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MP News: 2 लाख 75 हजार कर्मचारियों की पुकार, 11 महीने का एरियर अटका, हाई कोर्ट का आदेश ठेंगे पर

MP news: मध्य प्रदेश में आउटसोर्स कर्मचारियों का दर्द अब सड़कों पर उतरने को तैयार है। प्रदेश के 2 लाख 75 हजार आउटसोर्स कर्मचारी 11 महीने से अपने बकाया एरियर के लिए भटक रहे हैं। करीब 350 करोड़ रुपये की यह राशि अटकी पड़ी है, और श्रम न्यायालय के नवंबर 2024 के स्पष्ट आदेश के बावजूद विभागीय अधिकारी और ठेकेदार टालमटोल कर रहे हैं।

कर्मचारियों का आरोप है कि न तो पुराने ठेकेदार जिम्मेदारी ले रहे हैं, न ही नए ठेकेदार पुराने बकाया का भुगतान कर रहे हैं। यह मामला अब न केवल आर्थिक संकट का, बल्कि सरकारी तंत्र की मनमानी और ठेकेदारी प्रथा की खामियों का भी प्रतीक बन गया है।

11 months arrears of 2 lakh 75 thousand outsourced employees stuck mp High Court order ignored

350 करोड़ का बकाया, कर्मचारियों का हक अधर में

मध्यप्रदेश के विभिन्न सरकारी और अर्ध-सरकारी विभागों में कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारी-जिनमें सफाईकर्मी, डाटा एंट्री ऑपरेटर, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, और स्वास्थ्यकर्मी शामिल हैं-पिछले 11 महीनों से अपने बकाया एरियर की राह देख रहे हैं। यह एरियर न्यूनतम वेतन में संशोधन और अन्य श्रम कानूनों के तहत देय है, जिसे श्रम न्यायालय ने नवंबर 2024 में भुगतान करने का आदेश दिया था। लेकिन कर्मचारियों का कहना है कि न तो विभागीय अधिकारी और न ही ठेकेदार इस आदेश को गंभीरता से ले रहे हैं।

ऑल डिपार्टमेंट आउटसोर्स संयुक्त संघर्ष मोर्चा के प्रांतीय संयोजक मनोज भार्गव ने गुस्से में कहा, "यह कर्मचारियों के साथ खुला अन्याय है। श्रम न्यायालय का आदेश साफ है, फिर भी अधिकारी और ठेकेदार मिलीभगत कर भुगतान को टाल रहे हैं। 350 करोड़ की राशि अटकी है, जिससे लाखों परिवार आर्थिक संकट में हैं।" भार्गव ने बताया कि नियमों के अनुसार, ठेकेदार को पहले अपनी जेब से कर्मचारियों को एरियर का भुगतान करना होता है, फिर वह संबंधित विभाग से बिल के जरिए राशि वसूलता है। लेकिन ठेकेदार इस प्रक्रिया में रुचि नहीं दिखा रहे, क्योंकि इसमें उन्हें कोई "कमीशन" नहीं मिलता।

outsource employees: ठेकेदारों की मनमानी, पुराने-नए दोनों बेपरवाह

कर्मचारियों की शिकायत है कि कई जिलों में पुराने ठेकेदारों के कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो चुके हैं, और नए ठेकेदार पुराने बकाया भुगतान की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर रहे हैं। भोपाल के एक सफाईकर्मी रामलाल ने बताया, "हमारा पुराना ठेकेदार मार्च 2024 में बदल गया। नए ठेकेदार का कहना है कि पुराना बकाया उसकी जिम्मेदारी नहीं है। पुराना ठेकेदार अब फोन तक नहीं उठाता। हम बीच में फंस गए हैं।"

