Bada Mangal in Lucknow: तीन सदियों पुरानी है ये परम्परा, बड़े मंगल को लेकर अलग-अलग हैं मान्यताएं
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मंगलवार को पहला बड़ा मंगल है। इस दिन पूरे शहर में कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। बताया जाता है कि बड़ा मंगल की परम्परा यहां तीन सदी पुरानी है।

Bada Mangal fair at Hanuman temple: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बडे़ मंगल का आयोजन बड़े पैमाने पर होता है। लखनऊ में कई जगहों पर इसका आयोजन होता है और इस दौरान धार्मिक आस्था देखते ही बनती है। हालांकि इस तीन सदी में पहली बार कोरोना के दौरान बड़े मंगल का आयोजन प्रभावित हुआ था। महामारी की वजह से यह परम्परा पहली बार टूट गई थी। धार्मिक समितियों के आंकड़ों के अनुसार लखनऊ में 50,000 से ज्यादा भक्त बड़ा मंगल मनाने के लिए मंदिर आते हैं।
प्लेग महामारी के बाद से शुरू हुई ये परम्परा?
अलीगंज श्री महावीर जी ट्रस्ट के अनिल तिवारी ने बताया कि बड़ा मंगल पर मेले की परंपरा शहर में बहुत पहले प्लेग की चपेट में आने के बाद शुरू हुई थी। जो उस समय मंदिर के अंदर थे वे सुरक्षित रहे। तब से हर साल मेले का आयोजन किया जा रहा है। बीच में कोरोना की वजह से बड़ा मंगल का आयोजन प्रभावित हुआ था। इस दिन लखनऊ समेत आसपास के कई जिलों में भंडारों का आयोजन किया जाता है। लखनऊ में यह बड़े पैमाने पर मनाया जाता है क्योंकि लखनऊ को लक्ष्मण की नगरी भी कही जाती है।
नवाब वाजिद अली शाह के टाइम में बना था प्रचीन हनुमान मंदिर
मान्यताओं के मुताबिक, अलीगंज की गलियों में बसा 'पुराना हनुमान मंदिर' अन्य मंदिरों से अलग है। मंदिर के गुंबद के ऊपर स्थित 'चाँद तारा' अवध की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सदियों से ली आ रही संस्कृति का सच्चा प्रतीक है। यह मंदिर 170 साल से अधिक पुराना है। बताया जाता है कि मूल रूप से जनाब-ए-अलियाह (मलिका किश्वर), नवाब वाजिद अली शाह की मां और नवाब अमजद अली शाह की दूसरी पत्नी के आदेश पर बनाया गया था।
पुत्र रत्न प्राप्त होने के बाद बना हनुमान मंदिर
मंदिर मुस्लिम बेगम द्वारा बनाया गया था और तब से खड़ा है। मुख्य पुजारी रामू मिश्रा ने कहा कि इसमें हिंदू और इस्लामी दोनों स्थापत्य शैली का प्रयोग किया गया है। ऐसा कहा जाता है कि जब बेगम जनाब-ए-अलियाह गर्भवती नहीं हो सकीं, तो उन्होंने भगवान हनुमान से प्रार्थना की और उन्हें एक बच्चे का आशीर्वाद मिला। इसके बाद उन्हीं के द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया। यह भी कहा जाता है कि जब सीता को वनवास के लिए भेजा गया था तो आज जिस स्थान पर मंदिर मौजूद है, वही स्थान था जहां उन्होंने विश्राम किया था और भगवान हनुमान उनकी सुरक्षा के लिए उपस्थित थे।
तीन सदियों से जारी है यह परम्परा
जानने वाले बताते हैं कि बाद में बड़ा मंगल मेले की परंपरा भी यहीं से शुरू हुई। यह आज तक जारी है और सभी धर्मों के लोग इसमें हिस्सा लेते हैं और भाईचारे का संदेश देते हैं। इतिहासकार रोशन तकी के अनुसार 18वीं शताब्दी के आसपास जनाब-ए-अलियाह अलीगंज गए थे। उनके आगमन पर क्षेत्र के तत्कालीन निवासियों ने उनसे एक मंदिर के निर्माण के लिए कहा। वह बिना किसी परेशानी के सहमत हो गए और मंदिर के निर्माण का आदेश दे दिया था।
सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है बड़ा मंगल का आयोजन
हालांकि मंदिर को लेकर कई मिथक और दावे हैं। कई लोग कहते हैं कि जनाब-ए-अलियाह ने एक दैवीय उपस्थिति का सपना देखा था, जब वह गर्भ धारण नहीं कर सकती थी तो भगवान हनुमान के सम्मान में एक मंदिर बनाने की आज्ञा दे रही थी। मंदिर के इतिहास से कई कहानियां जुड़ी हुई हैं, हालांकि, यह एक तथ्य है कि मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी के दौरान और बेगम के आदेश से हुआ था।'












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