Bombay HC Drama: कोर्ट के फरमान के बावजूद पिता के साथ जाने से 11 साल के बच्चे का इनकार, जानिए पूरा मामला
बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश मानने से इनकार करना नाफरमानी यानी अवमानना हो सकती है, लेकिन 11 साल के एक बच्चे ने पिता के साथ जाने से इनकार कर दिया, जिसके बाद कोर्ट परिसर नाटकीय घटनाक्रम का साक्षी बना।

Bombay HC Drama: इंसाफ का मंदिर कहे जाने वाले अदालत में उस समय नाटकीय दृश्य पैदा हो गया, जब बच्चा पिता की पकड़ से मुक्त होकर हाईकोर्ट परिसर में वापस लौट गया। 11 साल के इस बच्चे ने उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद पिता के साथ जाने से इनकार कर दिया। पिता हाईकोर्ट के ऑर्डर के बाद बच्चे को अपने साथ ले जाने का प्रयास कर रहा था।
बॉम्बे हाईकोर्ट परिसर के इस नाटकीय नजारे के बारे में बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार बच्चे की मां के पक्ष से कोर्ट परिसर पहुंचे रिश्तेदारों और पिता के बीच हाथापाई भी हुई। आखिरकार, अदालत फिर से बैठी और बच्चे की मां के रिश्तेदारों के लिए पेश होने वाले वकील को फटकार (castigated) लगाई।
हाईकोर्ट ने एक बार फिर मां की तरफ से हाईकोर्ट पहुंचे रिश्तेदारों को चेतावनी दी और कहा कि कस्तूरबा मार्ग पुलिस स्टेशन में बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपी जाए। कहानी के बैकग्राउंड में पिता का उच्च न्यायालय में हेबीयस कॉर्पस याचिका (habeas corpus petition) दायर करना है। तीन साल पहले 2019 में बच्चे की मां के निधन के बाद पिता ने कोर्ट से बच्चे की कस्टडी मांगी छी।
उन्हें फरवरी 2022 में उच्च न्यायालय से उनके पक्ष में एक आदेश मिला, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2022 में बरकरार रखा था। हालाँकि, आदेश का अनुपालन नहीं किया गया, ऐसे में पिता ने एक बार फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया। अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका पर आदेश पारित किया है।
पिता ने दावा किया कि नाना और चाचा बच्चे की हिरासत को सौंपने से इनकार कर रहे थे। मां के पक्ष से पेश रिश्तेदारों की दलील थी कि बच्चे को अपने पिता के साथ नहीं जाने दिया जा सकता क्योंकि उसकी मां का तीन साल पहले कैंसर के कारण निधन हो गया।
रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस एएस गडकरी और न्यायमूर्ति पीडी नाइक ने लगभग 2.30 बजे आदेश पारित किया। डिवीजन बेंच ने अवमानना याचिका में पुलिस की सहायता से उच्च न्यायालय के परिसर में ही पिता को नाबालिग बच्चे को सुरक्षित हैंडओवर का फरमान सुनाया था। इस आदेश के पारित होने के बाद, जब पिता ने बच्चे को घर ले जाने की कोशिश की, तो बच्चे ने सार्वजनिक रूप से विरोध किया, चिल्लाया और पिता की पकड़ से दूर जाने की कोशिश की।
अफरा-तफरी जैसी स्थिति में भीड़ उच्च न्यायालय के परिसर के ठीक बाहर जमा हो गई। पिता ने कोशिश की लेकिन बच्चे को कार तक लाने में विफल रहे। नाना-नानी और पिता के बीच हाथापाई भी हुई। बच्चा अपने पिता की पकड़ से मुक्त होकर वापस उच्च न्यायालय की इमारत में भाग गया।
दोनों पार्टियों ने फिर से बेंच से संपर्क किया, जिसने तुरंत इस मामले का संज्ञान लिया। दादा और बच्चे की मां के पक्ष से चाचा के वकील, अधिवक्ता इमरान शेख ने अदालत को आदेश के बाद की पूरी घटना बताई। उन्होंने वीडियो दिखाने की पेशकश की, जिन्हें पास में खड़े लोगों ने रिकॉर्ड किया था। हालांकि, बेंच ने वीडियो देखने से इनकार कर दिया।
पीठ ने शेख को फटकार लगाई और कहा कि अदालत के आदेशों का उल्लंघन करने के लिए अपने मुवक्किलों को गलत सलाह देना गलत है। वकील ने इस बीच कहा कि वह केवल अपने मुवक्किलों को सलाह दे रहा था, लेकिन अदालत उसके खिलाफ बहुत कठोर टिप्पणी की।
बेंच ने कहा, "हम पिछले कुछ सुनवाई के लिए आपके आचरण का अवलोकन कर रहे हैं। यही कारण है कि हम चेतावनी दे रहे हैं। आप हदें पार कर (overreaching) रहे हैं।" अदालत ने सख्त एक्शन की चेतावनी कोर्ट में मौजूद पुलिस कर्मियों को भी दी। कोर्ट ने कहा, पुलिस आदेश के अनुपालन के लिए अदालत की सहायता करने में विफल रहे।
अदालत ने दोबारा आदेश दिया कि नाबालिग को 7 बजे तक कस्तूरबा मार्ग पुलिस स्टेशन में मातृ रिश्तेदारों द्वारा पिता को सौंप दिया जाए। पिता के वकील अधिवक्ता आकाश विजय ने अदालत से अनुरोध किया कि क्या हैंडओवर पिता के निवास के करीब एक पुलिस स्टेशन में हो सकता है। इस पर अदालत ने कहा, आपके (पिता की) इच्छा के अनुसार सब कुछ नहीं होगा। आप चाहें तो कोर्ट का ऑर्डर लें, या इसे छोड़ भी सकते हैं!












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