इंदौर में कार्यरत डाटा एंट्री ऑपरेटर श्वेता वर्मा ने कहा, "11 महीने का एरियर मतलब मेरे लिए 50 हजार रुपये से ज्यादा। इस पैसे से मैं अपने बच्चे की स्कूल फीस और मां का इलाज कर सकती थी। लेकिन अब हर महीने कर्ज लेना पड़ रहा है।" कर्मचारियों का कहना है कि ठेकेदारों की यह मनमानी नई नहीं है। कई बार वेतन भी 3-4 महीने देरी से मिलता है, और अब एरियर का मामला उनकी मुश्किलों को दोगुना कर रहा है।

outsource employees: बजट का बहाना, सच्चाई कुछ और

विभागीय अधिकारी बार-बार बजट की कमी का हवाला दे रहे हैं, लेकिन कर्मचारी संगठनों का दावा है कि यह महज बहाना है। सूत्रों के मुताबिक, एरियर भुगतान के लिए 350 करोड़ रुपये का बजट 1 अप्रैल 2024 को ही आवंटित हो चुका था। ऑल डिपार्टमेंट संयुक्त संघर्ष मोर्चा के एक पदाधिकारी ने बताया, "बजट तो मौजूद है, लेकिन ठेकेदारों को इस भुगतान में कोई 'मुनाफा' नहीं दिख रहा। वे कमीशन के चक्कर में भुगतान को टाल रहे हैं, और अधिकारी उनकी मदद कर रहे हैं।"

कर्मचारी संगठनों ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ विभागों में ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच सांठगांठ है। मंडला जिले के एक स्वास्थ्यकर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "हमारे जिले में ठेकेदार ने खुले तौर पर कहा कि बिना 'कट' के वह भुगतान नहीं करेगा। अधिकारी भी चुप हैं, क्योंकि उन्हें भी हिस्सा मिलता है।"

श्रम न्यायालय का आदेश, फिर भी बेकार

नवंबर 2024 में श्रम न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिया था कि सभी आउटसोर्स कर्मचारियों को 11 महीने का बकाया एरियर तत्काल भुगतान किया जाए। इस आदेश में यह भी कहा गया था कि यदि ठेकेदार भुगतान करने में असमर्थ है, तो संबंधित विभाग के प्रिंसिपल नियोजक (प्रमुख नियोक्ता) को यह जिम्मेदारी लेनी होगी। लेकिन छह महीने बीत जाने के बावजूद, न तो ठेकेदारों ने भुगतान किया और न ही विभागों ने कोई ठोस कदम उठाया।

कर्मचारी संगठन सीटू यूनियन के नेता रमेश ठाकुर ने कहा, "यह हाई कोर्ट के आदेश की अवमानना है। हम जल्द ही इस मामले को दोबारा कोर्ट में ले जाएंगे। अगर सरकार और अधिकारी नहीं जागे, तो कर्मचारी सड़कों पर उतरेंगे।" ठाकुर ने यह भी बताया कि कुछ कर्मचारियों ने स्थानीय स्तर पर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया है, और जल्द ही भोपाल में एक बड़ा आंदोलन हो सकता है।

आउटसोर्सिंग की खामियां उजागर

यह मामला मध्यप्रदेश में आउटसोर्सिंग प्रथा की खामियों को भी उजागर करता है। 31 मार्च 2023 को वित्त विभाग ने एक अधिसूचना जारी कर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती आउटसोर्स एजेंसियों के माध्यम से करने का निर्देश दिया था। लेकिन इस व्यवस्था को अनुसूचित जाति जनजाति अधिकारी-कर्मचारी संघ (अजाक्स) ने हाई कोर्ट में चुनौती दी, इसे "मानव तस्करी" जैसा अमानवीय कृत्य करार दिया।

अजाक्स का कहना है कि आउटसोर्सिंग के जरिए कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन, नौकरी की सुरक्षा, या सामाजिक लाभ नहीं मिलते। ठेकेदार मनमाने तरीके से वेतन काटते हैं और बिना कारण नौकरी से निकाल देते हैं। भोपाल में हुए एक प्रदर्शन में कर्मचारी वासुदेव शर्मा ने कहा था, "हमारे वेतन से 18% जीएसटी तक काटा जाता है। 2-3 हजार रुपये में घर कैसे चले? सरकार न्यूनतम वेतन 21 हजार करे।"

