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Omar Abdullah Oath: UT जम्मू कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से क्या उम्मीदें रहेंगी?

Omar Abdullah News: जम्मू और कश्मीर में 10 साल बाद किसी मुख्यमंत्री और उसके मंत्रिमंडल का शपथग्रहण हुआ है। नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री बने हैं, लेकिन वह पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य के भी 6 साल तक सीएम रह चुके हैं। नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई है, इस वजह से उससे अपेक्षाएं और उम्मीदें होनी भी स्वाभाविक हैं।

मुख्यमंत्री पद का शपथ लेने से पहले उमर अब्दुल्ला ने खुद कहा है कि लोगों की उनसे उम्मीदें भी काफी हैं और उनके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। उन्हें केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर काम करने का मौका मिला है और यह देखने वाली बात है कि वह बदले प्रशासनिक व्यवस्था में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के साथ किस तरह से तालमेल बिठाकर जम्मू और कश्मीर को आगे ले जाने की पहल करते हैं।

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राज्य का दर्जा बहाली पर है उमर का फोकस
शपथ लेने से पहले उन्होंने कहा है, 'केंद्र शासित प्रदेश का सीएम होना बिल्कुल ही अलग बात है। इसकी अपनी चुनौतियां हैं।' लेकिन, इसके साथ ही उन्होंने कहा है, 'मुझे विश्वास है कि केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा अस्थायी है। हम लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए भारत सरकार के साथ मिलकर काम करने के लिए तत्पर हैं और ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करना होगा।'

जम्मू और कश्मीर क्षेत्र के लोगों के कई मुद्दों में भिन्नता
नई सरकार से जम्मू और कश्मीर क्षेत्र के लोगों की उम्मीदें काफी मामलों में समान भी हैं, लेकिन कुछ में बहुत ज्यादा अंतर भी है। मसलन, जहां तक रोजगार, आम जन-जीवन से संबंधित समस्याएं या जरूरतें हैं, वह दोनों जगहों में कोई पहाड़ सा अंतर नहीं है। लेकिन, जहां कश्मीर के लोगों के लिए अपनी अलग पहचान, राज्य का दर्जा जैसी बातें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं और अनुच्छेद-370 जैसा मुद्दा आज भी जीवित है, जम्मू के लोगों के मुद्दे बहुत ही अलग हैं।

नेशनल कांफ्रेंस के घोषणापत्र में कश्मीर के लोगों से किए गए वादे ही उनकी उम्मीदों में शामिल हैं। जबकि, कश्मीरी पंडितों का कहना है कि 'वे 34-35 साल से बेघर हैं। इनके मैनेफिस्टो में हमारे लिए जो कुछ कहा गया है, वह काफी नहीं है। उन्हें पहले उन कारणों पर गौर करना होगा, जिसकी वजह से हम वहां से निकाले गए....'। जम्मू इलाके में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिनका कहना है, '(उमर)पहले भी सीएम रह चुके हैं....वैसे हमें उनसे ज्यादा उम्मीद नहीं है.....'।

नेशनल कांफ्रेंस को उमर के नेतृत्व को लेकर काफी उम्मीद
वैसे नेशनल कांफ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने जो बयान दिया है, उससे भी लगता है कि उमर को अपनी नई सरकार को लेकर जितना भरोसा है, उनकी पार्टी भी उन्हीं उम्मीदों के साथ आगे बढ़ रही है। पार्टी प्रवक्ता इमरान नबी डार ने कहा, 'यह एक महत्वपूर्ण दिन है। 6.5 साल बाद नई सरकार बन रही है। अल्लाह उमर अब्दुल्ला को लोगों की आवाज उठाने की ताकत दें।'

उमर के सामने गठबंधन के भीतर से भी चुनौती!
लेकिन, जिस तरह से राज्य का दर्जा नहीं बहाल होने के बहाने से कांग्रेस ने सरकार में शामिल होने से कन्नी काटी है, उससे लगता है कि उमर के सामने सरकार चलाने की चुनौतियां तो होंगी ही, आगे चलकर अपने फैसलों में सहयोगी दलों का भरोसा जीतना भी एक चुनौती बन सकती है।

क्योंकि, शपथग्रहण से पहले उमर अब्दुल्ला ने यह कहकर कि 'वे दिन चले गए, जब सारे के सारे मंत्री बन जाते थे', यही संकेत दिया है कि 6 विधायकों वाली कांग्रेस भी ज्यादा से ज्यादा मंत्री पद मांग रही है और उमर ने अपनी पार्टी के अंदर से भी दबाव का संकेत दिया है। इस वजह से उन्होंने फिलहाल 4 पद खाली भी रखे हैं।

उमर सरकार को पहले यह परीक्षा करनी होगी पास
जहां तक राज्य के दर्जे की बहाली की बात है तो इसका भरोसा देश के प्रधानमंत्री के स्तर से दिया जा चुका है। उमर को भी यह इल्म है कि जैसे ही वह केंद्र सरकार को आश्वस्त कर देंगे कि केंद्र शासित प्रदेश में वह मौजूदा शांतिपूर्ण माहौल कायम रखने में सक्षम हो चुके हैं, इसे फिर से राज्य का दर्जा मिलने में शायद देरी नहीं होगी।

आतंकवाद-मुक्त, पत्थरबाजी-मुक्त और विकासवादी जम्मू-कश्मीर कायम रखने की उम्मीद
उमर अब्दुल्ला की मुश्किल ये है कि एक तरफ कश्मीर से विस्थापित हुए लोगों की उनसे नाउम्मीदी का उनपर दबाव रहेगा तो दूसरी तरफ उन 'अलगाववादी सोच' को अपने साथ लेकर चलना होगा, जिन्होंने इस बार कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस की जीत में बड़ी भूमिका निभाई है।

इसे भी पढ़ें- Jammu-Kashmir: एक दशक के बाद जम्मू-कश्मीर में नई सरकार, उमर के लिए चुनौतियों का अंबार

इस तरह से यह देश उमर अब्दुल्ला से फिलहाल यही उम्मीद कर सकता है कि वे अगले कुछ महीने ऐसे ही आतंकवाद-मुक्त, पत्थरबाजी-मुक्त और विकासवादी जम्मू-कश्मीर वाला माहौल कायम रखकर दिखा सकते हैं, जिसने बीते 5 वर्षों में कश्मीर घाटी की फिजा बदलकर रख दी है।

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