फूलों, फल और फकीरों का इलाका 'त्राल' कैसे बना आतंकवाद का गढ़? यहां से निकले बुरहान वानी जैसे पोस्टर बॉय
Tral to Terror Hub History: कश्मीर घाटी में बसा एक छोटा-सा लेकिन ऐतिहासिक और खूबसूरत इलाका - त्राल। कभी यह इलाका अपने सेबों, अखरोटों, देवस्थलों और सूफी संतों के लिए जाना जाता था। यहां की फिजाओं में कभी सेबों की मीठी खुशबू और दरगाहों से दुआओं की गूंज आती थी।
बाग-बागीचों और पहाड़ों से टकराती हवाएं सुकून देती थीं। मगर, बीते दो दशकों में 'त्राल' आतंक की पहचान बन गया। एक ऐसा इलाका जो कश्मीर के 'टेरर हॉटस्पॉट' के रूप में जाना जाने लगा। त्राल अब किसी पहचान का मोहताज नहीं - क्योंकि यह हिंदुस्तान के खिलाफ बंदूक उठाने वाले आतंकियों की जन्मभूमि बन चुका है। आइए त्राल की उसी पीड़ा - 'त्राल के त्रास' - से आपको रूबरू कराते हैं...

त्राल: कभी था 'सूफियों और संतों का गांव'
'त्राल', जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में स्थित एक कस्बा है। यह दक्षिण कश्मीर का हिस्सा है और श्रीनगर से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर है। प्राकृतिक सौंदर्य, फलदार बाग, और शांत पहाड़ी जीवन कभी इसकी पहचान थे। यहां हजरत अमीन बिन वली जैसे सूफी संतों की दरगाहें थीं, जिनके अनुयायी हिंदू-मुसलमान दोनों हुआ करते थे। मगर अब, त्राल का नाम सुनते ही आतंकवाद की तस्वीर सामने आती है।
फिर कैसे उठा आतंक का धुआं?
1989 का साल - पहला मोड़
कश्मीर में आतंकवाद की पहली लहर जब उठी, तब त्राल जैसे शांत इलाकों में भी हथियारबंद युवाओं की तस्वीरें दिखने लगीं। पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकी संगठन जैसे हिज़्बुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा, और बाद में जैश-ए-मोहम्मद ने यहां भर्ती अभियान शुरू किया। हथियारों की ट्रेनिंग LOC पार जाकर ली जाने लगी।
1990-2000 का दशक: चरमपंथी विचारधारा की बुआई
त्राल के युवाओं को मदरसे, कट्टरपंथी मस्जिदें और पाकिस्तानी रेडियो के जरिये धीरे-धीरे कट्टरपंथ की ओर मोड़ा गया। स्कूल और कॉलेज बंद होते गए, और जगह-जगह 'शहीदी चौक' बनने लगे। कई लड़के चुपचाप सीमा पार जाकर आतंकी बनकर लौटे।
2010 के बाद: बुरहान वानी का उदय
त्राल को आतंकवाद का असली चेहरा तब मिला, जब यहां से बुरहान वानी जैसे हाई-प्रोफाइल आतंकी पैदा हुए। बुरहान वानी, जो हिज्बुल मुजाहिदीन का पोस्टर बॉय बना, त्राल का ही रहने वाला था। उसने सोशल मीडिया को हथियार बनाकर सैकड़ों युवाओं को आतंकी संगठन से जोड़ा। 8 जुलाई 2016 को बुरहान की मौत के बाद त्राल और पूरा कश्मीर महीनों तक सुलगता रहा। पत्थरबाजी, कर्फ्यू और झड़पों की लंबी कड़ी शुरू हो गई।
सेना और सुरक्षाबलों की कार्रवाई
त्राल में सेना ने 2017-2021 के बीच कई बड़े ऑपरेशन चलाए। सर्च ऑपरेशन, ड्रोन सर्विलांस, स्थानीय इनपुट्स और मानव खुफिया नेटवर्क के ज़रिये कई टॉप आतंकियों को मारा गया। 2020 में त्राल को लगभग आतंकमुक्त घोषित कर दिया गया, लेकिन अभी भी छिटपुट मॉड्यूल सक्रिय रहते हैं।
त्राल के बड़े आतंकी चेहरे
| क्रमांक | आतंकियों के नाम | निवासी | संगठन | एनकाउंटर/मौत | पहचान |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | बुरहान वानी | त्राल | हिज्बुल मुजाहिदीन | 8 जुलाई 2016 | सोशल मीडिया पोस्टर बॉय |
| 2 | सबजार भट | त्राल | हिज्बुल मुजाहिदीन | मई 2017 | बुरहान के बाद कमान संभाली |
| 3 | जाकिर मूसा | पुलवामा के नूरपुरा गांव | अल-कायदा से जुड़ा | मई 2019 | अल-कायदा से जुड़ाव, अलग रास्ता |
| 4 | आसिफ शेख | त्राल | TRF | तलाश जारी | पहलगाम हमले की साजिश में शामिल |
| 5 | यावर अहमद भट्ट | पुलवामा | हिज्बुल मुजाहिदीन | 15 मई 2025 | पहलगाम हमले में लिंक |
| 6 | आमिर नजीर वानी | त्राल | हिज्बुल मुजाहिदीन | 15 मई 2025 | पहलगाम हमले में लिंक |
कैसे बदली आतंक की रणनीति?
