किस्सा कुर्सी का: हर महापौर ने चाही नई कुर्सी, पुरानी पर कोई नहीं बैठा
सागर, 18 जुलाई। बुंदेलखंड की इकलौती नगर निगम में 'किस्सा-ए-कुर्सी' का जुमला मशहूर है। निगम में जो भी महापौर चुनकर आता है, उसके लिए नई और लग्जरी कुर्सी खरीदी जाती है। पूर्व महापौर की जो कुर्सी चेम्बर में मौजूद होती है, उस कुर्सी पर नया महापौर कभी नहीं बैठा। अब इसे मिथक कहें या प्रथम नागरिक की इच्छा, पुरानी कुर्सी को किनारे कर दिया जाता है।

नगर निगम सागर में एक अघोषित परंपरा चली आ रही है। इसमें जब भी जो भी व्यक्ति या महिला महापौर का चुनकर निगम पहुंचे, उसके पहले महापौर चेम्बर की कुर्सी बदल दी जाती है। यह अघोषित परंपरा निगम प्रशासन के बजाय यहा पूर्व में काबिज रहे महापौर ने ही शुरू कराई है। बीते करीब 4 दशक में जब भी निगम में नए महापौर ने कदम रखा, उनके पसंद की चेयर यहां खरीदकर लगाई गई है। दो परिषद से यह परंपरा महापौर के साथ निगम अध्यक्ष ने भी कायम रखी थी। पुरानी कुर्सी या तो विपक्ष के चेंबर में पहुंच जाती हैं या किसी मेयर इन काउंसिल के सदस्य के चेंबर में लगा दी जाती है।
सभी निर्वाचित महापौर ने बुलवाईं थी नई कुर्सियां
नगर निगम में बीती परिषदों में काबिज रहे पूर्व महापौर अभय दरे और उनके पहले प्रदीप लारिया, कमला बाई किन्नर, मनोरमा गौर, लोकमन खटीक और प्रथम महापौर नवीन जैन के समय तक उस दौर की सबसे लग्जरी कुर्सियां खरीदकर चेंबर में लगवाई जाती रही हैं। बीच के कुछ कार्यकाल के दौरान अल्प समय के लिए बने महापौर ने पुरानी कुर्सियों से ही काम चलाया था, कुछ ऐसा ही निगम में प्रशासक रहे अधिकारियों के साथ भी रहा। लेकिन यह रिकॉर्ड है कि जब-जब नया महापौर निगम में चुनकर आया है, वह पुरानी कुर्सी पर कभी नहीं बैठा, हर महापौर ने शपथ ग्रहण के पहले नई कुर्सी बुलवाई है।












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