क्या प्रशांत किशोर का राजनीतिक करियर IPAC का नोटिस पीरियड बनकर रह गया, भूमिका को लेकर उठ रहे सवाल
राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने साल 2013 में अपने तीन साथियों के साथ मिलकर सिटीजन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस की स्थापना की थी। जो बाद में IPAC में बदल गई। इन दिनों प्रशांत किशोर जन सुराज यात्रा पर हैं। वे अभी बिहार के दरभंगा में पदयात्रा कर रहे हैं। चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर के सामने चुनौतियां बढ़ गई है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि क्या IPAC अब एक चुनाव तक सीमित रह गई है। अब आंध्रप्रदेश और वेस्ट बंगाल के अलावा तीसरा क्लाइंट संभलना मुश्किल लगता है।
क्या प्रशांत किशोर ही थे IPAC
प्रशांत किशोर अपनी सियासी रणनीति के चलते हमेशा सुर्खियों में रहे हैं। लेकिन अब उनकी मुश्किलें बढ़ती जा रही है। सवाल उठ रहे हैं कि आंध्रप्रदेश में क्या भूमिका रही है जो पार्टी अपना केडर नहीं निभा पाई। वहां स्ट्रेटेजी और मीडिया मुख्यमंत्री से लेकर सीनियर नेता ही तय करते आए हैं। कैसे शोटाइम कंसल्टिंग रख पायी है। TDP का नैरेटिव जबकि पार्टी और उसका नेतृत्व राजनीतिक समस्यों में उलझा रहा है। प्रशांत किशोर की इंडिया अलायंस के साथ भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। इंडिया अलायन्स में IPAC की क्या हिस्सेदारी रही है। यहां सुनील कोनुगुलू की माइंडट्री कंसल्टिंग ही पूरी तरीके से काम करती नजर आती रही है। टीम से जुड़े सूत्रों से पता चला है कि IPAC की टीम प्रशांत किशोर से ना ही फीडबैक लेने में रुचि रखती है और अब ना ही उन्हें अपनी प्लानिंग में शामिल करती हैं।

क्या अब कमजोर पड़ते जा रहे हैं प्रशांत किशोर
प्रशांत किशोर के सियासी रणनीतिकार से राजनेता बनने के बाद बनने के बाद IPAC कमजोर हुई है। इस बात को लेकर भी चर्चा है कि ऐसे क्या बदलाव आए जो 2019 के बाद की IPAC का सितारा डूबा। सवाल तो यह भी उठ रहे हैं कि अगर नेता और केडर दोनों ना समझ पाए IPAC का महत्व तो आखिर क्या भविष्य रह जाता है इस संस्था का। क्या बंगाल से बाहर कोई IPAC के लिए उपलब्धियों को बता पाएगा। अब लोग IPAC को प्रशांत किशोर के सियासी कैरियर से भी जोड़कर देख रहे है। ऐसे में चर्चा है कि क्या प्रशांत किशोर का राजनीतिक करियर IPAC का नोटिस पीरियड बनकर रह गया है। सियासी गलियारों में ऐसे कई सवाल डोल रहे हैं जिनके जवाब खुद प्रशांत किशोर अपनी रणनीति से ही दे सकते हैं।












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