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प्राचीन शिव मंदिर के प्रांगण में खिले केतिकी के फूल को देखने उमड़ी भीड़, शिव की पूजा में वर्जित है ये पुष्प

जिस महादेव की पूजा में ये फूल वर्जित है, उन्ही महादेव के मंदिर के सामने ये दुर्लभ फूल खिला है। खास बात तो ये है कि यह फूल केवल सावन में खिलता है लेकिन अभी तो सावन आने में लगभा 3 महीने का समय है।

Lakhimpur Crowd gathered to see Ketiki flower blooming in the courtyard of ancient Shiva temple

केतिकी का फूल एक ऐसा फूल है जिसका व्याख्यान प्राचीन समय से ही हमारे ग्रंथों में है पर इसे शिवजी को नहीं चढ़ाया जाता। इस फूल से हिन्दू धर्म की एक कहानी भी जुडी हुई है। ये फूल बेहद ही दुर्लभ प्रजाति का है जो प्रायः सावन के आगमन के साथ यानी वर्षा के मौसम में पाया जाता है। ये सब हम इसलिए बता रहे हैं क्योंकि यूपी के लखीमपुर में बेमौसम वो भी एक पौराणिक शिव मंदिर के सामने यह फूल खिला है जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। भारी संख्या में लोग इस फूल को देखने पहुंच रहे हैं।

Lakhimpur Crowd gathered to see Ketiki flower blooming in the courtyard of ancient Shiva temple

पौराणिक शिव मंदिर के सामने दुर्लभ केतकी का फूल

दरअसल, वन रेंज मोहम्मदी के आंवला जंगल के पास कठिना नदी किनारे स्थित पौराणिक शिव मंदिर के सामने दुर्लभ केतकी का फूल खिला है। जिसकी दिलकश खुशबु दूर दूर तक जा रही है। इस अति दुर्लभ केतकी के फूल को देखने के लिए भारी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। आंवला वन विभाग के वन रक्षक माया प्रकाश ने बताया कि वर्ष 2015 में केतकी के पौधे मंदिर प्रांगण में लगाए गए थे। जिसमें से दो पौधे मौजूद हैं। इनमे से एक पौधे में निकले केतकी के फूलों को देखकर लोग आश्चर्य चकित होकर देखने आते हैं।

Lakhimpur Crowd gathered to see Ketiki flower blooming in the courtyard of ancient Shiva temple

केतकी के फूल का उपयोग
केतकी के फूल अपनी दिलकश खुशबु की वजह से काफी मशहूर है। इसकी खुशबू आम फूलों के मुकाबले दीर्ध काल तक मौजूद रहती है। इसके अलावा केतकी बहुत उपयोगी है। केतकी के फूल का उपयोग सुगंध पूर्ण इत्र, कत्थे को सुवासित करने व जल, तेल, सौंदर्य उत्पाद में किया जाता है। केतकी का फूल अति प्राचीन काल से अस्तित्व में है। इसका प्रमाण रामायण एवं शिव पुराण जैसे पौराणिक ग्रंथों में भी मौजूद है।

Lakhimpur Crowd gathered to see Ketiki flower blooming in the courtyard of ancient Shiva temple

शिव पुराण में इस फूल का वर्णन
देवताओं को उनकी प्रिय सामग्री ही अर्पित की जाती है। लेकिन देवों के देव महादेव यानि भगवान शिव ही ऐसे देवता हैं जिन्हें तरह-तरह की सामग्री तो अर्पित की जाती है लेकिन इन्हें केतकी का फूल कभी नहीं चढ़ाया जाता है। इसका कारण शिव पुराण की एक कथा में मिलता है। यह कथा कुछ इस प्रकार है -

जब सम्पूर्ण जगत अंधकार में डूबा हुआ था तब स्वम्भू श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए। उनकी नाभि से एक कमल की उत्पत्ति हुई जिसमें पंचमुखी ब्रह्मा ध्यानमग्न थे। दोनों लेकर बहस छिड़ गई कि ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ कौन है? दोनों स्वयं को ही बड़ा सिद्ध करने में लगे हुए थे। उनका विवाद बढ़ता ही जा रहा था कि उनके मध्य एक अनंत अग्नि लिंग प्रकट हुआ और आकाशवाणी हुई कि जो कोई भी इसका छोर ढूंढ लेगा वही श्रेष्ठ होगा।

Lakhimpur Crowd gathered to see Ketiki flower blooming in the courtyard of ancient Shiva temple

ये सुनकर ब्रह्मा हंस के रूप में ऊपर और विष्णु वराह रूप में उस अग्निलिंग के नीचे उसका छोर पता करने के लिए चल दिए। कई हजार वर्षों तक दोनों अपनी अपनी दिशा में चलते चले गए लेकिन किसी को उस अग्निलिंग का छोर नहीं मिल रहा था। अंत में निराश होकर नारायण वापस अपने स्थान पर चले आये लेकिन ब्रह्मा जी अभी भी वापस नहीं लेट थे।

उधर कुछ ही समय पश्चात ब्रह्मा जी को रास्ते में केतिकी का एक फूल मिला। ब्रह्मा जी का अति तेजस्वी रूप देख कर वो उनका भक्त हो गया। ब्रह्मा जी ने इसी बात का फायदा उठाया और फूल को अपने साथ महादेव के समक्ष चलने के लिए माना लिया है। उन्होंने केतिकी को इस बात के लिए भी मना लिया कि महादेव के समक्ष उनको कहना है कि ब्रह्मा जी ने मुझे अंतिम छोर पर पाया है, जिसके लिए फूल मान भी गया।

इसके बाद ब्रह्मा जी और केतिका का फूल, दोनों महादेव के समक्ष पहुंचे जहां नारायण पहले से ही मौजूद थे। भगवान विष्णु ने तो सत्य कह दिया कि वे उस अग्निलिंग का छोर नहीं ढूंढ पाए। किन्तु ब्रह्मा जी ने असत्य कहा कि उन्होंने अग्निलिंग का ऊपरी छोर ढूंढ लिया है। इसपर नारायण बड़े चकित हुए और उनसे उसका प्रमाण माँगा। इस पर ब्रह्मदेव ने कहा कि ये केतकी का पुष्प उन्हें इस अग्निलिंग के अंतिम छोर पर मिला। केतकी पुष्प को तो पहले ही परमपिता ने समझा दिया था, तो उसने भी झूठ ही कह दिया कि ब्रह्मदेव ने उसे इस अग्निलिंग के छोर पर ही पाया है।

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    उसी समय वो महान अग्निलिंग सीमित होकर सदाशिव के तेज में बदल गया और सदाशिव ने ब्रह्मदेव को दंड स्वरुप श्राप दिया कि उनकी कभी पूजा नहीं होगी और फिर उनका पांचवां सर भी काट लिया। चूँकि केतकी के पुष्प ने भी असत्य भाषण किया था इसीलिए उसे महादेव ने अपनी पूजा में निषिद्ध घोषित कर दिया। तभी से ये पुष्प सुन्दर होने के पश्चात भी महादेव की पूजा के उपयोग में नहीं लिया जाता है। और इसलिए ही लखीमपुर के एक पौराणिक शिव मंदिर के सामने इस फूल का खिलना लोगों को आकर्षित कर रहा है।

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