Maharashtra Election 2024: इलेक्शन मैनेजमेंट कंपनियां कैसे उम्मीदवारों की कर रही हैं मदद? कितना हो रहा है खर्च
Maharashtra Election 2024: चुनाव अभियान अब बहुत ही पेशेवर बन चुका है। यह सिर्फ बड़े नेताओं की रैली, रोडशो या जनसभाओं से ही तय नहीं होता। इसकी जिम्मेदारी अब मैनेजमेंट कंपनियां अपने कंधों पर उठा रही हैं। अब चुनाव अभियान इतना प्रोफेशनल हो चुका है कि हो सकता है कि एक ही मैनेजमेंट कंपनी कई अलग-अलग दलों या प्रत्याशियों के लिए चुनाव प्रचार को अंजाम देने में लगी हुई हों।
जाहिर है कि प्रोफेशनल कंपनियां प्रत्याशियों के चुनाव अभियान का जिम्मा संभाल रही हैं तो इसके लिए वह फीस भी वसूलती हैं, जो लाखों में जा रही है। इलेक्शन मैनेजमेंट कंपनियां प्रत्याशियों के लिए मतदाताओं से फीड-बैक जुटाने के साथ उनके लिए डॉक्यूमेंटरी भी तैयार कर रही हैं, उनका सोशल मीडिया भी हैंडल करती हैं और साथ ही साथ पूरे चुनाव अभियान के लिए रणनीतियां भी तैयार कर रही हैं और उसमें समय के साथ जरूरी बदलाव भी करती हैं।

महाराष्ट्र में एक कंपनी कई उम्मीदवारों के लिए कर रही हैं काम
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक चाणक्य नाम की एक इलेक्शन मैनेजमेंट कंपनी चलाने वाले राम भोजाने इस समय महाराष्ट्र में लगभग 43 अलग-अलग उम्मीदवारों की चुनाव प्रचार में मदद कर रही है, उनके लिए रणनीतियां सेट कर रही है।
चुनाव अभियान में टेक्नोलॉजी का होने लगा भरपूर इस्तेमाल
राम भोजाने के मुताबिक, 'इस बार का चुनाव बहुत ही जटिल है। हम टेक्नोलॉजी के साथ-साथ जमीनी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि उम्मीदवारों को वोटरों के बारे में जानकारी मिल सके और वे उनके साथ जुड़ सकें। हमारी यूएसपी घर-घर जाकर सर्वे करना है, जिससे उम्मीदवार को बहुत ही संतुलित रिपोर्ट देने में मदद मिलती है।'
ये तमाम इलेक्शन एजेंसियां प्रत्याशी-विशेष के लिए अभियान चलाती हैं और उनका उनके दलों से कोई लेना-देना नहीं होता। वैसे बड़ी-बड़ी पार्टियों के पास इन कार्यों के लिए अपना पूरा तंत्र खुद रहता है, जो व्यापक तौर पर अपने दल के चुनाव अभियानों को हैंडल करता है।
प्रत्याशियों के लिए गाइड का रोल निभा रही हैं मैनेजमेंट एजेंसियां
इलेक्शन मैनेजमेंट एजेंसियों इतने सूक्ष्म स्तर पर प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी संभाली रहती हैं कि वह अपने क्लाइंट को इस बात में भी सहायता करती हैं कि कब उन्हें रक्षात्मक अंदाज में अपना चुनाव अभियान आगे बढ़ाना है और कब प्रतिद्वंद्वियों पर आक्रामक हो जाना है।
आचार्य इलेक्शन मैनेजमेंट कंपनी पश्चिम महाराष्ट्र, मुंबई, कोंकण और मराठवाड़ा में 10 उम्मीदवारों के लिए काम कर रही है। इसके संस्थापक सचिन खुसपे का कहना है कि वे अपने क्लाइंट का सोशल मीडिया भी देख रहे हैं और उनके लिए चुनावी रणनीतियां भी तैयार कर रहे हैं।
इलेक्शन मैनेजमेंट एजेंसियां कैसे करती हैं काम?
उनका कहना है, 'पिछले 2-3 दिनों में अभियान तेज हो गया है। हम पहले प्रत्याशी के लिए ओपिनियन पोल करवाते हैं और फिर रिसर्च आधारित रिपोर्ट तैयार करते हैं, ताकि ट्रेंड का पता चल सके। इसके हिसाब से सोशल मीडिया स्ट्रैटजी तैयार की जाती है। हम प्रत्येक उम्मीदवार के लिए 8 से 10 सोशल मीडिया अकाउंट तैयार करते हैं, जसमें यूट्यूब, ट्विटर, फेसबुक,इंस्टाग्राम के अलावा फैन पेज भी शामिल होते हैं।' इनकी कंपनी मध्य प्रदेश और कर्नाटक के चुनावों में भी उम्मीदवारों के लिए काम कर चुकी है।
ऐसी इलेक्शन मैनेजमेंट कंपनियां हाल में हुए हरियाणा विधानसभा चुनावों में भी अपनी भूमिका निभा चुकी हैं। इन्हीं में से दिल्ली की एक स्टार प्रचारक नाम की एजेंसी भी शामिल है। जिसने कई उम्मीदवारों के लिए चुनावी योजनाएं तैयार की थीं। इसबार यह कंपनी महाराष्ट्र और झारखंड में भी उम्मीदवारों से उनकी सहायता के लिए बातचीत कर रही हैं।
जमीन पर टीम उतारकर भी फीडबैक जुटाने में करती हैं मदद
स्टार प्रचारक के संस्थापक बृजभान सिंह राठौड़ का कहना है, 'हम उम्मीदवारों को स्थानीय मुद्दे उठाने में उनकी मदद करते हैं, जानकारियां जुटाने के लिए अपनी टीम को जमीन पर भेजते हैं और जो भी फीडबैक मिलता है, उसे प्रत्याशियों के साथ साझा करते हैं।'
चुनाव अभियान के लिए लाखों में आता है इलेक्शन मैनेजमेंट एजेंसियों का बिल
लेकिन, पेशेवर चुनावी एजेंसियों को ठेका देना उम्मीदवारों के लिए कोई सस्ता सौदा नहीं है। इस काम के लिए एक-एक उम्मीदवार को 30 लाख रुपए से भी ज्यादा खर्च करने पड़ जाते हैं। मतदाताओं तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया अपने-आप में ही बहुत बड़ा टूल बन चुका है। इसके माध्यम से ये कंपनियां मतदाताओं के एक वर्ग में आसानी से अपने क्लाइंट की बातों को पहुंचाने में सफल हो जाते हैं।
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इस तरह से अब चुनाव की पूरी प्रक्रिया ही अपनी पारंपरिक तकनीकों से अलह होते जा रही है। टेक्नोलॉजी के बेहतर इस्तेमाल से उम्मीदवारों को अपनी रणनीति सुधारने में ज्यादा आसानी रहती है। लेकिन, इतना तय है कि चुनाव परिणाम आखिरकर वोटर ही तय करते हैं और वह ईवीएम पर किस सोच के साथ बटन दबाकर आते हैं, इसका सही अंदाजा लगा पाने में कई बार बड़े से बड़े धुरंधर भी फेल हो जाते हैं।












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