MP News: लक्ष्मीबाई पर कांग्रेस विधायक का विवादित VIDEO वायरल, बरैया ने कहा- "रानी ने आत्महत्या की थी"
मध्य प्रदेश के दतिया जिले की भांडेर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया एक बार फिर अपने विवादित बयान को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार उन्होंने 1857 की क्रांति की प्रतीक और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई पर टिप्पणी की, जिसने सियासी तूफान खड़ा कर दिया।
बीजेपी के प्रदेश मंत्री लोकेंद्र पाराशर ने बरैया का एक वीडियो X पर शेयर किया, जिसमें वे रानी लक्ष्मीबाई को "आत्महत्या करने वाली" कहते नजर आ रहे हैं। इस बयान ने न केवल बीजेपी, बल्कि सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं बटोरीं। आइए, इस विवाद की जड़, बरैया के दावों, और ऐतिहासिक तथ्यों को रोचक और तथ्यपूर्ण अंदाज में समझते हैं।

विवाद की शुरुआत: वायरल वीडियो और बरैया का बयान
17 जून 2025 को बीजेपी के प्रदेश मंत्री लोकेंद्र पाराशर ने X पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया रानी लक्ष्मीबाई के बारे में बोलते दिख रहे हैं। वीडियो में बरैया कहते हैं, "खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी है। बुंदेलों के हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी है। सुनी ही है, ये तो लिखी भी नहीं। काहे को सुनते हो तुम! युद्ध का मैदान झांसी में था और लक्ष्मीबाई मरी थीं ग्वालियर में आत्महत्या करके। आत्महत्या करने वाले को कभी वीरांगना कहा तो फिर रोज 10 लड़कियां आत्महत्या कर रही हैं, उनको भी लिखो वीरांगना। दिमाग से सोचिए आप।"
इस वीडियो को शेयर करते हुए पाराशर ने लिखा, "महारानी लक्ष्मीबाई ने आत्महत्या की थी...! इस नेता का यह बयान माफ करने योग्य नहीं है। (कल 18 जून को महारानी की पुण्यतिथि है, इस अवसर पर मैं ऐसी काली जुबान की तीखे शब्दों में निंदा करता हूं।)" इस पोस्ट ने तुरंत सोशल मीडिया पर हंगामा मचा दिया, और बीजेपी कार्यकर्ताओं ने बरैया के खिलाफ तीखे हमले शुरू कर दिए।
बरैया का स्पष्टीकरण: झलकारी बाई और "बुंदेलखंड का वृहद इतिहास"
विवाद बढ़ने पर बरैया ने अपने बयान का संदर्भ स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य रानी लक्ष्मीबाई का अपमान करना नहीं था, बल्कि इतिहास में वंचित समाज के योगदान को उजागर करना था। बरैया ने बताया, "मेरा संदर्भ यह था कि झांसी में रानी लक्ष्मीबाई की सहयोगी झलकारी बाई कोरी थीं, जिन्होंने उनके लिए लड़ाई लड़ी और अपनी जान दी। लेकिन इतिहासकारों ने उनका नाम दर्ज नहीं किया। मैं यह कहना चाहता था कि समाज के कुछ वर्गों के योगदान को दबाया गया।"
रानी लक्ष्मीबाई की "आत्महत्या" वाली टिप्पणी के बारे में पूछे जाने पर बरैया ने दावा किया कि उन्होंने "बुंदेलखंड का वृहद इतिहास" नामक किताब पढ़ी है, जिसमें यह लिखा है। उन्होंने कहा, "इस किताब के अनुसार, झांसी के शासक गंगाधर राव की कोई संतान नहीं थी। लॉर्ड डलहौजी की 'हड़प नीति' के तहत अंग्रेजों ने झांसी को हड़प लिया। रानी ने दामोदर निंबालकर को गोद लिया, लेकिन गोदनामा अदालत में रद्द हो गया। इसके बाद रानी को पेंशन और महल दिया गया, जहां वे 1853-54 से चार-पांच साल तक रहीं। बाद में बंगाल इन्फेंट्री के सिपाहियों ने उन्हें विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए धमकाया, तब वे लड़ीं।"
