MP News: कब मिलेगा कर्मचारियों को प्रमोशन, मोहन यादव सरकार का फॉर्मूला फिर लटका, संगठनों का विरोध
MP News: मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन का इंतजार नौ साल से खत्म नहीं हो रहा। मोहन यादव सरकार इस गतिरोध को तोड़ने के लिए प्रमोशन फॉर्मूले पर काम कर रही थी, लेकिन अब यह मामला एक बार फिर अटक गया है। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के प्रस्ताव को कर्मचारी संगठनों के विरोध और तकनीकी खामियों के कारण अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी।
मुख्यमंत्री ने GAD अफसरों को नए सुझावों के साथ प्रस्ताव तैयार करने को कहा है, जिससे प्रमोशन की टाइमलाइन कम से कम दो-तीन हफ्ते और खिसक गई है। कर्मचारी संगठन कोर्ट जाने की चेतावनी दे रहे हैं, और सरकार वित्तीय संतुलन के साथ कर्मचारियों की नाराजगी से बचने की जुगत में है। यह मसला अब सियासी और प्रशासनिक चुनौती बन गया है।

प्रमोशन फॉर्मूला: कहां अटकी बात?
- सामान्य प्रशासन विभाग ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को प्रमोशन फॉर्मूले का प्रजेंटेशन दिया, जिसमें 2016 से लंबित प्रमोशन को एकमुश्त पूरा करने का प्रस्ताव था। लेकिन इस प्रस्ताव में कई पेंच सामने आए:
- कर्मचारी संगठनों का विरोध: संगठनों का कहना है कि 2016 से 2024 तक की डीपीसी (विभागीय पदोन्नति समिति) अलग-अलग होनी चाहिए, न कि एकमुश्त। साथ ही, हर संवर्ग में वर्टिकल आरक्षण (16% SC, 20% ST, शेष अनारक्षित) लागू करना जरूरी है।
- वित्तीय बोझ: सरकार एक बार में सभी प्रमोशन देकर कर्मचारियों को खुश करना चाहती है, लेकिन इससे वेतन और भत्तों में वृद्धि से खजाने पर 500-700 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। साल-दर-साल प्रमोशन देने पर यह बोझ और बढ़ेगा।
- तकनीकी खामियां: GAD का प्रस्ताव सभी संवर्गों की मांगों और कोर्ट के दिशा-निर्देशों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सका।
मुख्यमंत्री ने भोपाल में समत्व भवन (सीएम निवास) में 13 मई को GAD अफसरों के साथ बैठक की। उन्होंने प्रस्ताव पर कुछ सुझाव दिए और नए सिरे से प्रस्ताव तैयार करने को कहा। सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री चाहते हैं कि फॉर्मूला ऐसा हो, जो कोर्ट की कसौटी पर खरा उतरे और कर्मचारियों की नाराजगी भी न बढ़े।
कर्मचारी संगठनों का विरोध: कोर्ट जाने की धमकी
मंत्रालय सेवा अधिकारी कर्मचारी संघ और अन्य संगठनों ने GAD के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। संघ के अध्यक्ष सुधीर नायक ने कहा, "प्रस्ताव में नौ साल की अलग-अलग डीपीसी और वर्टिकल आरक्षण का ध्यान नहीं रखा गया। सभी पात्र कर्मचारियों को एक ही प्रमोशन देना अन्याय है।"
कर्मचारियों ने एक माह पहले मुख्य सचिव, ACS (मुख्यमंत्री कार्यालय), GAD, और प्रमुख सचिव (वित्त) को ज्ञापन सौंपकर मांग की थी। अलग-अलग डीपीसी: 2016 से 2024 तक प्रत्येक साल की डीपीसी अलग हो, ताकि वरिष्ठता और पात्रता का नुकसान न हो। वर्टिकल आरक्षण: SC (16%), ST (20%), और शेष अनारक्षित वर्ग के लिए हर संवर्ग में आरक्षण सुनिश्चित हो। न्यायपूर्ण नीति: प्रमोशन में सभी वर्गों के साथ समानता बरती जाए।
Mohan Yadav government: प्रमोशन पर रोक की वजह: कोर्ट का फैसला
प्रमोशन का विवाद 2002 से शुरू हुआ, जब तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने मप्र लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 2002 में प्रमोशन में आरक्षण का प्रावधान किया। इससे आरक्षित वर्ग (SC/ST) के कर्मचारियों को प्रमोशन मिलता रहा, लेकिन अनारक्षित वर्ग पिछड़ गया। इस अन्याय के खिलाफ अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी हाईकोर्ट पहुंचे और मांग की कि:
प्रमोशन का लाभ एक बार ही मिले।
30 अप्रैल 2016 को मप्र हाईकोर्ट ने इन तर्कों के आधार पर 2002 के नियमों को खारिज कर दिया। सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश मिला। नतीजतन, 2016 से मध्यप्रदेश में सभी विभागों में प्रमोशन पर रोक लग गई। इस दौरान करीब 1.5 लाख कर्मचारी प्रमोशन से वंचित रहे, जिससे असंतोष बढ़ता गया।
कुछ विभागों में सशर्त प्रमोशन
- पशु चिकित्सा विभाग: दिसंबर 2022 में हाईकोर्ट के आदेश पर डॉक्टरों को प्रमोशन, विरोध के बावजूद।
- नगरीय प्रशासन: 21 मार्च 2024 को हाईकोर्ट ने 2 महीने में प्रमोशन का आदेश दिया।
- चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी: रामबहादुर सिंह व अन्य की याचिका पर प्रमोशन।
- इन मामलों में कोर्ट ने सशर्त प्रमोशन की अनुमति दी, जिसमें कहा गया कि यदि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नियमों के खिलाफ जाता है, तो प्रमोशन रद्द हो सकते हैं।
Mohan Yadav government: सरकार की दुविधा, कर्मचारी खुशी vs वित्तीय बोझ
- कर्मचारियों की नाराजगी: 1.5 लाख से ज्यादा कर्मचारी प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं। यदि फॉर्मूला अन्यायपूर्ण हुआ, तो आंदोलन और कोर्ट केस बढ़ेंगे।
- वित्तीय संतुलन: एकमुश्त प्रमोशन से 500-700 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। साल-दर-साल प्रमोशन देने पर यह राशि और बढ़ेगी, जो 2025-26 के बजट को प्रभावित करेगा।
- GAD के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "हम कोर्ट के दिशा-निर्देशों, कर्मचारी मांगों, और वित्तीय स्थिति को संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सभी को एक साथ खुश करना मुश्किल है।"
क्या है वर्टिकल आरक्षण का मुद्दा?
