नमो-नमो के सत्संग में नहीं हो रहा भाजपा का 'कल्याण'
इससे पहले कि आप मुझे गरियायें, मैं आपको कल्याण की डेफिनिशन बता देता हूं। यहां पर कल्याण का मतलब कल्याण सिंह है। जी हां भाजपा में हर बड़े नेता मोदी की रैली के मंच पर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन कल्याण सिंह कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। और यही सवाल बार-बार मेरे दिमाग को कुरेद रहा है। आखिर ऐसे क्या कारण हो सकते हैं कि नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों में जिस अटल बिहारी वाजपेयी के कसीदे पढ़ते नहीं थकते हैं, उन्हीं के चहेते कल्याण आज पार्टी के मंच से नदारद हैं।
21 जनवरी 2013 को अटल शंखनाद रैली में कल्याण की पार्टी राष्ट्रीय जनक्रांति पार्टी का भाजपा में विलय हुआ था। तब राजनाथ सिंह ने कल्याण को गलते लगाते हुए कहा था, कि कल्याण सिंह के लिये भाजपा का प्रेम कभी कम नहीं होगा। 2014 की जंग में हम साथ-साथ आगे बढ़ेंगे और दिल्ली में सरकार बनायेंगे। वैसे इसमें कोई शक नहीं है कि कल्याण सिंह की पार्टी में वापसी सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष की वजह से हुई। वो शुरू से ही उनके करीबी रहे हैं। लेकिन वो करीबी अब क्यों नहीं दिखाई देती है।
भाजपा के कल्याणकारी तथ्य
1. भाजपा कल्याण सिंह को मोदी की रैलियों से इसलिये दूर रख रही है, क्योंकि उन पर बाबरी मस्जिद ढहाने की साजिश में हाथ होने के आरोप हैं, और यह मामला मुसलमानों की भाावनाओं से जुड़ा हुआ है। आपको बता दें कि 2009 के फिरोजाबाद उपचुनाव में कल्याण मुलायम सिंह के साथ थे और चुनाव में कुछ भी हासिल नहीं होने पर मुलायम ने कहा था कि कल्याण की वजह से उन्होंने मुस्लिम वोट खो दिया। यही कारण है कि उसके कुछ ही दिन बाद उन्होंने मुलायम का साथ छोड़ दिया। यह बात भाजपा अपने साथ नहीं दोहराना चाहती है।
2. लिब्रहन कमीशन और सीबीआई दोनों ने ही कल्याण सिंह को बाबरी मस्जिद विध्वंस में बराबर का दोषी माना है। इन दोनों की रिपोर्ट को मुस्लिम संगठनों ने खूब उछाला था। यही कारण है कि कल्याण 1992 के बाद से किसी भी पार्टी के लिये कल्याणकारी साबित नहीं हुए, यहां तक खुद की पार्टी के लिये भी नहीं।
3. कल्याण को मुख्यधारा में नहीं लाने का तीसरा सबसे बड़ा कारण आपसी टसल है। भाजपा के तमाम नेता अभी भी कल्याण को पसंद नहीं करते हैं।
भाजपा का कैसे कल्याण कर सकते हैं कल्याण
1. कल्याण सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। लोध जाति समेत कई अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग आज भी उनके साथ पक्के तौर पर जुड़े हुए हैं। लिहाजा यदि भाजपा कानपुर में होने वाली नरेंद्र मोदी की रैली में कल्याण सिंह शामिल होते हैं, तो भाजपा को पश्चिम में नई दिशा मिल सकती है।
2. भाजपा में अगर कल्याण का कद ऊपर उठ जाये तो वह उमा भारती की जगह ले सकते हैं, क्योंकि जिन क्षेत्रों में उमा भारती अपना वोटबैंक मजबूत होने का दावा करते हैं, उन क्षेत्रों में कल्याण का पहले से ही दबदबा है।
3. एक समय में अटल बिहारी वाजपेयी के सबसे करीबी नेताओं में से एक रहे कल्याण सिंह पर से अगर बाबरी मस्जिद वाला दाग हटा दिया जाये, तो उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में भाजपा ने यूपी में सख्त शासन किया था। अगर सिर्फ शिक्षा का ही उदाहरण ले लें, तो उस दौरान हाईस्कूल-इंटर में मात्र 18 फीसदी बच्चे पास हुए थे। यूपी माध्यमिक शिक्षा में इतनी सख्ती इतिहास में कभी नहीं हुई। लिहाजा भाजपा कल्याण को पार्टी के नीति निर्धारकों में शामिल कर उनका फायदा उठा सकती है।













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