बरैया ने यह भी दावा किया कि रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर में अंग्रेजों से लड़ते हुए हार गई थीं और उन्होंने आत्महत्या कर ली। हालांकि, उन्होंने इस दावे का कोई ठोस स्रोत नहीं बताया, सिवाय "बुंदेलखंड का वृहद इतिहास" के हवाले के।
ऐतिहासिक तथ्य: रानी लक्ष्मीबाई और 1857 का विद्रोह
रानी लक्ष्मीबाई, जिनका मूल नाम मणिकर्णिका तांबे था, 1857 की क्रांति की सबसे प्रेरणादायक शख्सियतों में से एक हैं। 1838 में झांसी के राजा गंगाधर राव से उनका विवाह हुआ। 1851 में उनके बेटे दामोदर राव का जन्म हुआ, लेकिन चार महीने बाद उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद गंगाधर राव ने अपने भतीजे आनंद राव को गोद लिया, जिसका नाम दामोदर राव रखा गया। 1853 में गंगाधर राव की मृत्यु के बाद, लॉर्ड डलहौजी की 'हड़प नीति' के तहत अंग्रेजों ने झांसी को अपने कब्जे में ले लिया, क्योंकि उन्होंने गोदनामे को मान्यता नहीं दी।
रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी को बचाने के लिए कानूनी और सैन्य दोनों मोर्चों पर संघर्ष किया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में, जब बंगाल इन्फेंट्री के सिपाहियों ने विद्रोह किया, तो रानी ने उनकी अगुआई की। उन्होंने झांसी के किले की रक्षा की और अंग्रेजों के खिलाफ कई युद्ध लड़े। मार्च 1858 में अंग्रेजों ने झांसी पर हमला किया, लेकिन रानी ने अपने बेटे को पीठ पर बांधकर ग्वालियर की ओर प्रस्थान किया।
18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं। ब्रिटिश कमांडर ह्यूग रोज ने उनकी वीरता की तारीफ करते हुए कहा था, "1857 के विद्रोहियों में अगर कोई एक मर्द था, तो वह थी रानी लक्ष्मीबाई।" अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार, रानी युद्ध में घायल हुईं और शहीद हो गईं। उनके आत्महत्या करने का कोई ठोस ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है।
झलकारी बाई कोरी, रानी की सेना में एक महत्वपूर्ण योद्धा थीं, जिन्होंने रानी के छद्मवेश में लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों को भ्रमित किया। उनके बलिदान को इतिहास में दर्ज किया गया है, हालांकि कुछ इतिहासकारों ने इसे कमतर आंका।
"बुंदेलखंड का वृहद इतिहास": किताब का सच
बरैया ने अपने दावे के लिए "बुंदेलखंड का वृहद इतिहास" का हवाला दिया, लेकिन इस किताब की प्रामाणिकता पर सवाल उठ रहे हैं। इतिहासकारों और विद्वानों के अनुसार, ऐसी कोई मानक किताब नहीं है जो रानी लक्ष्मीबाई की आत्महत्या का दावा करती हो। बुंदेलखंड के इतिहास पर कई किताबें, जैसे वृंदावनलाल वर्मा की "झांसी की रानी" और महाश्वेता देवी की रचनाएं, रानी की वीरता और शहादत को रेखांकित करती हैं। बरैया द्वारा उल्लिखित किताब संभवतः कोई स्थानीय या गैर-मानक प्रकाशन हो सकता है, जिसका ऐतिहासिक मूल्य सीमित है।
बीजेपी की निंदा: "महारानी का अपमान"
लोकेंद्र पाराशर के वीडियो शेयर करने के बाद बीजेपी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। X पर कई यूजर्स ने बरैया के बयान को रानी लक्ष्मीबाई और 1857 की क्रांति का अपमान बताया। @iNishant4 ने लिखा, "महारानी लक्ष्मीबाई के बारे में कांग्रेस के इस विधायक के शब्द कांग्रेस की बीमार मानसिकता और ओछेपन का प्रतीक है।" @RaajJagtap5 ने लिखा, "यह कांग्रेसी व्यक्ति कथित MLA फूल सिंह बरैया 1857 की महान क्रांतिकारी वीरांगना रानी लक्ष्मी जी का अपमान कर रहा है। इस व्यक्ति पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए।"
