बाराबंकी की शाइस्ता ने मेडिकल शिक्षा में हासिल किए सात स्वर्ण पदक

जहां शाइस्ता के परिवार के लिए यह बेहद खुशी का पल है तो वहीं खुद शाइस्ता के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा ही है। शाइस्ता ने बताया कि बचपन के इस सपने को साकार करने में उनके पिता का बहुत बड़ा योगदान है।
उनके पिता ने काफी मुश्किलों और कठिनाईयों को सहकर भी उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। आज शाइस्ता उस मुकाम पर पहुंच गई हैं जहां वह शाइस्ता से डॉक्टर शाइस्ता बन गई है और वह भी सात गोल्ड मेडल वाली डॉक्टर शाइस्ता।
शाइस्ता ने अगर डॉक्टर बनने का सपना देखा तो इसके पीछे की वजह काफी रोचक है। शाइस्ता ने बताया कि क्योंकि डॉक्टर कभी रिटायर नहीं होते इसलिए वह सिर्फ इसी काम को करना चाहती थीं ताकि ताउम्र अपनी सेवाएं लोगों के बीच दे सकें।
शाइस्ता कहती हैं कि इसी मकसद के साथ वह अपना करियर शुरू करने जा रही हैं। शाइस्ता का मकसद गरीबों और असहायों की सेवा कर एक डॉक्टर के तौर पर अपनी जिंदगी को यादगार बनाना चाहती हैं।












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