Jammu Kashmir: कहां गायब हुए 6 अलगाववादी और आतंकी संगठन? बुरहान वानी की मौत पर मचाया था बवाल
Jammu and Kashmir news: आर्टिकल-370 हटने से पहले आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य में अशांति फैलाने के जिम्मेदार 6 अलगाववादी और आतंकवादी संगठन सीन से ही गायब हो चुके हैं। केंद्र सरकार ने इन्हें ऑनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन ऐक्ट (UAPA ) के तहत प्रतिबंधित किया है, लेकिन इनमें से एक भी संगठन इसे चुनौती देने तक के लिए ट्रिब्यूनल तक भी नहीं पहुंचा।
आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद इन संगठनों ने जम्मू-कश्मीर में हड़तालों का आयोजन करके और सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करवाकर पूरी घाटी को दहलाने का काम किया था। अमरनाथ जमीन विवाद और शोपियां में दो महिलाओं की मौत के बाद भी इन संगठनों ने घाटी को सुलगाने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रहे थे ये 6 अलगाववादी,आतंकी संगठन
केंद्र का कहना है कि ये संगठन पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रहे थे। इसने जम्मू और कश्मीर पीपुल्स लीग (JKPL) के चारों गुटों, मुस्लिम कांफ्रेंस जम्मू और कश्मीर (भट्ट) और मुस्लिम कांफ्रेंस जम्मू और कश्मीर (सुमजी गुट) को इसी साल प्रतिबंधित किया था। सबूतों की जांच के बाद यूएपीए ट्रिब्यूनल ने इस प्रतिबंध को कायम रखा है।
ट्रिब्यूनल के सामने पक्ष रखने के समय गायब हुए सभी 6 अलगाववादी संगठन
सीएनएन-न्यूज18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रिब्यूनल की ओर से जारी विस्तृत फैसले में बताया गया है कि ये संगठन कई मौके दिए जाने के बावजूद अपना बचाव करने के लिए भी ट्रिब्यूनल के सामने उपस्थित नहीं हुए और इस तरह से अपने ऊपर हुई कार्रवाई को जायज ठहरा दिया।
ट्रिब्यूनल के सामने केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र ने ट्रिब्यूनल के सामने बताया कि अलगवादी नेताओं और उनके गुर्गों ने आम लोगों के दिमाग में ऐसा डर भर दिया था कि उनकी बातों का समर्थन नहीं करते हुए भी, उनका विरोध करने, कई घटनाओं की जानकारी पुलिस को देने और यहां तक उन अलगाववादी नेताओं के खिलाफ सबूत देने से भी डरते रहे।
केंद्र ने तर्क दिया कि इसी वजह से अलगाववादी संगठनों या उनके नेताओं के खिलाफ दर्ज मुकदमों की जांच में असहयोगी माहौल पैदा हो गया। इसके बाद कोविड की वजह से जांच और धीमी हो गई, और पूरे देश में पूर्ण लॉकडाउन लागू होने के कारण सभी नियमित गतिविधियां ठप हो गईं। इस वजह से उनके खिलाफ दर्ज मामलों की जांच उस गति से नहीं हुई, जो होनी चाहिए थी।
बार-बार बुलाए जाने के बाद भी नहीं पहुंचा कोई
ट्रिब्यूनल के फैसले में यह दर्ज है कि उसकी ओर से सभी संबंधित 6 संगठनों और उनके पदाधिकारियों को उसके सामने अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त मौके दिए गए। फैसला कहता है, 'इस ट्रिब्यूनल ने श्रीनगर में सार्वजनिक सुनवाई भी की ताकि संबंधित गुटों के सदस्यों या आम जनता को ट्रिब्यूनल की कार्यवाही में भाग लेने का मौका मिल सके। हालांकि, इस अवसर का लाभ संबंधित गुट या इसके पदाधिकारियों की ओर से नहीं उठाया गया।'
फिर भी ट्रिब्यूनल ने सभी अलगवावादी संगठनों पर प्रतिबंध की पुष्टि के लिए केंद्र की ओर से पेश सभी साक्ष्यों का विश्लेषण किया, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने जमात-ए-इस्लामी हिंद के केस में निर्णय सुनाया था।
प्रतिबंधित संगठनों पर क्या आरोप हैं?
केंद्र ने कहा है कि बुरहान वानी की मौत के बाद, पाकिस्तान और आईएसआई के इशारे पर इन संगठनों ने हालात का फायदा उठाया और घाटी में शांति बिगाड़ने और भारत-विरोधी माहौल भड़काने के लिए जम्मू और कश्मीर के युवाओं को लुभाकर उन्हें सक्रिय तौर पर भड़काने का काम किया। बुरहान वानी की मौत जुलाई 2016 में हुई थी, जिसके बाद कश्मीर घाटी में बहुत ज्यादा बवाल मचा था।
केंद्र के मुताबिक इन संगठनों ने हड़तालें बुलाईं, प्रदर्शन के लिए कैलेंडर जारी किए, जिसकी वजह से 86 लोगों की जानें चली गईं और 8,932 नागरिक जख्मी हो गए। इन वारदातों में दो पुलिस वाले भी शहीद हुए और 8,370 पुलिसकर्मी या सुरक्षा बलों के लोग भी घायल हुए।
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