राजस्थान : क्या कांग्रेस के बाद अब BJP में अंदरुनी कलह?, जानिए पूर्व CM राजे की नाराजगी की 4 वजह

जयपुर। लम्बे इंतजार के बाद राजस्थान भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया द्वारा घोषित की गई कार्यकारिणी को लेकर पूर्व सीएम वसुंधरा राजे परेशान नजर आ रही हैं। वजह पूनिया की कार्यकारिणी में वसुंधरा गुट के कई नेताओं को जगह नहीं मिलना बताया जा रहा है।

पार्टी आलाकमान के सामने जाहिर की नाराजगी

पार्टी आलाकमान के सामने जाहिर की नाराजगी

खबर है कि इस संबंध में वसुंधरा राजे ने हाल ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से ​नई दिल्ली में मुलाकात करके अपनी नाराजगी भी जता चुकी हैं। सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है पिछले सप्ताह वसुंधरा राजे ने भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष से मुलाकात कर राजस्थान भाजपा की मौजूदा स्थिति पर चर्चा की है।

 आरएसएस के करीबी नेताओं को जगह

आरएसएस के करीबी नेताओं को जगह

बता दें कि राजस्थान भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने एक अगस्त 2020 अपनी कार्यकारिणी का गठन किया है, जिसमें चित्तौड़गढ़ सांसद सीपी जोशी, विधायक चंद्रकांता मेघवाल, पूर्व विधायक अलका गुर्जर, अजयपाल सिंह, हेमराज मीना, प्रसन मेहता, मुकेश दाधीच और माधोराम चौधरी को पार्टी के उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया है। जबकि मदन दिलावर को महासचिव का पद दिया गया है। ये सभी आरएसएस करीबी माने जाते हैं।

राजस्थान भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारियों की मानें तो पूर्व सीएम राजे ने आलाकमान से कहा है कि वे पूनिया की कार्यकारिणी का जिस तरह से गठन हुआ है, उससे खुश नहीं हैं। आगामी विधानसभा सत्र को देखते हुए इस तरह की रणनीति सही नही है। उनके समर्थकों को नई कार्यकारिणी में काफी कम स्थान दिया गया है।

 पूर्व सीएम राजे की परेशानी की चार वजह

पूर्व सीएम राजे की परेशानी की चार वजह

वजह नम्बर एक : राजस्थान भाजपा की इस कार्यकारिणी से पूर्व सीएम राजे की नाराजगी की एक वजह यह है कि उनके विरोधियों को भी इसमें खास जगह दी गई है। मदन दिलावर को महासचिव बनाया गया। जबकि वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में इन्हें टिकट तक नहीं दिया गया था। फिर ये 2018 में रामगंजमंडी से जीते। तब भाजपा ने सत्ता खो दी। अब इन्हें महासचिव पद दिए जाने से राजे से परेशान हैं। पूर्व सीएम राजे और विधायक मदन दिलावर के राजनैतिक संबंध अच्छे नहीं हैं। दिलावर हाल ही में इसलिए भी चर्चा में हैं, क्योंकि इन्होंने बसपा के विधायकों के कांग्रेस में विलय के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

वजह नम्बर दो : राजस्थान भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने अपनी कार्यकारिणी में अजयपाल सिंह को भी बतौर उपाध्यक्ष शामिल किया है। अजय पाल सिंह कभी राजे के करीबी हुआ करते थे। बाद में इनके साथ भी राजे के राजनैतिक संबंध खराब हो गए थे।

 वजह नम्बर तीन

वजह नम्बर तीन

राजनीतिक के जानकारों के अनुसार राजे की परेशानी की तीसरी वजह सतीश पूनिया की कार्यकारिणी में राजसमंद सांसद दीया कुमारी को जगह मिलना मानी जा रही है। सांसद दीया कुमारी को प्रदेश महामंत्री का पदभार सौंपा गया है। दीया कुमारी भी राजे की तरह से एक शाही परिवार से राजनीति में आती हैं। कहते हैं इन्हें राजनीति के लिए राजे ने ही तैयार किया था। राजे की परेशानी है कि पार्टी ने जान बुझकर एक राजपू​त युवा नेता को नई कार्यकारिणी में जगह दी है। जबकि राजे दीया कुमारी को पिछली लोकसभा चुनाव में उतारने के भी पक्ष में नहीं थीं।

