Karnataka में कांग्रेस की 'जीत' मध्य प्रदेश के लिए 5 बड़े सबक, जिससे तय होगी आगे की मंजिल

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली 'जीत', देश के अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों के लिए बड़ा सबक भी हैं। जानिए कौन सी वो बड़ी बातें है, जिसका इसी साल 5 राज्यों में भी ख्याल रखना होगा।

Karnataka Congresss victory

Karnataka Congress's victory: कर्नाटक चुनाव में ऐतिहासिक जीत से कांग्रेस गदगद है। कई मायनों में पार्टी के लिए कामयाबी 'जीत' से ज्यादा सबक भी है। क्योकि सिर पर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव है।

सबक इसलिए भी क्योकि जिन गलितियों की बदौलत कांग्रेस इससे पहले अपनी जमीन खोती चली गई, आने वाले वक्त में वैसी तस्वीर दोबारा न उभरे। चुनाव मैदान में उतरने से पहले वोटिंग तक एकजुटता और विरोधियों के खिलाफ आक्रामकता पहला सबक रहा। जिसकी बदौलत पार्टी जीत की दहलीज से आगे निकली।

कर्नाटक चुनाव

दूसरा सबक- नेतृत्व और भरोसा
कर्नाटक में पार्टी अध्यक्ष डीके शिकुमार ने जिस फ़ॉर्मेट में सबको बांधे रखा और पावर हाउस बने। वैसी ही जरुरत मध्य प्रदेश में भी रहेगी। सिद्धारमैया से पटरी न बैठने के बावजूद चुनाव के वक्त ऐसी कोई बात प्रदर्शित नहीं हुई, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़े। भरोसे की मीनार को मजबूत रखना होगा। एमपी में कमलनाथ के कंधो पर जिम्मा हैं।

तीसरा सबक- स्थानीय मुद्दों की नब्ज
जिस बुनियाद और मुद्दों के सहारे कर्नाटक जीता गया, उसी पैटर्न को बीजेपी के ताकतवर एमपी जैसे राज्य में अपनाना होगा। मुद्दे सिर्फ बयानों में नहीं, बल्कि जनता के दिल तक उतरना चाहिए। जनता के साथ जनता की बात करते हुए विरोधी को घेरना होगा। जैसे कर्नाटक में भ्रष्टाचार, महंगाई, विकास जैसे चोट करने वाले मुद्दे सिलेक्ट किए गए।

चौथा सबक- कोर वोट बैंक में सेंध
मध्य प्रदेश में चुनाव के लिए करीब 6 महीने का वक्त बचा है। कर्नाटक की विजय की बड़ी वजह बीजेपी के कोर वोट बैंक में सेंध भी मानी जा रही है। चुनाव के वक्त बजरंग दल के रूप में उछली गेंद बीजेपी ने लपकी। हल्ला मचा तो कांग्रेस ने वक्त जाया नहीं किया और उसी मुद्दे पर बजरंग बली से तुलना के रूप में काउंटर अटैक किया। जिससे कोर वोट कांग्रेस की तरफ शिफ्ट होने में मदद मिली।

पांचवा सबक- अपनी पिच पर उनको खिलवाओं
कर्नाटक चुनाव प्रचार के वक्त चाहे जहरीले सांप का बयान हो या फिर बजरंग दल इश्यू, बीजेपी से घिरकर वहां कांग्रेस विचलित नहीं हुई। वक्त की नजाकत को समझते हुए खड़गे ने अपने बयान पर माफी मांगी और खुद की तैयार पिच पर बीजेपी को भरपूर मौका दिया जाता रहा। हिंदुत्व एजेंडा भी इसी पिच पर चलता रहा। इसी तर्ज पर एमपी में भी चाहिए कि कांग्रेस अपनी पिच पर बैटिंग में डटी रहे और सामने से सिर्फ गेंद आती रहे। कमजोर बॉल आते ही उसे हिट किया जाए। कर्नाटक में कांग्रेस के लिए कन्वर्ट हुए वोट ऐसे मनोविज्ञान प्रभाव वाले रहे।

छटवा सबक- केन्द्रीय नेतृत्व को कैश करना
कर्नाटक में जिस तरह केन्द्रीय नेतृत्व जुटा, उससे एक कदम आगे एमपी में भी जुटना होगा। राहुल-प्रियंका जैसे दिग्गजों की रैली के दो तरह के प्लान जरुरी है। पहले तो एरिया सिलेक्शन फिर वहां के लोकल इश्यू , उस नब्ज को पकड़कर जब एंट्री होगी तो उसका मैसेज पब्लिक के दिल में बसेगा। कर्नाटक में यूथ पर फोकस कर राहुल गांधी ने बहुत कुछ माहौल पार्टी के पक्ष में किया। मध्य प्रदेश में भी जरुरी है कि खड़गे हो, राहुल या फिर प्रियंका इनके दौरे को कैश करना स्टेट लीडर शिप को आना चाहिए।

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