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Rajasthan: जयपुर की बड़ी चौपड़ की दिशाएं तय करती है सियासी दलों की दशा, जानिए वजह

जयपुर, 15 अगस्त। राजस्थान के जयपुर की बड़ी चौपड़ की दिशाएं सियासी दलों की दशा तय करती है। पिछले 75 साल से जयपुर की बड़ी चौपड़ पर 15 अगस्त या 26 जनवरी एक ही जगह पर सत्ता पक्ष और विपक्ष द्वारा झंडारोहण किया जाता है। फर्क अगर है तो दिशाओं का है। सत्ता पक्ष द्वारा पूर्व मुखी होकर झंडारोहण किया जाता है। वहीं विपक्ष द्वारा दक्षिण मुखी होकर तिरंगा फहराया जाता है। यहां पर तिरंगा फहराने के लिए पहले सत्ता पक्ष के मुख्यमंत्री पहुंचते हैं। उसके बाद नेता प्रतिपक्ष द्वारा झंडारोहण किया जाता है। जयपुर की बड़ी चौपड़ पर इस परंपरा का निर्वहन 1947 से ही किया जा रहा है। जब देश आजाद हुआ था। उसी शाम को बड़ी चौपड़ पर तत्कालीन मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल द्वारा तिरंगा झंडा फहराया गया था। इस दौरान जयपुर राज परिवार के तमाम सदस्य मौजूद रहे थे। पिछले 75 सालों में यह रवायत जयपुर की तहजीब का हिस्सा बन चुकी है।

badi choupad

1942 में पहली बार किया गया झंडारोहण

जयपुर की बड़ी चौपड़ पर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सबसे पहले आजाद मोर्चा के युवाओं द्वारा झंडारोहण किया गया था। स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर जयपुर का हृदय स्थल कही जाने वाली बड़ी चौपड़ इस अनोखी सियासत का साक्षी बनता है। यहां सत्ताधारी और विपक्षी दल परंपरा अनुसार झंडारोहण करते रहे हैं। पहले झंडारोहण सत्तापक्ष की ओर से होता है और उसके ठीक बाद विपक्षी दल के नेता राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। माना जाता है कि पूर्व में जिस तरह सूर्य उदय होता है। उसी तरह सत्तारूढ़ पार्टी का सूर्य उदयमान रहे इसलिए पूर्वमुखी होकर ध्वजारोहण किया जाता है।

tikaram paliwal

बड़ी चौपड़ का राजनीतिक महत्व

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में बड़ी चौपड़ का बड़ा महत्व रहा है। इसे माणक चौक चौपड़ भी कहा जाता था। यह किसी समय में राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है। स्टेट पीरियड में राजाओं के खिलाफ जयपुर प्रजामंडल के जितने भी आंदोलन होते थे। उसका केंद्र बिंदु माणक चौक चौपड़ ही हुआ करता था। यहीं पर जयपुर प्रजामंडल की बैठकर हुआ करती थी। राजतंत्र से आजाद होने के बाद जब राजस्थान का निर्माण हुआ। उस दौरान भी जनसमूह यही इकट्ठा हुआ करता था। उस दौरान सवाई मानसिंह टाउन हॉल में विधानसभा हुआ करती थी। ऐसे में सरकार के खिलाफ सभी धरना प्रदर्शन बड़ी चौपड़ पर ही होते थे। परंपरागत रूप से पक्ष और विपक्ष आजादी के समारोह में यही झंडारोहण करते थे। दोनों एक दूसरे को मिठाइयां भी खिलाया करते थे। मोहनलाल सुखाड़िया के समय का एक प्रचलित किस्सा है। जब उन्होंने यहां झंडारोहण किया उस वक्त सामने से विपक्ष के नेता कुंभाराम आ रहे थे। कुंभाराम ने झंडारोहण किया और दोनों ने एक दूसरे को मिठाई खिलाई।

badi choupad

बड़ी चौपड़ को लेकर एक किस्सा यह भी

इतिहास के जानकार बताते हैं कि 1967 में जब यहां अल्पमत की सरकार आई थी। उस दौरान विद्रोह भी हुआ था और राष्ट्रपति शासन भी लगा था। तब ज्योतिषाचार्यों के कहने पर सत्तारूढ़ पार्टी ने पूर्व मुखी होकर झंडारोहण किया था। इसके जवाब में विपक्ष ने दक्षिण मुखी होकर राष्ट्रध्वज फहराया। वह सत्तारूढ़ पार्टी को सत्ता से बेदखल करना चाहते थे। इसके बाद बदलाव भी हुआ। मोहनलाल सुखाड़िया को 1971 में पद छोड़ना पड़ा और बरकतुल्लाह खान की सरकार बनी। 2001 में राजस्थान विधानसभा सवाई मानसिंह टाउन हॉल से शिफ्ट होकर लाल कोठी चली गई। उसके बाद से यहां धरने प्रदर्शन होना बंद हो गए। शुरुआती दौर में छात्रों का एक बड़ा समूह बकायदा या रैली के रूप में आता था। बड़ी चौपड़ पर झंडारोहण करता था। 1942 से भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान युवाओं ने बड़ी चौपड़ पर झंडारोहण करना शुरू किया था। उस जमाने में झंडा तिरंगा नहीं हुआ करता था। इसमें महाराजा कॉलेज की बड़ी भूमिका रहा करती थी।

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