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उत्तर प्रदेश सरकार में अब केवल टीम-11 का बोलबाला, योगी कैबिनेट के मंत्री सीन से गायब

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दो डिप्टी सीएम को लेकर कुल 23 कैबिनेट मंत्री, नौ राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और 22 राज्यमंत्री हैं। पर, कोरोना महामारी से निपटने, राज्य में आपराधिक घटनाओं पर हुए विवाद तथा अन्य मसलों के बीच सीएम और उनकी टीम 11 की सक्रियता तो सभी को पता चल रही है पर, अन्य मंत्रिगण में से ज्यादातर सोशल मीडिया पर ही दिखाई दे रहे हैं। सरकार की उपलब्धियाँ, जानकारियाँ, सभी बातें अफसरों के माध्यम से ही बाहर आ रही हैं।कैबिनेट के छोटे-छोटे फैसले ब्रीफ करने वाले सरकार के प्रवक्ता/मंत्रिगण अभी भी नहीं दिख रहे हैं। बीते लगभग छह महीने से आमजन की नजर में राज्य की कमान सीएम और उनकी टीम 11 के हाथों में है। टीम 11 अफसरों का एक समूह है। सीएम के नेतृत्व में यह टीम अपना काम कर रही है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि मुख्यमंत्री खुद लगातार बिना रुके, बिना थके, काम कर रहे हैं। उनके राजनीतिक विरोधियों को छोड़ दें तो उनकी मेहनत से शायद ही कोई इनकार करे।

Team eleven in prominence not ministers in Yogi govt now

आमजन हो या ख़ास, सब मानते हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ बहुत मेहनत करते आ रहे हैं। उनकी मेहनत को पलीता लगाने में बलिया जिले के भाजपा एमएलए सुरेन्द्र सिंह जैसे लोग जरुर हैं जो समय-समय पर अपने विवादित बयानों से पार्टी और सीएम के काम को नुकसान पहुंचाते रहते हैं। ताजा मामला हत्या आरोपी धर्मेन्द्र सिंह के पक्ष में खुलकर आने का है, जिस पर भरी भीड़ में अफसरों के सामने एक व्यक्ति को गोली मारकर हत्या करने का आरोप है। इन्हीं विधायक जी ने पिछले दिनों बलात्कार की बढ़ती घटनाओं पर भी विवादित बयान दिया था। कई और भी हैं, जो समय-समय पर अपने बयानों के जरिये सरकार को असहज करते आ रहे हैं| बावजूद इसके सीएम की मेहनत से कोई इनकार नहीं करता।

कोरोना से निपटने को बनी टीम 11

कोरोना शुरू हुआ तो उस समय राज्य में अचानक ऐसी अनेक गतिविधियाँ बढीं, जिससे निपटने को सरकार तैयार नहीं थी और इन्हीं आकस्मिक हालातों से निपटने के लिए टीम 11 का गठन हुआ। इसमें वरिष्ठ अधिकारी शामिल किये गये, जो रोज सीएम के साथ बैठते। नीति बनाते और सार्वजनिक करने वाली सूचनाएं मीडिया के माध्यम से यही टीम बताती। कुछ दिन तक लोगों को लगा कि अभी कठिन समय है। लॉकडाउन चल रहा है, इसलिए ऐसा हो रहा है। पर अब, जब धीरे-धीरे सातवां महीना शुरू हो गया तब भी मंत्रिमंडल के सदस्यों की सक्रियता का न दिखना इस चर्चा पर बल देता है कि आखिर मंत्रिगण हैं कहां? क्योंकि उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर शुभकामनाएं, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की जन्मतिथि-पुण्यतिथि पर नियमित पोस्ट तो दिखती है, पर सरकार में उनकी सक्रियता न के बराबर दिखती है। इसीलिए अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये मंत्रिगण राज्य की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभा रहे हैं? हालाँकि, यह सम्भव है कि वे बहुत अच्छा काम कर रहे हों लेकिन उसका असर सामान्यजन के जीवन पर अभी न दिख रहा हो। पर, आमजन अपने मंत्रियों-विधायकों को तो हर हाल में अपने लिए मेहनत करते देखना चाहते हैं। इसीलिए अनेक सवाल उठना लाजिमी है।

मंत्रिमंडल उपयोगी नहीं तो क्यों न बदल दिया जाए?

