क्या 'महाराज' का बढ़ा हुआ कद, 'मामा' पर पड़ेगा भारी ?

भोपाल, 8 जुलाई: ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार में दरकिनार किए जाने के चलते ही कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। उनकी और उनके समर्थकों की यही शिकायत थी कि विधानसभा चुनाव में मेहनत उन्होंने की, लेकिन युवा-युवा का हवा देकर पार्टी आलाकमान ने बुजुर्ग और राजनीति में 'घाघ' समझे वाले नेताओं पर ही यकीन किया। आखिरकार 15 महीने में ही कांग्रेस सरकार गिरने की यही वजह भी बन गई। सिंधिया ही वो शख्स हैं, जिनकी मदद से भाजपा वहां सत्ता में फिर से काबिज हो पाई है। अब जाकर 'ग्वालियर के महाराजा' को उसका ईनाम मिला है। लेकिन, क्या यह सब देखकर असम में सर्बानंद सोनोवाल एपिसोड देख चुके 'मामा' शिवराज सिंह चौहान की धड़कन अभी से बढ़ने नहीं लगी होगी !

सिंधिया को 16 महीने इंतजार का पुरस्कार

सिंधिया को 16 महीने इंतजार का पुरस्कार

पिछले साल मार्च में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के दोस्त ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी से इस्तीफा देकर भाजपा का कमल थामा था, जिसके चलते ही फिर से शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनने और बीजेपी को वापस सत्ता पाने का मौका मिला था। 16 महीने इंतजार के बाद मोदी कैबिनेट में जगह बनाकर सिंधिया ने उस कद को हासिल किया है, जिसे उन्हें वर्षों बिताने के बावजूद कांग्रेस में हासिल नहीं हो पाया था। दिसंबर, 2018 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता दिलाने में सिंधिया की बड़ी भूमिका से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन, आलाकमान ने फिर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी देते वक्त राजनीति के धुरंधर कमलनाथ पर ज्यादा भरोसा किया था और आखिरकार यही वजह सिंधिया का उसे टाटा कहने का कारण बन गया।

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तीन-तीन बार दिखाया दम

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तीन-तीन बार दिखाया दम

ग्वालियर राजघराने से पिता की राजनीतिक विरासत लेकर सियासत के मैदान में उतरे सिंधिया ने मध्य प्रदेश की सत्ता पर खुद के दबदबे को बीते ढाई वर्षों में तीन-तीन बार साबित करके दिखाया है। उन्होंने 2018 में कांग्रेस की सरकार बनवाने में अहम रोल तो निभाया ही, पिछले साल मार्च में कांग्रेस से 20 से ज्यादा विधायकों को तोड़कर बीजेपी की सरकार भी बनवा दी। लेकिन, जब उन्होंने कांग्रेस के उन बागी विधायकों में से अधिकतर को उपचुनाव में जितवाकर विधानसभा तक पहुंचाने का दम दिखाया तो राजनीति के धुरंधर भी मान गए कि 50 साल का यह युवा नेता सिर्फ 'खानदान' की बदौलत राजनीति नहीं करता, उसने ग्वालियर-चंबल संभाग में धरातल पर अपना एक जनाधार भी खड़ा किया है।

भाजपा में सिंधिया को देर से मिला, लेकिन बड़ा मिला

भाजपा में सिंधिया को देर से मिला, लेकिन बड़ा मिला

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार बनवाने में जो योगदान दिया था, उसका पुरस्कार मिलने देर जरूर हुई है, लेकिन पीएम मोदी ने आखिरकार उन्हें जो रोल दिया है उससे उन्हें वो सम्मान मिल गया है, जिससे वह दिल्ली की राजनीति से लेकर एमपी की सियासत तक में अपनी धाक जमा सकते हैं। गांधी परिवार के करीबी और राहुल से दोस्ती के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार में उन्हें राज्यमंत्री बनाकर रखा गया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए कमजोर कड़ी बन चुकी यूपी की जिम्मेदारी दी भी गई तो आधा हिस्सा प्रियंका गांधी वाड्रा को बांटकर दे दिया गया। कांग्रेस में अपने नेता के साथ इसी बर्ताव से उनके समर्थकों की शिकायत थी कि गांधी परिवार उनके जैसा युवा नेता को कभी प्रमोट नहीं कर सकता, जो कि राहुल गांधी के समानांतर खड़ा हो सके।

'महाराज' का बढ़ा हुआ कद, 'मामा' पर पड़ेगा भारी!

'महाराज' का बढ़ा हुआ कद, 'मामा' पर पड़ेगा भारी!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा की संस्थापक सदस्य रहीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया के पोते जूनियर सिंधिया को वही उड्डयन मंत्रालय सौंपा है, जो कभी उनके पिता माधवराव सिंधिया के पास होता था। इस तरह से भाजपा में आकर उनका कद तो बढ़ा ही है, उन्हें और उनके समर्थकों को भावनात्मक सम्मान भी देने की कोशिश हुई है। लेकिन, कम उम्र में ही मोदी सरकार में इस महाराजा का उत्थान और सियासी दबदबा बढ़ने का अर्थ है कि 'मामाजी' (मध्य प्रदेश में शिवराज इसी नाम से लोकप्रिय हैं) या मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए भी भविष्य में वे राजनीतिक चुनौती बन सकते हैं। मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2023 के अंत में होना है। लेकिन, सिंधिया और शिवराज दोनों के लिए असम का उदाहरण सामने है। जहां कांग्रेस से आए हिमंत बिस्वा सरमा ने परफॉर्म किया तो चुनाव जिताकर दोबारा सत्ता में लाने वाले सर्बानंद सोनोवाल को भी सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ गई और अब उन्हें केंद्र में जगह दी गई है।

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