इस प्रकरण के बाद रिश्ते हुए खराब

राजस्थान के भाजपा के एक अन्य पदाधिकारी बताते हैं कि वर्ष 2016 में जब राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे थीं तब जयपुर विकास ​प्राधिकरण ने राजमहल पैलेस के मुख्य द्वार पर खुद के स्वामित्व का दावा किया था। इसके बाद राजमाता पद्मिनी देवी के नेतृत्व में पूर्व शाही परिवार द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया था। यह पैलेस तत्कालीन भाजपा विधायक दीया कुमारी के परिवार के स्वामित्व में था। बाद में इस मुद्दे को हल करने के लिए पार्टी को हस्तक्षेप करना पड़ा। इस प्रकरण से राजे और दीया कुमारी के राजनै​तिक रिश्तों में दरार आ गई थी।

वजह नम्बर चार: सतीश पूनिया की नई कार्यकारिणी से राजे की नाराजगी की चौथी वजह यह है कि इसमें श्रवण वर्मा को धौलपुर भाजपा जिलाध्यक्ष बनाया गया है। श्रवण वर्मा आरएसएस कार्यकर्ता होने के साथ-साथ कई पद संभाल चुके हैं। अब इन्हें जिलाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गई जबकि यह पद पहले राजे के करीबी बहादुर सिंह त्यागी के पास था।

भाजपा ने आरोपों को किया खारिज

भाजपा ने आरोपों को किया खारिज

द प्रिंट ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि पार्टी सूत्रों ने कहा कि 14 अगस्त से शुरू हो रहे राजस्थान विधानसभा सत्र को लेकर वसुंधरा राजे और नड्डा के बीच चर्चा हुई थी। उन्होंने राज्य भाजपा के कामकाज पर पूर्व में आपत्ति जताई। हालांकि राजस्थान भाजपा ने इस आरोप को खारिज किया है कि नई कार्यकारिणी में राजे समर्थकों को ज्यादा जगह नहीं दी गई।

वहीं, सतीश पूनिया के करीबी पार्टी नेता के हवाले से कहा गया है कि राजस्थान भाजपा प्रदेशाध्यक्ष ने नवगठित राज्य कार्यकारिणी में सोशल इंजीनियरिंग का ध्यान रखा है। कार्यकारिणी में राजपूतों, जाटों, दलितों, ब्राह्मणों सहित अन्य को स्थान दिया है। विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों को शामिल किया है। किसी व्यक्ति विशेष को नजरअंदाज नहीं किया गया है।

सतीश पूनिया को सितम्बर 2019 में मिली जिम्मेदारी

सतीश पूनिया को सितम्बर 2019 में मिली जिम्मेदारी

बता दें कि सतीश पूनिया को राजस्थान भाजपा की कमान सितम्बर 2019 सौंपी गई थी। पूर्व प्रदेशाध्यक्ष मदन लाल सैनी के निधन के करीब 80 दिन बाद राजस्थान भाजपा को नया ​मुखिया मिला था। राजस्थान भाजपा के नेता लम्बे समय से सतीष पूनिया की प्रदेश कार्यकारिणी घोषित होने का इंतजार कर रहे थे। अब भाजपा द्वारा गठित समिति में आठ उपाध्यक्ष, चार महासचिव, नौ सचिव और एक राज्य प्रवक्ता हैं। सांसद दीया कुमारी को भी महासचिव के रूप में समिति में जगह मिली है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार भाजपा के राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018 हारने के बाद से राजे ने केंद्रीय नेतृत्व को दरकिनार करना शुरू कर दिया। बाद में पार्टी ने सतीश पूनिया को की प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नियुक्त की।

 राजस्थान सरकार संकट के दौरान राजे की 'चुप्पी'

राजस्थान सरकार संकट के दौरान राजे की 'चुप्पी'

राजस्थान में बीते एक माह से सियासी भूचाल आया हुआ था। राजस्थान सीएम अशोक गहलोत और डिप्टी सीएम सचिन पायलट आमने-सामने हुए। दोनों ने अपने अपने गुट के विधायकों की बाड़ेबंदी की। भाजपा पर भी कांग्रेस के विधायकों की खरीद फरोख्त के आरोप लगे। हालांकि हाल ही सचिन पायलट की राहुल गांधी व प्रियंका गांधी से मुलाकात के बाद गहलोत सरकार पर आया सियासी संकट टल गया।

सबसे खास बात यह है पूरे राजनीतिक संकट के बीच दो बार की सीएम राजे की 'चुप्पी' सुर्खियों में रही। इस दौरान राजे ने भाजपा की बैठकों तक में हिस्सा नहीं लिया। वे धौलपुर में अपने महल में बैठकर पूरे राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखे हुई थीं। हालांकि 14 अगस्त को प्रस्तावित राजस्थान विधानसभा सत्र से एक दिन पहले जयपुर स्थित भाजपा मुख्यालय में पार्टी की बैठक में राजे ने भी शिरकत की। बैठक में विधानसभा सत्र के लिए रणनीति तय की गई।

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