क्या महाराष्ट्र में उद्धव सरकार का असली संकट शुरू है ? शिवसेना के लिए आगे कुआं-पीछे खाई!
मुंबई, 15 नवंबर: त्रिपुरा की घटना पर महाराष्ट्र के तीन शहरों में पिछले दिनों जो बवाल हुआ है, वह प्रदेश की गठबंधन सरकार की सबसे बड़ी घटक शिवसेना के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। अगले साल फरवरी में बीएमसी के चुनाव होने हैं और उसमें जीत और हार उद्धव ठाकरे की पार्टी का भविष्य तय कर सकता है। लेकिन, पार्टी के लिए संकट ये है कि वह हाल में हुई हिंसा की घटनाओं पर अपना स्वाभाविक स्टैंड नहीं ले पा रही है और भाजपा उसकी इस समस्या को बखूबी जानती है। मुख्य विपक्षी पार्टी ने हिंसा की घटनाओं को लेकर जिस तरह से महा विकास अघाड़ी (एमवीए )सरकार को घेरना शुरू किया है, उससे शिवसेना की चुनावी परेशानी बढ़ने की आशंका है।

शिवसेना के लिए आगे कुआं-पीछे खाई!
हाल में जिस तरह से त्रिपुरा में सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिशें हुई हैं, उसके बाद उत्तर-पूर्व का वह राज्य तो शांत हो रहा है, लेकिन पश्चिम में महाराष्ट्र के कुछ शहरों में इस मुद्दे को भड़काने की कोशिशें जरूर शुरू हो गई लगती हैं। अमरावती, मालेगांव और नांदेड़ में त्रिपुरा के नाम पर माहौल बिगड़ गया। महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की गठबंधन सरकार सत्ता में हैं और बीजेपी विपक्ष में है। वहां जो सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा हुई है, उससे सही मायने में सियासी तौर पर शिवसेना के लिए संकट बढ़ती नजर आ रही है। क्योंकि, बाकी दोनों सत्ताधारी दलों की लाइन स्पष्ट रहने वाली है। लेकिन, उद्धव ठाकरे की पार्टी के लिए आगे कुआं और पीछे खाई वाली नौबत बनती लग रही है!

'अपने पिता बाल ठाकरे से सबक लें उद्धव'
दरअसल, बीजेपी ने अमरावती में हुए एक प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा को हिंदू समुदाय की 'स्वत: प्रतिक्रिया' बताते हुए कहा है कि यह संकेत है कि 'हिंदू अब मार नहीं खाएगा।' पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने इसको धमकी नहीं, सच्चाई बताया है। पाटिल ने उद्धव ठाकरे की सरकार को 'रीढ़विहीन' करार देते हुए आरोप लगाया है कि महा विकास अघाड़ी की सरकार शुक्रवार के दंगों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है। उन्होंने सीएम उद्धव ठाकरे से कहा है कि उन्हें शिवसेना के संस्थापक और अपने पिता बाल ठाकरे से सबक लेनी चाहिए।

बीएमसी चुनाव से पहले 1993 का मामला उठाया
बीजेपी जो लाइन ले रही है, वह शिवसेना के लिए संकट की शरुआत इसलिए हो सकती है, क्योंकि अगले साल फरवरी में देश के कुछ छोटे राज्यों से भी बड़े बजट वाली बीएमसी का चुनाव होना है, जो कि राजनीतिक तौर पर शिवसेना के लिए जीवन-मरण जैसा होता है। 227 सीटों वाली बीएमसी पर अभी भी वही काबिज है। भाजपा ने पिछले चुनाव में भी वहां शिवसेना को जोरदार टक्कर दिया था और अब उसे हालिया हिंसा में उसके खिलाफ नया हथियार नजर आ रहा है। पाटिल की लाइन पर गौर कीजिएगा। उन्होंने कहा है, 'यदि 1993 के मुंबई दंगों के दौरान बालासाहेब ठाकरे ने समझौते वाला स्टैंड लिया होता तो आज मुंबई में हिंदू जिंदा नहीं होते। आज उनके वंशज अमरावती, नांदेड़ और मालेगांव हिंसा के बारे में नहीं बोलेंगे।'

प्रदेश सरकार को अस्थिर करने की साजिश- शिवसेना
जाहिर है कि शिवसेना आज अगर एनसीपी और कांग्रेस के साथ नहीं होती तो उसके लिए हिंसा की घटनाओं में अपनी लाइन लेने में कोई परेशानी नहीं होती। बीजेपी उसकी दुखती रग को समझती है। शिवसेना ने इस मसले पर महा विकास अघाड़ी सरकार का पक्ष रखने के लिए फिर से संजय राउत को बढ़ाया है और उन्होंने अमरावती की घटनाओं को 'साजिश' बताते हुए, बिना नाम लिए भाजपा पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि 'पहले बांग्लादेश में हिंसा होती है और फिर उसके बाद त्रिपुरा में हिंसा होती है। उसके खिलाफ प्रदर्शन में अमरावती में हिंसा हो जाती है। यूपी, बिहार, दिल्ला या कर्नाटक में हिंसा क्यों नहीं हुई ? प्रदेश सरकार को अस्थिर करने की बड़ी गहरी साजिश शामिल है।'

त्रिपुरा के मुद्दे पर महाराष्ट्र में हिंसा
गौरतलब है कि गृह मंत्रालय पहले ही सोशल मीडिया पर चली त्रिपुरा के गोमती जिले में मस्जिद को नुकसान पहुंचने वाली खबरों को फर्जी बता चुका है। लेकिन, तथ्य ये है कि उसके बाद महाराष्ट्र के तीन शहरों में हिंसा हुई है, जो कि शुक्रवार को उन्हीं घटनाओं के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों के बाद शुरू हुई थी। ऐसे में प्रदेश में सत्ता में होने के नाते हिंसा रोकने की जिम्मेदारी उद्धव सरकार की है, लेकिन वह सिर्फ विपक्ष पर वो भी इशारों में आरोप लगा रही है। भाजपा को शिवसेना की इसी दुविधा में फायदा नजर आ रहा है। हिंदुओं को निशाना बनाने के बीजेपी के दावों को शिवसेना मजाक में उड़ाने की कोशिश कर रही है।
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