कर्मचारी संगठन वर्टिकल आरक्षण की मांग कर रहे हैं, जिसमें प्रत्येक संवर्ग (जैसे क्लर्क, सहायक, अधिकारी) में SC को 16%, ST को 20%, और शेष अनारक्षित वर्ग को प्रमोशन का कोटा मिले। GAD का मौजूदा प्रस्ताव इस मॉडल का पूरी तरह पालन नहीं करता, जिससे SC/ST कर्मचारी नाराज हैं। अनारक्षित वर्ग भी चाहता है कि 2016 से लंबित वरिष्ठता को ध्यान में रखा जाए।
2016 से पहले के नियमों में आरक्षित वर्ग को बार-बार प्रमोशन का लाभ मिलता था, जिससे अनारक्षित वर्ग पिछड़ गया। कोर्ट ने इसे अन्यायपूर्ण माना था। अब नया फॉर्मूला दोनों पक्षों को संतुष्ट करने की चुनौती का सामना कर रहा है।
कानूनी स्थिति
- हाईकोर्ट (2016): मप्र लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 2002 खारिज, आरक्षण को गलत ठहराया।
- सुप्रीम कोर्ट: यथास्थिति का आदेश, जिससे 2016 से प्रमोशन रुके।
- वर्तमान: सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित। सरकार को नया फॉर्मूला कोर्ट की मंजूरी के साथ लागू करना होगा।
- कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यदि नया फॉर्मूला कोर्ट में नहीं टिका, तो फिर से प्रमोशन रद्द हो सकते हैं, जैसा कि 2016 में हुआ था।
प्रमोशन की स्थिति: आंकड़े
- लंबित कर्मचारी: करीब 1.5 लाख (सभी विभागों में)।
- प्रमोशन रुके: 2016 से 2024 तक, 9 साल।
- वित्तीय बोझ: एकमुश्त प्रमोशन से 500-700 करोड़ रुपये, साल-दर-साल और अधिक।
- प्रमुख विभाग प्रभावित: शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व, लोक निर्माण, गृह, वन।
- आगे क्या?
- नया प्रस्ताव: GAD को दो-तीन हफ्ते में संशोधित फॉर्मूला तैयार करना है, जिसमें वर्टिकल आरक्षण और डीपीसी का ध्यान रखा जाए।
- कर्मचारी आंदोलन: यदि मांगे नहीं मानी गईं, तो संगठन भोपाल में प्रदर्शन और कोर्ट का रुख करेंगे।
- सुप्रीम कोर्ट: सरकार को फॉर्मूला लागू करने से पहले कोर्ट की मंजूरी लेनी होगी।
- सियासी दबाव: कर्मचारी संगठनों का असंतोष 2026 के निकाय चुनावों में बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है।
कर्मचारियों का हक, सरकार की मजबूरी
नौ साल से अटके प्रमोशन मध्यप्रदेश के सरकारी कर्मचारियों के लिए एक ज्वलंत मुद्दा बन चुके हैं। मोहन यादव सरकार इस गतिरोध को तोड़ने की कोशिश में है, लेकिन कर्मचारी संगठनों का विरोध, वित्तीय मजबूरियां, और कोर्ट के दिशा-निर्देश इसे जटिल बना रहे हैं। GAD का फॉर्मूला न तो कर्मचारियों को संतुष्ट कर पा रहा है, न ही कोर्ट की कसौटी पर खरा उतर रहा है।
कर्मचारियों की मांग जायज है कि नौ साल का हक एकमुश्त छीना नहीं जाना चाहिए, लेकिन सरकार का वित्तीय संतुलन भी एक हकीकत है। यह मामला अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सियासी और सामाजिक मसला बन गया है। अगले दो-तीन हफ्ते निर्णायक होंगे, जब नया फॉर्मूला सामने आएगा। सवाल यह है कि क्या सरकार कर्मचारियों के गुस्से को शांत कर पाएगी, या यह मामला कोर्ट और सड़कों पर जाएगा? मध्यप्रदेश की नौकरशाही और सरकार की साख इस फैसले पर टिकी है।
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