Article 370 Abrogation: जम्मू-कश्मीर का इतिहास बदला, भूगोल भी! जानिए इसका पिछला और अगला इतिहास
Article 370 Abrogation: दिसंबर 2023 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 370 को रद्द करने के केंद्र सरकार के फैसले को वैध ठहराया। 5 अगस्त, 2019 को केंद्र सरकार ने संसद में जम्मू-कश्मीर को दिए गए विशेष दर्जे को समाप्त करने का प्रस्ताव पेश किया था।
यह प्रस्ताव पारित होने के बाद, जम्मू-कश्मीर राज्य को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों - जम्मू-कश्मीर और लद्दाख - में विभाजित कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि जम्मू-कश्मीर राज्य की कोई आंतरिक संप्रभुता नहीं थी, और भारतीय संविधान को राज्य में लागू करने के लिए राज्य सरकार की सहमति अनिवार्य नहीं थी।

अनुच्छेद 370 क्या जानें इतिहास?
अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का एक अस्थायी प्रावधान था, जो जम्मू और कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करता था। यह अनुच्छेद 17 अक्टूबर 1949 को भारतीय संविधान में शामिल किया गया था और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर प्रभावी हुआ।
अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को क्या मिले थे अधिकार?
- इसके तहत जम्मू और कश्मीर को एक विशेष स्वायत्तता प्राप्त थी - भारतीय संसद को राज्य के संबंध में सीमित विषयों पर ही कानून बनाने का अधिकार था, जैसे रक्षा, विदेशी मामले और संचार। अन्य विषयों पर संसद तभी कानून बना सकती थी जब राज्य सरकार सहमत हो।
- संविधान के भाग XXI के तहत आने वाला अनुच्छेद 370 'अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान' से संबंधित था। यह जम्मू-कश्मीर को अपना संविधान बनाने की अनुमति देता था।
- यह अनुच्छेद संसद की विधायी शक्तियों को सीमित करता था, जिसके तहत वह इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसियन (IoA) में शामिल विषयों पर जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय कानून लागू नहीं कर सकती थी। भारतीय संसद राज्य के लिए सीमित क्षेत्रों में कानून बना सकती थी।
- संक्षेप में कहें तो, जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान था, राज्य का अपना झंडा भी था, बाहरी व्यक्ति वहां जमीन नहीं खरीद सकता था।
जम्मू-कश्मीर को किसने दिया था ये स्पेशल दर्जा?
इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसियन पर 1947 में तत्कालीन रियासत जम्मू-कश्मीर के हिंदू राजा, महाराजा हरि सिंह और गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते ने संसद को केवल रक्षा, विदेश मामलों और संचार पर कानून बनाने का अधिकार दिया था।
जम्मू-कश्मीर को क्यों दिया गया था ये दर्जा?
स्वतंत्रता के बाद भारत में विलय के दौरान उत्पन्न हुई विशेष परिस्थितियों के कारण जम्मू-कश्मीर को यह विशिष्ट दर्जा दिया गया था। 1947 में, महाराजा हरि सिंह, जो मुस्लिम बहुल राज्य पर शासन कर रहे थे, ने पाकिस्तान के सैन्य हमलों का सामना करने के लिए भारत से मदद मांगी थी।
भारत मदद करने पर सहमत हुआ, लेकिन इसके बदले में महाराजा हरि सिंह ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसियन पर हस्ताक्षर किए, जिसने विशेष शर्तों के तहत जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बनने की अनुमति दी।
अनुच्छेद 370 को क्यों हटाया गया?
विशेष दर्जा देश में "एक राष्ट्र, एक संविधान" के सिद्धांत के विरुद्ध माना जाता था। इसके अलावा अनुच्छेद 370 की वजह से बाहरी निवेश नहीं हो पाता था, जिससे आर्थिक विकास बाधित था। वहीं कश्मीरी महिलाओं को गैर-राज्य के पुरुषों से विवाह करने पर नागरिक अधिकारों से वंचित होना पड़ता था। सबसे अहम वजह सरकार ने इसे आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले कारणों में से एक बताया।
शाह ने कहा था- संविधान के सभी प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू होंगे
5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने, गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म करने की घोषणा की थी। अनुच्छेद 370 को हटाते हुए शाह ने संसद में कहा था कि इसके निरस्त होने के बाद भारतीय संविधान के सभी प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू होंगे।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने चुनावी घोषणापत्र में हमेशा अनुच्छेद 370 को रद्द करने, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और समान नागरिक संहिता लागू करने की मांगों को प्रमुखता से उठाती रही। भाजपा ने इनमें से दो प्रमुख मांगों को पूरा कर लिया है, जिसमें अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण पहला था।
अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण कब हुआ?
अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण 5 अगस्त, 2019 को हुआ था। इस अनुच्छेद के तहत, इसे तब रद्द किया जा सकता है जब राष्ट्रपति संविधान सभा की सहमति से कोई आदेश पारित करें। केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि चूंकि राज्य में संविधान सभा को 1957 में भंग कर दिया गया था, इसलिए राष्ट्रपति ने संविधान सभा का अर्थ 'विधानसभा' से लिया, जिसका तात्पर्य संसद से था, क्योंकि उस समय राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू था।
जम्मू-कश्मीर में क्या बदलाव आए?
अनुच्छेद 370 को निरस्त करने से जम्मू-कश्मीर में कई बड़े बदलाव आए। इसने जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता को समाप्त कर दिया और उसके विशेष अधिकारों को हटा दिया। इसने राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में भी विभाजित कर दिया - जम्मू-कश्मीर को अपनी विधानसभा मिली, जबकि लद्दाख को नहीं। इस विभाजन के कारण जम्मू-कश्मीर ने अपनी राज्य का दर्जा खो दिया।
केंद्र शासित प्रदेश को राज्य का दर्जा बहाल करने की विपक्ष कर रहा मांग
अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण की हर सालगिरह पर विपक्षी दल जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग करते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने केंद्र में भाजपा सरकार को अपने वादे पूरे करने की याद दिलाई और राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव कराने का आग्रह किया, ताकि लोगों को अपनी समस्याओं के बारे में बोलने के अधिकार से वंचित न किया जाए। 13 जनवरी, 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की केंद्र शासित प्रदेश को राज्य का दर्जा बहाल करने की इच्छा का जिक्र करते हुए कहा था, "सही समय पर सही चीजें होंगी।"
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