Maharashtra Chunav: महायुति के 'बाहुबली' बनने के क्या है कारण? अंदर ही अंदर निपट गई महाअघाड़ी, जानें सारी वजह?
Maharashtra Elections Mahayuti Factor: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी नीत गठबंधन महायुति ने एक तरफ जीत हासिल करते हुए बहुमत के आंकड़े को भी पार कर लिया है। बीजेपी 130, शिंदे शिवसेना 55 और अजित पवार की एनसीपी 40 सीटों पर आगे चल रही है। ऐसे में एक बार फिर महाराष्ट्र में महायुति की सरकार बनने जा रही है।
हालांकि ये रुझान चौंकाने वाले हैं, क्योंकि इस बार महायुति ने जिस तरह का प्रदर्शन किया है, उसकी किसी को भी उम्मीद नहीं थी। ऐसे में जानिए वो कौन से कारण थे, जिससे एक बार फिर बीजेपी और एकनाथ शिंदे 'किंगमेकर' बनकर उभरे हैं।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों ने एक बार फिर महायुति गठबंधन की ताकत को उजागर किया है, जो सरकार बनाने के लिए तैयार है। उनकी जीत का पैमाना अप्रत्याशित था, जो अधिकांश एग्जिट पोल की भविष्यवाणियों से भी आगे निकल गया। भाजपा, शिंदे की शिवसेना और अजित पवार का एकजुट अभियान महा विकास अघाड़ी (एमवीए) से बिल्कुल अलग था।
महायुति की सफलता के बड़े फैक्टर
सबसे अहम कारण महायुति की अपनी योजनाओं को जनता तक प्रभावी ढंग से लागू करने की क्षमता थी। इसके विपरीत महाविकास अघाड़ी (एमवीए) आंतरिक संघर्षों से जूझता रहा और उसके पास एकजुट संदेश का अभाव था। चुनाव प्रचार के दौरान भी, एमवीए के भीतर नेतृत्व पद सहित सीएम फेस को लेकर विवाद जारी रहा।
प्रभावशाली अभियान रणनीतियां
महायुति के अभियान में विज्ञापनों और भाषणों में एकजुटता की झलक देखने को मिली, जिससे आरोपों का जवाब देने और उनकी छवि को मजबूत करने में मदद मिली। लड़की बहन योजना जैसी उनकी योजनाओं का महिला मतदाताओं पर खासा प्रभाव पड़ा, जिसने उनकी सफलता में अहम योगदान दिया।
गेमचेंजर साबित हुई लाडकी बहिन योजना
महायुति सरकार चुनाव से पहले लाडकी बहिन योजना लेकर आई, जो अब नतीजों में गेमचेंजर साबित हुई है। यह योजना महिलाओं की पसंदीदा बन गईं, जिसका असर नतीजों में साफ दिखाई दिया, महिला वोटर्स के बीच बीजेपी और शिवसेना पहली पसंद बन गई।
इसके विपरीत एमवीए के घोषणापत्र में महायुति की नीतियों को दर्शाया गया, लेकिन कोई अलग दृष्टिकोण नहीं दिया गया। इस तरह से मतदाता आकर्षित नहीं हो पाए। इसके अलावा, सोयाबीन और कपास संकट जैसे कृषि मुद्दों की अनदेखी करने से ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष पैदा हुआ।
एमवीए के छूटे मौके
एमवीए ने मालवन मूर्ति विवाद और बदलापुर बलात्कार मामले जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी नजरअंदाज कर दिया। इन चूकों ने उनकी स्थिति को और कमजोर कर दिया। मतदाताओं ने मौजूदा सरकार की स्थिरता की तुलना में एमवीए के भीतर संभावित अस्थिरता को महसूस किया।
इसके अलावा भाजपा की चुनावी गलतियों और भ्रामक विज्ञापनों पर कांग्रेस की उदासीन प्रतिक्रिया ने एमवीए की विश्वसनीयता को कम कर दिया। उद्धव ठाकरे की रक्षात्मक रणनीति के कारण उनकी पार्टी के प्रति जनता की सहानुभूति कम हो गई।
एमवीए के लिए एक और झटका यह था कि वे आदिवासी, दलित, मुस्लिम और कुनबी समुदायों का समर्थन बनाए रखने में असमर्थ थे। छोटी पार्टियों और बागी उम्मीदवारों ने सारा खेल बिगाड़ दिया।












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