुख उम्मीदवार चीनी मिलों से जुड़े हैं, जिससे राजेश टोपे के लिए गन्ना मूल्य एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। उनके लंबे कार्यकाल के बावजूद, सड़कों जैसी बुनियादी संरचना अविकसित रही है, जिसे महायुति अपने अभियान के दौरान उजागर कर रहा है।
राजेश टोपे की आलोचना पिछले 25 सालों में इन लगातार मुद्दों को संबोधित न करने के लिए की जाती है। जैसे-जैसे चुनाव अभियान तेज होते जा रहे हैं, ये अनसुलझे मुद्दे उनके विरोधियों के लिए उनके खिलाफ इस्तेमाल करने के केंद्र बिंदु बनते जा रहे हैं। आने वाले चुनाव इस बात की गवाही देंगे कि क्या ये मुद्दे घनसावंगी की राजनीति में मतदाताओं की भावनाओं को प्रभावित कर सकती हैं।












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