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वो जिंदगी से इतना आजाद हुआ, कि मौत को टायर ट्यूब पर मिली जगह...

डिंडौरी, 15 अगस्त: देश की आजादी पूरे 75 साल की हो गई। बड़ी शान से इतराते हुए दोनों हाथों से हम भरपूर जश्न मना रहे हैं। आजादी की तरह यह अमृत महोत्सव भी आने वाली पीढ़ी के लिए इतिहास बन जाएगा। कागजों पर सिर्फ दर्ज नहीं होगा, तो मप्र के आदिवासी जिले डिंडौरी का शर्मसार करने वाला विषमत नंदा की मौत का किस्सा...जिसकी लाश को अंतिम संस्कार के लिए ट्यूब पर बांधकर ले जाना पड़ा। आजादी के जश्न के बीच ये मौत भी कुछ बोलने मजबूर है। पढ़िए ये पूरी खबर...

हम कितने आजाद है ?

हम कितने आजाद है ?

हम आजाद है, 75 साल की आजादी का अमृत दोनों हाथों से संवारा है। बोलने की आजादी है, लिखने की आजादी है, आजादी को 'आजादी' साबित करने की आजादी है। लेकिन ज़रा, इसके जश्न में सराबोर देश की आंखे इन तस्वीरों को भी देखें। उफनती नदी में टायर ट्यूब पर लाश की ये तस्वीर मप्र के आदिवासी जिले डिंडौरी की है। जिसे अपने अंतिम पड़ाव यानी मुक्ति धाम पहुंचने सिर्फ और सिर्फ यही सहारा नसीब हुआ।

दिल का दौरा पड़ने से हो गई थी मौत

दिल का दौरा पड़ने से हो गई थी मौत

अनूपपुर जिला के ठाड़पथरा के रहने वाले 55 वर्षीय विषमत नंदा को दिल का दौरा पड़ा था। गांव से ज्यादा नजदीक डिंडौरी जिले का सरकारी अस्पताल था, तो परिजन किसी तरह उसे अस्पताल लेकर पहुंचे। जहां चिकित्सकों की तमाम कोशिशों के बाद, उन्हें बचाया नहीं जा सका। 14 अगस्त की दोपहर विषमत की मौत हो गई।

शव को गांव ले जाना बना चुनौती

शव को गांव ले जाना बना चुनौती

विषमत की मौत से परिवार के लोग मातम में डूबे थे। अब शव को अंतिम संस्कार के लिए वापस गांव ले जाना था। तभी पता चला कि लगातार बारिश की वजह से गांव पहुंचने के रास्ते में पड़ने वाली नर्मदा नदी उफान पर है। अस्पताल से करीब 40 किलोमीटर दूर पथरकूचा गांव तक नदी के नजदीक एम्बुलेंस के जरिए तो पहुंच गए, लेकिन वहां से नदी के दूसरी छोर ठाड़पथरा गांव तक शव लेकर कैसे पहुंचा जाए, यह सबसे बड़ी चुनौती थी। इसलिए भी क्योकि बारिश थम नहीं रही थी और सूरज ढलने के पहले परिजनों को अपने गांव तक पहुंचना भी जरुरी था।

टायर ट्यूब में बांधी लाश, तैरकर ले गए

टायर ट्यूब में बांधी लाश, तैरकर ले गए

कई जिम्मेदारों से कोई मदद न मिलने के बाद परिजनों के लिए टायर ट्यूब ही सहारा बना। ये दृश्य दिल को झकझोर देने वाले है। विषमत के शव को ट्यूब में बांधा गया, फिर उसे तैराते हुए नदी के दूसरे छोर ले जाना पड़ा। जब तक शव के साथ परिजन दूसरी तरफ नहीं पहुंचे, तब तक नर्मदा के तेज बहाव में उनकी जिंदगी भी बड़े जोखिम के साथ तैरती रही।

आज तक पुल ना बनाने की आजादी !

आज तक पुल ना बनाने की आजादी !

ख़ास बात यह है कि नर्मदा नदी का यह हिस्सा डिंडौरी और अनूपपुर दोनों जिलों को जोड़ता हैं। मृतक जिस गांव का रहने वाला था, उससे लगे करीब दर्जन भर छोटे-बड़े गांव के लोगों के लिए डिंडौरी नजदीक पड़ता हैं। लिहाजा चिकित्सा सुविधा से लेकर अन्य कामों के लिए ग्रामीण डिंडौरी पर ही निर्भर रहते हैं। ग्रामीण यहां पुल बनाने की कई सालों से मांग करते आ रहे हैं, लेकिन किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। सामान्य दिनों में नाव के जरिए यहां ग्रामीणों का आवागमन होता है।

ऐसे मौकों पर आजादी की सच्चाई

ऐसे मौकों पर आजादी की सच्चाई

एक तरफ गांव को गांव और शहर से जोड़ने बड़ी-बड़ी योजनाए बनती है। दावे किए जाते है, दूसरी तरफ आदिवासी अंचल में आजाद देश की ये तस्वीर, आज तक की सरकारों की असलियत को साबित करती हैं। यह स्थिति तब है, जब हर दल आदिवासियों को लेकर सबसे बड़ा हितैषी बनने का दावा कर रहा है। जिस वर्ग से देश के सर्वोच्च पद के लिए प्रतिनिधित्त्व मिलता है। उसी वर्ग की एक सच्चाई यह भी है। स्थानीय विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री ओमकार मरकाम इसके लिए प्रदेश सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे है।

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