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Holi 2023: 'घेहर' पाकिस्तान से आई खास मिठाई, जिसके बगैर पूरी नहीं होती 'सिंधियों' की होली

'घेहर' मिठाई सिंधी समाज में होली पर्व पर विशेष रूप से तैयार की जाती है। यह मिठाई विभाजन के समय सिंध प्रांत से सिंधी समाज के लोगों के साथ भारत आई और यहां की पर्व परंपरा में शामिल हो गई।

होली की खास मिठाई घेहर, जो पाकिस्तान से आई थी

Holi 2023: हिन्दुस्तान में होली का पर्व कोने-कोने में मनाया जाता है। होली पर मिठाइयों का विशेष महत्व है। हर प्रांत और शहर में कुछ न कुछ प्रसिद्ध और विशेष व्यंजन जरूर होता है, जो होली के उल्लास में मिठास घोलता है। हम आपको एक ऐसी मिठाई के बारे में बता रहे हैं जो कभी पाकिस्तान से भारत आई थी और यहां की संस्कृति और परंपरा में शामिल हो गई। विभाजन के समय पाकिस्तान के सिंध से सिंधी परिवारों के साथ आई 'घेहर' मिठाई होली पर्व का प्रमुख हिस्सा है। सिंधी कालोनियों में घर-घर और गली-गली में घेहर की खुशबू बिखर रही है।

होली की खास मिठाई घेहर, जो पाकिस्तान से आई थी


वैसे तो हर त्योहार मिठाई के साथ ही मनाया जाता है, लेकिन रंगो के पर्व होली पर रिश्तों में मिठास घोलने का काम जो 'घेहर' पाकिस्तान से आई मिठाई करती है, उसकी बात ही अलग है। वैसे तो 'घेहर' देशभर में सिंधी बाहुल्य इलाकों में बनाई जाती है, लेकिन बुंदेलखंड में इसका खास महत्व नजर आता है। होली पर घेहर मिठाई सागर में बड़ी प्रसिद्ध है। स्थानीय भाषा में कुछ लोग इसके बड़ी जलेबी भी कहते हैं। सिंधी समाज में घीयर को प्रमुख स्थान दिया जाता है और उसका अलग ही महत्व है।
होली की खास मिठाई घेहर, जो पाकिस्तान से आई थी

सिंधी समाज के शीतलदास निरंकारी बताते हैं कि होली पर सिंधी परिवारों में घर-घर 'घेहर' मिठाई जरूर बनती है। आस पड़ोस और रिश्तेदारों के यहां 'घेहर'जरूर पहुंचती है। विजय निरंकारी कहते हैं कि होली के पर्व पर आपसी बैर भूल कर सभी एक दूसरे को रंग लगाते हैं, तो वहीं इस पर्व में सिंधी समाज की खास परंपरा है, जिसमें समाज के लोग अपनी बहन बेटियों को हमेशा साथ जोड़ने के लिए इस मिठाई को उनके घर पर भेजते हैं। वहीं रिश्तेदारों में जो पास में होते हैं उन्हें होली के दिन या होली से पहले घियर को भेजा जाता है, वही अगर कोई रिश्तेदार दूर है तू उसे ऐसे समय में भेजते हैं ताकि यह होली के दिन तक मिठाई उसके घर पहुंच जाए।

ऐसे तैयार होती है घट्टी-मीठी 'घेहर'
सागर की सिंधी कॉलोनी में घेहर मिठाई बनाने वाले महेश बताते हैं, कि इसके लिए मैदा का पेस्ट शक्कर और तेल का इस्तेमाल किया जाता है, यह पूरी तरह से शुद्ध और पवित्र होती है। इसे तेल में जलेबी की तरह तलकर शक्कर की चासनी में डुबोया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि आजादी के पहले पाकिस्तान से घीयर बनाना शुरू किया गया था और इसके बाद सिंधी समाज के लोग भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहने लगे जब से ही पूरे देश में रहने वाले सिंधी समाज के लोग विभाजन के बाद भी अपनी परंपरा को निभाते आ रहे हैं।

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    राजस्थान में 'घीयर' या 'घेवर'कहलाती है
    घेहर को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। मप्र में जहां इसे घेहर कहते हैं तो राजस्थान के सिंधी बाहुल्य इलाकों में इसे 'घीयर' या 'घेवर' कहा जाता है। यहां होली पर इसकी विशेष मांग रहती है। इस खट्टी-मीठी मिठाई को खाने वाले खासा पसंद करते हैं। यहां भी इसका इतिहास पाकिस्तान के सिंध प्रांत से ही जुड़ा है। पाकिस्तान के विभाजन के समय भारत आए सिंधी परिवार घेहर, घेवर या घीयर की रेसिपी को अपने साथ लाए थे, जब से देश के विभिन्न प्रांतों और हिस्सों में इसका खट्टा-मीठा स्वाद और खुशबू लगातार महक रही है।

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