कर्मचारियों का दर्द, परिवारों पर संकट

आउटसोर्स कर्मचारियों की कमाई पर न केवल उनका, बल्कि उनके परिवारों का भविष्य भी टिका है। जबलपुर के एक चौकीदार मोहनलाल ने बताया, "मुझे 8 हजार रुपये वेतन मिलता है, जो कई बार देरी से आता है। एरियर के 40 हजार रुपये मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं। मेरी बेटी की शादी के लिए मैंने कर्ज लिया था, जो अब ब्याज सहित बढ़ता जा रहा है।"

इसी तरह, ग्वालियर की एक नर्स सुनीता कुशवाह ने कहा, "हमने कोविड के दौरान जान जोखिम में डालकर काम किया, लेकिन आज हमारा हक मारा जा रहा है। ठेकेदार और अधिकारी हमें मजदूर से ज्यादा कुछ नहीं समझते।" कर्मचारियों का कहना है कि एरियर की राशि उनके लिए केवल पैसे नहीं, बल्कि उनकी मेहनत और हक का प्रतीक है।

सरकार का रुख, वादे और हकीकत

2023 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए वेतन वृद्धि और संविदा लाभ का वादा किया था। लेकिन कर्मचारी संगठनों का कहना है कि ये वादे कागजों तक सीमित रह गए। भोपाल में 22 सितंबर 2024 को हुए एक प्रदर्शन में हजारों कर्मचारियों ने नौकरी की सुरक्षा और 21 हजार रुपये न्यूनतम वेतन की मांग की थी, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया।

श्रम विभाग ने 2024 में आदेश जारी किया था कि आउटसोर्स कर्मचारियों को ग्रेच्युटी, बीमा, और न्यूनतम वेतन जैसे लाभ दिए जाएं। लेकिन कई विभागों में इन आदेशों का पालन नहीं हो रहा। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि सरकार ठेकेदारों पर नकेल कसने के बजाय उनकी मनमानी को बढ़ावा दे रही है।

क्या है समाधान?

  • कर्मचारी संगठन और विशेषज्ञ इस समस्या के समाधान के लिए कई सुझाव दे रहे हैं:
  • ठेकेदारों पर सख्ती: ठेकेदारों को समयबद्ध भुगतान के लिए जवाबदेह बनाया जाए। गैर-अनुपालन पर उनके कॉन्ट्रैक्ट रद्द किए जाएं।
  • प्रिंसिपल नियोजक की जिम्मेदारी: विभागों को ठेकेदारों की लापरवाही की स्थिति में सीधे भुगतान की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
  • आउटसोर्सिंग नीति में सुधार: न्यूनतम वेतन, नौकरी की सुरक्षा, और सामाजिक लाभ सुनिश्चित करने के लिए नीति को संशोधित किया जाए।
  • नियमितीकरण: लंबे समय से कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
  • आगे क्या?

कर्मचारी संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही एरियर का भुगतान नहीं हुआ, तो वे भोपाल में बड़े पैमाने पर आंदोलन करेंगे। मनोज भार्गव ने कहा, "हमारे पास अब धैर्य नहीं बचा। अगर सरकार नहीं सुनती, तो लाखों कर्मचारी सड़कों पर उतरेंगे। यह केवल एरियर का सवाल नहीं, बल्कि हमारे सम्मान और हक का है।"

मध्यप्रदेश में आउटसोर्स कर्मचारियों की यह जंग अब एक निर्णायक मोड़ पर है। एक तरफ हाई कोर्ट का आदेश और कर्मचारियों का हक, दूसरी तरफ ठेकेदारों की मनमानी और अधिकारियों की चुप्पी। सवाल यह है कि क्या सरकार इन कर्मचारियों की पुकार सुनेगी, या यह मामला कोर्ट की चौखट पर और लंबा खिंचेगा? फिलहाल, 2 लाख 75 हजार कर्मचारियों की निगाहें न्याय की उम्मीद पर टिकी हैं।

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