बीजेपी के प्रवक्ता आशीष अग्रवाल ने कहा, "रानी लक्ष्मीबाई भारत की शान हैं। उनके बलिदान को आत्महत्या कहना न केवल ऐतिहासिक तथ्यों का अपमान है, बल्कि देश की नारी शक्ति का भी तिरस्कार है। कांग्रेस को अपने विधायक पर कार्रवाई करनी चाहिए।"
कांग्रेस का बचाव: "बयान को तोड़ा-मरोड़ा गया"
कांग्रेस ने बरैया के बयान का बचाव करते हुए कहा कि उनके शब्दों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। भांडेर के स्थानीय कांग्रेस नेता योगेश दंडोतिया ने कहा, "फूल सिंह बरैया ने रानी लक्ष्मीबाई का अपमान नहीं किया। उनका मकसद झलकारी बाई जैसे वंचित समाज के नायकों को सम्मान देना था। बीजेपी इस बयान को सांप्रदायिक रंग देकर राजनीति कर रही है।"
कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता केके मिश्रा ने कहा, "बरैया एक दलित नेता हैं, और बीजेपी उनके बयान को गलत संदर्भ में पेश करके दलित समाज को अपमानित कर रही है। रानी लक्ष्मीबाई सभी की प्रेरणा हैं, और हम उनके योगदान का सम्मान करते हैं।"
बरैया का इतिहास: विवादों का सिलसिला
फूल सिंह बरैया पहले भी अपने बयानों के लिए विवादों में रहे हैं। 2023 में उन्होंने दावा किया था कि अगर बीजेपी मध्य प्रदेश में 50 सीटें जीतती है, तो वे अपना मुंह काला करेंगे। बीजेपी की 163 सीटों की प्रचंड जीत के बाद, बरैया ने 7 दिसंबर 2023 को भोपाल में राजभवन के सामने अपना मुंह काला किया, जिसने उन्हें राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया।
2024 में बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र शास्त्री की हिंदू एकता पदयात्रा पर बरैया ने टिप्पणी की थी कि "यह धार्मिक यात्रा लोगों को धर्मांध बनाने का काम कर रही है।" 2020 में भांडेर उपचुनाव के दौरान उनके एक वीडियो में कथित तौर पर सवर्णों और महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी थी, जिसके बाद उनकी पिटाई का वीडियो भी वायरल हुआ था।
विवाद या ऐतिहासिक बहस?
फूल सिंह बरैया का वीडियो और उनका बयान रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि के मौके पर एक गंभीर बहस को जन्म दे गया है। जहां बीजेपी इसे रानी का अपमान बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे दलित समाज और झलकारी बाई के योगदान को उजागर करने की कोशिश करार दे रही है। ऐतिहासिक तथ्य बरैया के "आत्महत्या" दावे का समर्थन नहीं करते, और उनके द्वारा उल्लिखित किताब की प्रामाणिकता भी संदिग्ध है।
यह विवाद एक बार फिर यह सवाल उठाता है कि क्या राजनीतिक बयानबाजी में ऐतिहासिक शख्सियतों को विवाद का हिस्सा बनाना उचित है? रानी लक्ष्मीबाई, जिन्होंने 1857 की क्रांति में अपने प्राणों की आहुति दी, आज भी भारत की नारी शक्ति और स्वतंत्रता की प्रतीक हैं। क्या बरैया का बयान एक गलतफहमी है, या यह कांग्रेस की "बीमार मानसिकता" का हिस्सा है, जैसा कि बीजेपी दावा कर रही है? यह सवाल पाठकों के लिए खुला है।
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