- पहले जहां हथियार पाकिस्तान से आते थे, अब स्थानीय युवाओं द्वारा चोरी या लूटे गए हथियार से हमले होने लगे।
- सोशल मीडिया, खासकर Telegram और WhatsApp ग्रुप्स से युवाओं का ब्रेनवॉश।
- आतंकियों के अंतिम संस्कारों को 'इवेंट' बनाना - ताकि और लोग प्रेरित हों।
त्राल का भविष्य: डर या उम्मीद?
- आज त्राल के माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे किताब पकड़ें, AK-47 नहीं।
- सेब के बाग, फकीरों की दरगाह और सुकून देने वाली वादियां फिर से जिंदा हो सकें - इसके लिए जरूरत है स्थानीय सहयोग, शिक्षा और सुरक्षा के समन्वय की।
अब एक नजर त्राल की खूबसूरती पर, जो आतंक की आग में झुलस रही...
त्राल की सूफी विरासत
त्राल में कई सूफी संतों की दरगाहें स्थित हैं, जो क्षेत्र की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। प्रमुख दरगाहों में शामिल हैं-
- खानकाह-ए-फैज़ पनाह (Khan-Kahi Faiz Panah): यह दरगाह शाह हमदान (रह.) से संबंधित है और त्राल में स्थित है।
- सैयद हसन मंताकी की दरगाह: यह दरगाह पुलवामा जिले में स्थित है और श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है।
- ये दरगाहें न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि त्राल की सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
अखरोट से सेब तक, हवा में घुली थी कभी मिठास
- अखरोट: जम्मू और कश्मीर भारत में अखरोट उत्पादन में अग्रणी है, जो देश के कुल उत्पादन का लगभग 98% योगदान देता है। यहां अखरोट की खेती लगभग 85,620 हेक्टेयर क्षेत्र में होती है, जिससे वार्षिक उत्पादन लगभग 2,75,450 मीट्रिक टन होता है।
- सेब: भारत में सेब की खेती मुख्यतः जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में होती है। 1991-92 से 2001-02 के बीच, भारत में सेब की खेती का क्षेत्रफल 24% बढ़ा, हालांकि उत्पादन में केवल 1% की वृद्धि हुई।
- आतंकवाद का प्रभाव: त्राल में आतंकवाद के कारण सेब और अखरोट की खेती पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। आतंकी गतिविधियों के कारण कृषि कार्यों में बाधा आती है, जिससे किसानों की आजीविका प्रभावित होती है। हालांकि, इस विषय पर विस्तृत आंकड़ों की आवश्यकता है।
त्राल की कहानी सिर्फ एक कस्बे की नहीं, बल्कि उस पूरी लड़ाई की है जो कट्टरपंथ बनाम कश्मीरियत के बीच लड़ी जा रही है। त्राल ने अगर आतंकवाद देखा है, तो वह उम्मीद भी देख सकता है - बशर्ते बंदूकें बंद हों और किताबें फिर से खुलें।












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