Lok Sabha Election 2024: राजस्थान में पहले चरण के मतदान ने बीजेपी की बढ़ाई टेंशन, जानिए कम पोलिंग की असल वजह
Lok Sabha Election 2024: देश में लोकसभा चुनाव 2024 के लिए मतदान की शुरुआत हो गई है। पहले चरण के मतदान शुक्रवार को शांतिपूर्वक संपन्न हुए। राजस्थान में पहले चरण में 12 सीटों के लिए मतदान हुआ। पहले चरण में लगभग 57.88 फीसदी मतदान हुआ है। मतदान का यह आंकड़ा पिछले आम चुनाव से तकरीबन 6 फीसदी तक कम हुआ है।
पहले चरण के इस मतदान ने सियासी गलियारों में चर्चाओं के बाजार को हवा दे दी है। मतदान के इस आंकड़े से राजनीतिक पंडितों की भौहें तन गई है। पहले चरण के पोलिंग पर्सेंटेज से किस दल को कितना नफा-नुकसान होगा। यह तो कहना अभी मुश्किल है। जनमानस ने किस पर कितना भरोसा जताया है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस मतदान प्रतिशत ने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। पार्टी प्रदेश में अगले चरण के मतदान को लेकर अभी से अलर्ट मोड में आ गई है। वोटिंग के इस आंकड़े को लेकर बाजार में कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। आइए जानते हैं कम मतदान की असल वजह क्या रही है।

देश के लोकसभा चुनाव में बीजेपी इस बार 400 पार और विकसित भारत के संकल्प के साथ चुनाव मैदान में हैं। पार्टी ने जो संकल्प पत्र जारी किया है। वह भी पार्टी के इस संदेश आमजन तक पहुंचा रहा है। मौजूदा दौर की सियासत में नरेंद्र मोदी देश के सबसे ज्यादा लोकप्रिय चेहरा हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि आम चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा नरेंद्र मोदी ही है। इतना ही नहीं बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र की थीम में भी मोदी की गारंटी पर फोकस रखा है। बावजूद इसके पहले चरण में पिछली बार से कम मतदान हुआ है तो यह स्थिति चिंताजनक है। आगे पढ़िए कम मतदान की असल वजह।
मोदी की लोकप्रियता में कमी ?
देश में लोकसभा चुनाव के पहले चरण में जिस तरह का मतदान हुआ है। वह चौंकाने वाला है। राजनीतिक पंडित इस मतदान प्रतिशत से हैरान है। बीजेपी के लिए राजस्थान सबसे सेफ स्टेट माना जाता है। पिछले दो बार के आम चुनाव में इस राज्य से बीजेपी को 25 की 25 सीटें मिली है। इससे पहले प्रदेश के मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी के नाम पर बीजेपी को जमकर मतदान किया।
लेकिन इस बार मतदान के जो आंकड़े सामने आए हैं। उससे प्रतीत होता है कि आम मतदाता में नीरसता है। यही भाजपा के लिए चिंता का विषय है। अब चर्चा है कि क्या जनता का रुझान मोदी या बीजेपी प्रति कम हुआ है। राजनीति के जानकर इस सवाल पर कहते हैं कि जब-जब वोटिंग पर्सेंटेज बढ़ा है। तब-तब भाजपा को फायदा हुआ है। कम वोटिंग पर्सेंटेज से हमेशा कांग्रेस को फायदा हुआ है।
आम चुनाव में मुद्दों का अभाव
चुनावों के दौरान बीजेपी का शुरू से सबसे बड़ा एजेंडा राम मंदिर और धारा 370 रहा है। अकेले इन दो मुद्दों पर पार्टी ने हमेशा झोली भर-भरकर वोट बटोरे हैं। अब जब पार्टी ने अपने दोनों वायदे पूरे कर दिए हैं। देश में बहुतप्रतीक्षित राम मंदिर का निर्माण हो चुका है। तब ऐसे हालात चिंताजनक है। विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर हमेशा आवाज उठाता रहा है।
कांग्रेस तो यह भी आरोप लगाती रही है कि 25 की 25 सीटें होने के बावजूद केंद्र सरकार राजस्थान को कोई बड़ी सौगात नहीं दे पाई। उनका आरोप है कि पार्टी के सांसदों पर जनता को भरोसा नहीं रहा। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव प्रचार के दौरान स्थानीय मुद्दों का भी अभाव रहा है।
वसुंधरा फैक्टर का असर
राजस्थान में अभी कुछ माह पहले ही विधानसभा चुनाव संपन्न हुए हैं। विधानसभा चुनाव में जनता ने बहुमत देकर भाजपा की सरकार पर भरोसा जताया। गहलोत सरकार की अस्थिरता और नीतियों से तंग आकर आमजन ने भाजपा पर भरोसा जताया। लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने वसुंधरा राजे की जगह भजन लाल शर्मा को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया।
चर्चा है कि इससे भी जनता के बीच गलत संदेश गया है। वसुंधरा राजे को प्रदेश में लोकप्रिय चेहरे के तौर पर देखा जाता रहा है। उनकी नेतृत्व क्षमता प्रभावी और असरदार मानी जाती है। इससे पहले के दो लोकसभा चुनाव राजस्थान से वसुंधरा के नेतृत्व में पार्टी को 25 की 25 सीटें मिली है। क्या इस फैक्टर का आम चुनाव में कोई असर पड़ा है ? आपको बता दें कि बारां-झालावाड़ सीट से वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह चुनाव लड़ रहे हैं। वसुंधरा राजे उनके चुनाव प्रचार में झालावाड़ पर ही फोकस कर रही हैं।
