प्रेमी-प्रेमिका की याद में पत्थर बरसाने वाला मेला, 11 लोगों के सिर फूटे, बेहद रोचक है इनकी लव स्टोरी

छिंदवाड़ा। भारत में कई परम्पराएं बेहद अनूठी व खतरनाक हैं। उन्हीं में से एक पत्थर बरसाने वाला मेला, जो मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के पांर्ढुना में हर साल भरता है। इसे गोटमार मेले के नाम से भी जाना जाता है। शनिवार को पांर्ढुना में गोटमार मेला शुरू हुआ। मेले पत्थरबाजी में 11 लोग जख्मी हो गए। ज्यादातर के सिर फूटे हैं। पुलिस को मेला स्थल के आस-पास के क्षेत्र में धारा 144 लागू करनी पड़ी।

Gotmar Mela History in Hindi Know related Love Story
जानकारी के अनुसार श्रद्धालुओं ने गोटमार शुरू होने से पहले पलाश के वृक्ष की स्थापना की और ध्वज लगाया। मंदिर में मां चंडिका दर्शन किए। इसके बाद लोगों ने एक दूसरे पर पत्थर बरसाने लगे। इससे शुरूआती दौर में ही 11 लोग जख्मी हो गए, इसमें एक गंभीर है। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है। मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात है।

पहले कई लोगों की हो चुकी है मौत

पहले कई लोगों की हो चुकी है मौत

मीडिया रिपोर्टर्स के अनुसार मध्य प्रदेश में गोटमार मेले की शुरुआत 17वीं सदी से मानी जाती है। महाराष्ट्र की सीमा से लगे पांर्ढुना हर वर्ष भादो मास के कृष्ण पक्ष में अमावस्या पोला त्योहार के दूसरे दिन पांर्ढुना और सावरगांव के बीच बहने वाली जाम नदी में वृक्ष की स्थापना कर पूजा अर्चना की जाती है। नदी के दोनों ओर लोग एकत्र होते हैं और सूर्योदय से सूर्यास्त तक पत्थर मारकर एक-दूसरे को लहूलुहान कर देते हैं। इसमें कई लोगों की मौत भी हो चुकी है।

कुल्हाड़ी से काटना होता है झंडा

कुल्हाड़ी से काटना होता है झंडा

ढोल-ढमाकों और पत्थरों की बरसात के बीच पांर्ढुना के खिलाड़ी आगे बढ़ते हैं तो कभी सावरगांव के खिलाड़ी। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर पत्थर मारकर पीछे ढकेलने का प्रयास करते है। दोपहर बाद 3 से 4 के बीच पत्थरों की बारिश बढ़ जाती है। खिलाड़ी कुल्हाड़ी लेकर झंडे को तोड़ने के लिए वहां तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। इसे रोकने के लिए साबरगांव के खिलाड़ी उन पर पत्थरों की बारिश कर देते हैं।

झंडा के कटते ही रुक जाती है पत्थरबाजी

झंडा के कटते ही रुक जाती है पत्थरबाजी

शाम को पांर्ढुना पक्ष के खिलाड़ी पूरी ताकत के साथ चंडी माता का जयघोष एवं भगाओ-भगाओ के साथ सावरगांव के पक्ष के व्यक्तियों को पीछे ढकेल देते है और झंडा तोड़ने वाले खिलाड़ी, झंडे को कुल्हाडी से काट लेते हैं। जैसे ही झंडा टूट जाता है, दोनों पक्ष पत्थर मारना बंद करके मेल-मिलाप करते हैं और गाजे बाजे के साथ चंडी माता के मंदिर में झंडे को ले जाते है। झंडा न तोड़ पाने की स्थिति में शाम साढ़े छह बजे प्रशासन द्वारा आपस में समझौता कराकर गोटमार बंद कराया जाता है।

गोटमार मेले का इतिहास

गोटमार मेले का इतिहास

मेले के आयोजन के संबंध में कई कहानियां और किवंदतियां हैं। इसमें सबसे प्रचलित और आम किवंदती ये है कि सावरगांव की एक आदिवासी कन्या का पांर्ढुना के किसी लड़के से प्रेम हो गया था। दोनों ने चोरी छिपे प्रेम विवाह कर लिया। पांर्ढुना का लड़का साथियों के साथ सावरगांव जाकर लड़की को भगाकर अपने साथ ले जा रहा था। उस समय जाम नदी पर पुल नहीं था। नदी में गर्दन भर पानी रहता था, जिसे तैरकर या किसी की पीठ पर बैठकर पार किया जा सकता था।

प्रेमी जोड़े ने जाम नदी में तोड़ा दम

जब लड़का लड़की को लेकर नदी से जा रहा था तब सावरगांव के लोगों को पता चला और उन्होंने लड़के व उसके साथियों पर पत्थरों से हमला शुरू किया। जानकारी मिलने पर पहुंचे पांर्ढुना पक्ष के लोगों ने भी जवाब में पथराव शुरू कर दिया। पांर्ढुना और सावरगां के बीच इस पत्थरों की बौछार से दोनों प्रेमियों की जाम नदी के बीच ही मौत हो गई।

...फिर शुरू हो गया गोटमार मेला

दोनों प्रेमियों की मृत्यु के बाद दोनों पक्षों के लोगों को अपनी शर्मिंदगी का एहसास हुआ। दोनों प्रेमियों के शवों को उठाकर किले पर मां चंडिका के दरबार में ले जाकर रखा और पूजा-अर्चना करने के बाद दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस घटना की याद में मां चंडिका की पूजा-अर्चना कर गोटमार मेले का आयोजन किया जाता है।

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