कानपुर के फूलबाग में नरेंद्र मोदी खिलायेंगे 'कल्याण-कारी फूल'
अगर आप यह सोच रहे हैं कि कल्याण को मंच पर लाकर ऐसा कौन सा तोप भाजपा चला देगी, तो हम आपको बता दें कि मोदी-कल्याण का बंधन ही है, जो लोकसभा के महायुद्ध के दौरान मुलायम के बाणों का सामना ढाल बनकर करेगा।
और हां अगर आप यह सोच रहे हैं कि कल्याण सिंह और नरेंद्र मोदी के बीच कोई खटास है, तो हम आपकी यह गलतफहमी दूर कर देते हैं। आपको बता दें कि 2002 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब आडवाणी खेमे के यह दोनों नेता भाजपा के मजबूत सेनापति थे। दोनों ही अटल के निशाने पर भी थे। संकट आने पर मोदी तो मुख्यमंत्री होने के कारण अपना पद और प्रतिष्ठा बचा ले गए, लेकिन कल्याण सिंह को भाजपा छोडऩी पड़ी। दोनों नेता पिछड़ा वर्ग से आते हैं और लम्बे समय तक इसी कारण से भाजपा के कई नेताओं से इनके रिश्ते ठीक नहीं रहे।
यूपी में कैसे होगा मोदी का कल्याण
सच पूछिए तो समाजवादी पार्टी हमेशा की तरह आने वाले लोकसभा चुनाव में भी मुस्लिम फैक्टर को जमकर भुनाने की कोशिश करेगा। बहुत जल्द मुसलमानों के लिये मुलायम नई घोषणा करने वाले हैं और ऐसा करते ही मुजफ्फरनगर की वजह से हुई सारी नाराजगी खत्म हो जायेगी। मुस्लिमों का विश्वास पाने के बाद मुलायम का अगला कदम होगा, 1992 और 2002 के गड़े हुए मुर्दे उखाड़ने का। ऐसा करके वो यूपी में मोदी के जादू को निष्क्रिय करने का काम करेंगे।
इसके अलावा यह बात भी पक्की है कि मुलायम अब विश्व हिन्दू परिषद व संघ को अयोध्या में हर प्रकार के अनुष्ठानों पर अड़ंगा लगायेंगे। ऐसे में भाजपा के लिये ओबीसी वोट पाना बेहद जरूरी होगा और इस काम में उनकी मदद कल्याण सिंह से बेहतर कोई नहीं कर सकता है। इस काम में कल्याण जरा भी पीछे नहीं हटेंगे, क्योंकि उनको भाजपा में अपनी खो चुकी सियासी जमीन की तलाश है। उनके बेस को मजबूत करने के लिये नरेंद्र मोदी भी हर संभव प्रयास करेंगे, क्योंकि भारत में पीएम के दफ्तर का रास्ता यूपी से होते हुए ही जाता है।













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