औरंगाबाद सीट को लेकर कांग्रेस की फजीहत, वीडियो क्लीप वायरल होने के बाद निखिल समर्थकों में गुस्सा

नई दिल्ली। महागठबंधन में सीट बंटवारे के बाद बवाल शुरू हो गया है। औरंगाबाद की सीट कांग्रेस से छीन कर हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा को दिये जाने से कांग्रेस में बहुत नाराजगी है। इसके पहले माना जा रहा था कि पूर्व आइपीएस अधिकारी और कांग्रेस नेता निखिल कुमार को यहां से टिकट मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

औरंगाबाद सीट को लेकर कांग्रेस की फजीहत, जानिए पूरा मामला

यहां से हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के उपेन्द्र प्रसाद को टिकट दिया गया है। इससे नाराज निखिल समर्थकों ने बिहार कांग्रेस के दफ्तर सदाकत आश्रम में जम कर हंगामा किया। औरंगाबाद के मुद्दे पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इस बात के लिए भी नाराजगी है कि राजद ने सार्वजनिक मंच से खुलेआम पार्टी के अनुरोध को खारिज कर दिया। उन्होंने बिहार कांग्रेस के नेताओं की बेबसी पर भी गुस्सा जाहिर किया है।

कांग्रेस के अनुरोध को राजद ने मंच से ही खारिज किया

शनिवार को मीडिया में एक वीडियो क्लीप चर्चा का विषय बन गया। ये वीडियो क्लीप महागठबंधन के सीटों के एलान के समय का है। शुक्रवार को सीटों की घोषणा से ठीक पहले राजद सांसद मनोज झा और बिहार कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन झा धीमी आवाज में बातचीत करते नजर आ रहे हैं। मदन मोहन झा कहते हैं, क्या अभी औरंगाबाद सीट को छोड़ कर घोषणा नहीं हो सकती? इस पर मनोज झा कहते हैं कि सब कुछ तय हो गया है, अचानक कुछ बदलने से गड़बड़ हो जाएगी। राजद के इस तेवर से मदन मोहन झा चुप हो जाते हैं। इस वीडियो क्लीप के सार्वजनिक होने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं में रोष है। राजद की हनक और पार्टी की लाचारी से कांग्रेस के कार्यकर्ता अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

क्या बोले जीतन राम मांझी ?

हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा यानी हम के प्रमुख कांग्रेस के इस विरोध अनुचित मान रहे हैं। उन्होंने कहा कि औरंगाबाद कांग्रेस की परम्परागत सीट रही है, लेकिन अभी इस पर भाजपा का कब्जा है। भाजपा को हराने के लिए यहां से सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखा गया है। मांझी का दावा है कि इस सीट पर दलित, पिछड़े और महागठबंधन समर्थक वोटरों की संख्या करीब 80 फीसदी है। इसलिए यह सीट हम को मिली है। काफी सोच समझ कर सीटों का बंटवारा किया गया है। अब कांग्रेस की नाराजगी का कोई मतलब नहीं है।

अखिलेश सिंह, मदन मोहन झा कठघरे में

जब मदन मोहन झा को बिहार प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था उसी समय सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह को बिहार लोकसभा चुनाव अभियान समिति की अध्यक्ष बनाय़ा गया था। उस समय अखिलेश सिंह ने बढ़ चढ़ कर कहा था कि मदन मोहन जी तो सीधे और कम बोलने वाले व्यक्ति हैं। अगर वे सीट बंटवारे या पार्टी की उम्मीदवारी को मजबूती से नहीं रख पाए तो वे लड़ने भिड़ने के लिए तैयार हैं। अपने आप को ताकतवर नेता बताने वाले अखिलेश सिंह के रहते कांग्रेस की सरेआम बेइज्जती हो गयी। हैरानी की बात ये है कि राजद के इस दुराग्रह पर कांग्रेस का कोई नेता कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है।

कौन हैं उपेन्द्र प्रसाद?

उपेन्द्र प्रसाद पिछड़े वर्ग से आते हैं। वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं। इकोनॉमिक्स में पीएचडी हैं और गया जिले के रहने वाले हैं। जदयू की राजनीति से जुड़े रहे। नीतीश कुमार ने उन्हें विधान पार्षद भी बनाया था। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद वे जदयू छोड़ कर हम पार्टी में शामिल हो गये। माना जा रहा था कि चुनाव लड़ने की डील पर ही उन्होंने हम ज्वाइन की थी। चर्चा है कि जीतन राम मांझी ने उपेन्द्र प्रसाद को राजनीतिक रूप से उपकृत किया है। निखिल कुमार की तुलना में उपेन्द्र प्रसाद का राजनीति अनुभव काफी कम है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यहां

महागठबंधन ने कमजोर उम्मीदवार

उतार कर भाजपा की राह को आसान कर दिया है। इसको लेकर जीतन राम मांझी पर आरोप भी लग रहे हैं। क्या जीतन राम मांझी को खुश करने के लिए राजद ने कांग्रेस के निखिल कुमार जैसे कद्दावर नेता को खारिज कर दिया। निखिल कुमार राजपूत समुदाय से आते हैं। दूसरी और भाजपा के उम्मीदवार सुशील सिंह भी इसी समुदाय से हैं। औरंगाबाद में इस जाति की अच्छी आबादी है। अगर नाराजगी में उन्होंने सुशील सिंह को अपना समर्थन दे दिया तो महागठबंधन की नैया मंझधार में फंस सकती है।

औरंगाबाद कांग्रेस के लिए क्यों है खास ?

बिहार की राजनीति में अहम मुकाम रखने वाले सत्येन्द्र नारायण सिंह इस सीट पर लगातार सात बार सांसद चुने गये थे। उनके पुत्र निखिल कुमार 2004 में यहां से सांसद चुने गये थे। निखिल कुमार की पत्नी श्यामा सिंह 1999 में यहां से सांसद चुनी गयीं थीं। सत्येन्द्र नारायण सिंह के पिता अनुग्रह नारायण सिंह और प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह को आधुनिक बिहार का निर्माता माना जाता है। इस लिहाज से औरंगाबाद की सीट कांग्रेस की परम्परागत सीट मानी जाती रही है। लेकिन 2019 में गठबंधन की राजनीति में कुछ इस तरह के दावपेंच चले गये कि यह सीट कांग्रेस से छिटक कर हम के ताजातरीन नेता के पास चली गयी।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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