पार्टी में नेतृत्व की कमी
राजस्थान में तीन माह पहले ही राज्य सरकार का गठन हुआ है। प्रदेश की नई सरकार ने अभी ठीक से काम शुरू भी नहीं किया कि लोकसभा चुनाव सामने आ गए। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या प्रदेश में नेतृत्व की कमीं आ गई है। वसुंधरा राजे झालावाड़ में चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी खुद चित्तौड़गढ़ सीट से चुनाव लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।
पार्टी ने संगठन महामंत्री चन्द्रशेखर को तेलंगाना शिफ्ट कर दिया है। प्रदेश में अस्थायी रूप से संगठन मंत्री के तौर पर वी सतीश को भेजा गया है। इसके अलावा मोदी सरकार में प्रदेश से बड़े चेहरे खुद चुनाव लड़ रहे हैं। वे अपनी सीटों पर चुनाव प्रचार में जुटे हैं। ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं में भी उत्साह की कमीं देखने को मिल रही है। हालांकि नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा प्रदेश में धुंआदार जनसभाएं कर रहे हैं। फिर भी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा की कमी हैरान करने वाली है। यह लोकसभा चुनाव प्रदेश के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के लिए बड़ी परीक्षा है।
कांग्रेस का प्रदर्शन
राजस्थान में हाल ही में विधानसभा चुनाव में जनता ने भाजपा पर भरोसा जताकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया है। सत्ता के दौरान अंतर्कलह से जूझ रही कांग्रेस में लोकसभा चुनाव में एकजुटता नजर आ रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सचिन पायलट और प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा चुनाव में एकजुट होकर मेहनत कर रहे हैं। इन नेताओं ने प्रदेश की कई सीटों जहां कांग्रेस को थोड़ी उम्मीद है। वहां प्रतिष्ठा का सवाल बना रखा है।
राजस्थान में तीन सीटों पर इंडिया गठबंधन से चुनाव लड़ा जा रहा है। कांग्रेस और गठबंधन के नेता तीनों सीटों पर मिलकर संभावनाएं तलाश रहे हैं। पहले चरण के बाद प्रदेश में विपक्ष के नेताओं का मनोबल बढ़ा है।
कोर वोट बैंक में हताशा और निराशा
लोकसभा चुनाव के पहले चरण में जो सबसे बड़ी बात देखने को मिली है। वह यह है कि बीजेपी के कोर वोट बैंक में हताशा और निराशा का माहौल है। राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस बार बड़े पैमाने पर भाजपा के कोर वोट बैंक ने मतदान से दूरी बनाए रखी है। वे बताते हैं कि वजह चाहे जो भी हो। लेकिन इन मतदाताओं का चुनाव से दूरी बनाना चिंतनीय है।
वे इसकी एक और बड़ी वजह मानते हैं। उनका कहना है कि भाजपा के 400 पार के नारे ने मतदाताओं के आत्मविश्वास को बढ़ा दिया है। यह भी एक बड़ी वजह हो सकती है कि लोगों ने मतदान से दूरी बनाई हो।
प्रदेश में जातीय समीकरण
विधानसभा चुनाव में भाजपा जातीय समीकरण साधने में सफल रही थी। लेकिन लोकसभा चुनाव में राज्य के जातीय समीकरण डगमगा रहे हैं। इसे लेकर राजनीति के जानकार कहते हैं कि विधानसभा चुनाव क्षेत्रीय चुनाव होते हैं। इसमें जातियां नेताओं के हिसाब से नफा-नुक्सान देखती है। लेकिन लोकसभा चुनाव देश का चुनाव है। इस चुनाव के लिए अलग समीकरण होते हैं।
बता दें कि राजस्थान में राजपूत, जाट, गुर्जर और मीणा समुदाय बड़ी तादाद में हैं। इस लिहाज से इन जातियों का रुख बड़े मायने रखता है। लोकसभा चुनाव के दौरान इन चारों ही प्रमुख जातियों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर नाराजगी नजर आई। राजनीति के विश्लेषकों का मानना है कि इन समुदायों में नाराजगी की सबसे बड़ी वजह सत्ता और संगठन के सभी बड़े पदों पर ब्राह्मण नेताओं को तवज्जो देने के तौर पर उभरकर सामने आई है। वे कहते हैं कि पार्टी के इस फैसले से ऊपर से लेकर नीचे तक नाराजगी है। सत्ता में सभी वर्गों की बराबर हिस्सेदारी होनी चाहिए।
मौसम का मिजाज
राजस्थान में पहले चरण के मतदान में मौसम का भी असर नजर आता है। प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान उस दौर में हो रहा है। जब प्रदेश में गर्मी का मौसम है। अप्रैल, मई और जून में इस राज्य में भीषण गर्मी होती है। मतदाताओं की मतदान के प्रति बेरूखी की यह भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। राजस्थान में मतदान के आंकड़ों में सुबह के समय तेजी दिखाई दी। लेकिन दोपहर होते-होते मतदान प्रतिशत थम सा गया। इसके बाद शाम तक कुछ फीसदी इजाफा दर्ज किया गया। बहरलाल पहले चरण 12 सीटों में प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में बंद हो गया है। जनता सत्ता का सेहरा किसके सिर बांधती है। यह 4 जून को ही स्पष्ट हो पाएगा।
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