सवाल यह भी है कि मंत्रिमंडल की उपयोगिता कौन ख़त्म कर रहा है? कहाँ से आ रही है यह ताकत? भारतीय संविधान और लोकतंत्र की मूल भावना की हत्या कौन कर रहा है? भरपूर मंत्रिमंडल के रहते हुए टीम 11 पर सीएम की निर्भरता के पीछे क्या कारण है? क्या यह मंत्रिमंडल अब भरोसे का नहीं रहा या कोई और बात है? अगर मंत्रिमंडल के सदस्य अपना बेस्ट नहीं दे पा रहे हैं या वे आमजन और मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं तो क्यों न उन्हें बदल दिया जाए? जनता की गाढ़ी कमाई से गाड़ी, बंगला, गाड़ियों का काफ़िला यूँ ही चलाना तो उचित नहीं कहा जाएगा| सक्रियता से मंत्रियों और उनके विभागों के नाम जानना आसान होता है| नाम, विभाग लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं| आज अगर प्रतियोगी परीक्षाओं में कैबिनेट मंत्रियों के नाम पूछे जाएँ तो दर्जन भर नाम लेना किसी भी स्टूडेंट के लिए मुश्किल होगा| विभागवार मंत्रिगण को जानना तो और कठिन साबित होगा। राज्य में विधान सभा चुनाव की दुंदुभि अगले वर्ष बज जाएगी। ऐसे में कमजोर मंत्रिगण कौन सा चेहरा लेकर अपने इलाके में जाएँगे? अगर वे काम ही नहीं करेंगे तो जनता को क्या जवाब देंगे?

भारतीय संविधान की मूल भावना भी हो रही आहत

भारतीय संविधान की धारा 164 की उपधारा दो के अनुसार मंत्रि-परिषद राज्य की विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी| क्या यही सामूहिक उत्तरदायित्व निभा रहे हैं मंत्रिमंडल के सदस्य? शायद नहीं| इस मसले पर कोई भी मंत्री या सत्ताधारी दल का विधायक कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है| सब के सब शो-पीस बनकर अपनी जगह पर बैठे हैं। कुर्सी बचाकर रखने के लिए दूसरा कोई बेहतरीन विकल्प भी इनके पास नहीं है। एक विधायक जी कहते हैं-दिक्कतें तो हैं। अफसर मंत्रियों-विधायकों की न के बराबर सुन रहे हैं। यह खतरनाक है। हर बात के लिए मुख्यमंत्री जी तक पहुंचना संभव नहीं हो पाता। क्या करें? कारण पूछने पर वे कहते हैं कि वर्ष वर्ष 1985 में भारतीय संविधान के 52वें संशोधन के बाद एंटी डिफेक्सन बिल आया। इस कानून ने विधायिका और कार्यपालिका में एक अजब गठजोड़ पैदा किया। एमपी, एमएलए कमजोर होते गए। इस वजह से लोकतंत्र को भी लगातार नुकसान हो रहा है। कोई चाहकर भी पार्टी लाइन से नहीं हट सकता। असहमत होने के बावजूद विधान सभा में हम पार्टी व्हिप के खिलाफ नहीं जा सकते। वे कहते हैं कि जनता ने हमें चुना है। हमने विधान मंडल दल का नेता चुना है। नेता ने मंत्रिगण को चुना है। कानूनन मेरी जवाबदेही जनता के प्रति, मंत्रिगण की जिम्मेदारी हमारे प्रति है लेकिन एक गलती ने लोकतंत्र को कमजोर कर दिया है। अब चूंकि, यह कानूनी बदलाव सत्ताधारी दल को सूट करता है, इसलिए इस कानून में बदलाव की संभावनाएं भी क्षीण हो जाती हैं।

टीम 11 में हैं कौन?

आरके तिवारी, आलोक टंडन, आलोक सिन्हा, अवनीश अवस्थी, रेणुका कुमार, अमित मोहन प्रसाद, संजीव मित्तल, देवेश चतुर्वेदी, मनोज कुमार सिंह, भुवनेश कुमार (सभी वरिष्ठ आईएएस) और हितेश चन्द्र अवस्थी, डीजीपी यूपी।

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