यूपी में भाजपा का बड़ा दांव, जीत का मंत्र साबित हो सकता है यह कदम

बात गर सियासत की हो तो आपका कौन सा दांव आप पर ही उल्टा पड़ जाए कहना बेहद मुश्किल है। हालांकि आम तौर पर इन सारी बातों को भले ही तवज्जों न दी जाए लेकिन जब चुनाव सिर पर हों तो निश्चित ही कदम कदम फूंक फूंक कर रखे जाते हैं। दरअसल विधानसभा चुनावों के लिहाज से बिहार हो या फिर दिल्ली दोनों ही जगहों पर जब बीजेपी के साथ वो पंक्तियां चरितार्थ हो गई कि टांय-टांय फिस्स....तो यूपी को लेकर लोगों ने चाय पर चर्चा में इस बात को शामिल कर लिया कि इस बार रणनीति कुछ तगड़ी ही होगी। पर, यूपी की राजनीति में बीजेपी खेमे से इस बात की सुगबुगाहट शुरू हो गई है कि हो सकता है अरविंद मेनन को यूपी में संगठन महामंत्री का पदभाार सौंप दिया जाए।

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कौन हैं अरविंद मेनन?

मेनन मध्यप्रदेश में काफी लंबे समय से संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उन्होंने विधानसभा चुनावों में भी अहम भूमिका निभाई थी। अरविंद मेनन मूलतया बनारस के रहने वाले हैं। मेनन को संगठन और चुनाव की महारथ हासिल है जिस वजह से पार्टी उन्हें यूपी भेजने का मन बना रही है।

यौन शोषण का लगा था आरोप?

मध्यप्रदेश बीजेपी के संगठन मंत्री अरविन्द मेनन पर सुशीला मिश्रा नाम की महिला ने यौन शोषण का आरोप लगाया था। फ़रवरी 2011 को उस महिला ने मानव अधिकार आयोग में इस बात की शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद आयोग ने जांच के लिए शिकायत भेज दी, लेकिन जो पता शिकायत में था वहां से कोई जवाब नहीं आया। पुलिस ने बताया कि महिला का कोई पता नहीं है, ना ही वो पुलिस के सामने बयान दर्ज करवाने आई। कांग्रेस का आरोप है कि शिकायत के बाद से महिला गायब है और यदि शिकायत झूठी है तो पुलिस को महिला को पेश करना चाहिए।

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आखिर कहां गायब हो गई ''सुशीला''

राजनीति के लिहाज से खुद को जनता का सबसे बड़ा हिमायती बताने भर के लिए सुशीला की खोजबीन की खातिर आवाजें बुलंद हुईं। उस वक्त प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर सीबीआई जांच कराने की मांग की थी। लेकिन जांच हो या फिर महिला की खोजबीन के आश्वासन महज पीले पन्नों में चढ़कर गुमनाम होग। न अब तक यह पता चल पाया है कि सुशीला कहां है, किस हाल में है।

चुनाव के दौरान उठ सकता है सवाल

दरअसल कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि विपक्षियों को एक मुद्दा चाहिए। हालांकि पहले से ही प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी और प्रदेश संगठन महामंत्री सुनील बंसल के बीच छत्तीस का आंकड़ा पार्टी में घमासान की बात को लेकर भाजपा को चुनावी लिहाज से कठघरे में खड़ा करता रहा है। फिर अरविंद मेनन पर लगे इस आरोप को चुनाव के दौर न भुनाने के लिए राजनीतिक पार्टियां पुरजोर कोशिशें करेंगी।

किस तरह से मिल सकता है फायदा

अरविंद मेनन की शिक्षा बनारस के हिंदू विश्वविद्यालय में हुई। संघ से बाल्यकाल से ही जुड़े रहे मेनन युवावस्था में दिल्ली आ गए। यहां बाद में उन्हें युवा मोर्चा के कार्यालय प्रभारी की जिम्मेवारी दी गई। यह उनका काम ही था कि संघ ने उनकी सेवाएं मध्यप्रदेश में लेने का तय किया गया और दिल्ली से उन्हें सीधे इंदौर भेजा गया। यहा उन्हें इंदौर महानगर के संगठन की जिम्मेवारी दी गई।

इंदौर महानगर में उनके बेहतर काम को देखते हुए कुछ ही समय बाद उन्हें यहां का संभागीय संगठन मंत्री बना दिया गया। 2006 में जब कप्तान सिंह संगठन के प्रदेश महामंत्री बने तो उन्हें सह संगठन मंत्री बनाया गया। पहले उन्हें मालवा का प्रभार दिया गया और उसके बाद महाकौशल में संगठन को मजबूत करने के लिए उन्हें लगाया गया।

मेनन ने मालवा और महाकौशल को भाजपा के अभेद गढ़ के रूप में तब्दील कर दिया गया। 2010 में आरएसएस ने उन्हें प्रदेश के संगठन महामंत्री की जिम्मेवारी दी। संगठन को क्रियाशील रखने में मेनन को महारथ हासिल है। कार्यकर्ताओं को एक के बाद एक कार्यक्रम देकर उन्हें व्यस्त रखना और कार्यक्रमों की मॉनीटरिंग के लिए लगातार प्रवास करना उन की फितरत में शामिल है। जिसका फायदा शायद बीजेपी को मिल सकता है।

बाकी जनता तय करेगी

निश्चित तौर पर राजनीति में तैयारियों का खासा महत्व होता है। क्योंकि मतदाता तैयारियों के आधार पर झुकाव लेता है। हालांकि कुछ पारंपरिक सोच के अनुसार मतदान करते हैं। वहीं कुछ नफा और नुकसान को रण में उतरी सभी पार्टियों के साथ बारी बारी रखकर तलाशने की कोशिश करती हैं। इसमें उनका उद्देश्य ये होता है कि आखिरकार उनके काम कौ न आएगा। कितना फायदा उन्हें यानि की जनता को मिलेगा। और फलां फलां। कुलमिलाकर जनता को तय करना है कि वो यूपी की सत्ता किसके हाथों में सौंपेगी।

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