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MP में 'कमल' के खिलाफ कांग्रेस के लिए कमलनाथ क्यों जरूरी हैं ? 5 प्वाइंट में पूरी रणनीति जानिए

भोपाल, 6 अप्रैल: 2023 के आखिर में होने वाले मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने कमलनाथ को चेहरा बनाकर पेश किया है। इसके साथ ही पार्टी ने कथित सॉफ्ट हिंदुत्व को औपचारिक स्वरूप दिया है, इन फैसलों से जाहिर है पार्टी ने पूरी रणनीति के तहत ऐसा किया है और शायद पार्टी के पास भाजपा का मुकाबला करने के लिए प्रदेश में इससे अच्छा विकल्प भी नहीं है। आइए जानते हैं कि कांग्रेस ने एकबार अपनी-बनाई सरकार को गंवा चुके पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर किन वजहों से फिर से दांव लगाया है और इसका पार्टी को क्या फायदा या नुकसान हो सकता है।

'सॉफ्ट' हिंदुत्व के लिए उपयोगी

'सॉफ्ट' हिंदुत्व के लिए उपयोगी

कांग्रेस ने जिस तरह से 2023 में मध्य प्रदेश विधानसभा का चुनाव पूर्व सीएम कमलनाथ के नेतृत्व में लड़ने का फैसला किया है, उससे साफ हो चुका है कि वह एकबार फिर से सॉफ्ट हिंदुत्व के रास्ते पर चलकर ही बीजेपी का मुकाबला करेगी। पार्टी ने इसके साथ ही अपने कार्यकर्ताओं से जिस तरह से इस महीने पवित्र रामनवमी और हनुमान जयंती मनाने को कहा है, उससे स्पष्ट है कि पार्टी प्रदेश में पिछली बार सफल हो चुके अपने एजेंडे को ही जीत की गारंटी मानकर चल रही है। पिछले चुनाव में भी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में हर गांव में गौशालाओं का निर्माण और तीर्थयात्री केंद्र बनाने जैसे वादे किए थे। लेकिन, इसबार तो पार्टी ने जिस तरह से हिंदुओं के त्योहारों का आयोजन करना तय किया है, उससे लगता है कि वह सॉफ्ट से थोड़ा ज्यादा सख्त हिंदुत्व को भी टेस्ट करना चाहती है। कमलनाथ खुद भी हनुमान भक्त माने जाते हैं, जो वर्षों पहले अपने गृहनगर छिंदवाड़ा में हुनमानजी की 101.8 की ऊंची प्रतिमा भी लगवा चुके हैं।

गांधी परिवार के भरोसेमंद

गांधी परिवार के भरोसेमंद

कांग्रेस आलाकमान यानी गांधी परिवार से जितना पुराना नाता कमलनाथ का है, वैसे अब गिनती के ही लोग पार्टी में बचे होंगे। जो बचे भी हैं, वे गांधी परिवार के हर नेता से उतने ही करीब नहीं रहे हैं, जैसा रिकॉर्ड कमलनाथ का है। इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक ने इनपर हमेशा भरोसा किया है। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी को लेकर तो कहा जाता है कि कमलनाथ उनके तीसरे बेटे जैसे रहे हैं। पिछले चुनाव में भी युवा-युवा की बात करने वाले राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कमलनाथ को ही बिठाया था। जबकि, ज्योतिरादित्य सिंधिया तो उनके खासमखास मित्र थे। पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह के पास भी प्रदेश में अपना जनाधार था, लेकिन जब सीएम बनाने की बारी आई तो 10 जनपथ के करीबियों में कमलनाथ से ज्यादा कोई नहीं दिखा।

फंड मैनेजमेंट में चतुर

फंड मैनेजमेंट में चतुर

कमलनाथ के बारे में कहा जाता है कि वह कांग्रेस के लिए फंड मैनेजर का काम करते रहे हैं। उनके पास पार्टी के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने की जितनी क्षमता है, वह बाकी नेताओं से काफी आगे निकल जाते हैं। इस मायने में मध्य प्रदेश में पार्टी के पास कोई ऐसा नेता नहीं है, जो पार्टी की आवश्यकताओं के मुताबिक आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था कर सके। छिंदवाड़ा के नेता का भोपाल से लेकर दिल्ली तक अपना एक अलग ही प्रभाव है।

लंबा राजनीतिक अनुभव

लंबा राजनीतिक अनुभव

कमलनाथ के पास केंद्र की राजनीति से लेकर प्रदेश की राजनीति तक में लंबा अनुभव है। वह केंद्र सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं और 15 महीने मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। अभी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर वह राज्य में संगठन की भी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, तो छिंदवाड़ा से 9 बार सांसद रहने का भी उनके नाम रिकॉर्ड है। कांग्रेस को लगता है कि अगर मध्य प्रदेश में चुनाव जीता जा सकता है तो वह कमलनाथ ही जीत सकते हैं।

कांग्रेस संगठन पर पकड़

कांग्रेस संगठन पर पकड़

कांग्रेस में कमलनाथ के साथ एक सकारात्मक पहलू ये भी है कि उनकी पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह के साथ भी रणनीतिक नजदीकी दिखाई पड़ती है। जाति की राजनीति में वह कांग्रेस के न्यूट्रल चेहरे के तौर पर फिट बैठते हैं। कमलनाथ के पास पार्टी में कार्यकर्ताओं की एक टीम है और वह सबको एकजुट करने में सक्षम हैं। कांग्रेस नेताओं को भी लगता है कि बीजेपी के मजबूत संगठन को अगर कोई कांग्रेसी नेता चुनौती दे सकता है तो यही हैं।

कांग्रेस के 'हिंदुत्व' की राह में चुनौतियां

कांग्रेस के 'हिंदुत्व' की राह में चुनौतियां

कांग्रेस पार्टी का जो सियासी चरित्र रहा है, उसमें राम कथा वाचन, रामलीला, सुंदुरकांड और हनुमान चालीसा का पाठ आधिकारिक तौर पर आयोजित करने के लिए निर्देश देना थोड़ा अटपटा फैसला लगता है। क्योंकि, कांग्रेस जिस तरह से चुनावों में भाजपा का मुकाबला करने के लिए कथित तौर पर सौफ्ट हिंदुत्व को अपना रही है, उसका विरोध पार्टी के भीतर से ही स्वाभाविक तौर पर मुखर होना शुरू हो गया है। पार्टी के एमएलए और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य आरिफ मसूद ने धार्मिक त्योहार मनाने की चिट्ठी की सख्त आलोचना की है। उनका कहना है कि चिट्ठी में रामनवमी और हनुमान जयंती का तो जिक्र है, लेकिन रमजान को नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने कहा है कि 'सर्व धर्म समभाव के जिस मूल मुद्दे पर हम विरोधी पार्टी (बीजेपी) से लड़ रहे हैं, उसे आपने (पार्टी ने) छोड़ दिया है। जबकि, लोगों को पार्टी की यही भावना पसंद है।' उनका कहना है कि कांग्रेस पार्टी को अपने सिद्धांतों से नहीं भटकना चाहिए, नहीं तो बीजेपी को मौका मिल जाएगा।

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