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MP के Sihora पर कब चढ़ेगा जिले का जिल्द? घोषणा के दो दशक, जबलपुर के अरमान और एक्सपर्ट व्यू

मध्य प्रदेश में नए जिले बनाने की बयार बह रही हैं। अपने इलाके की मजबूती के लिए कोई इलाका ‘नए जिला’ का तमगा हासिल कर इठला रहा है, तो जबलपुर के सिहोरा के लोग बेचैन हैं। आखिर बीते दो दशक से यह अछूता क्यों रह गया? जानिए वजह

jabalpur

MP's Sihora: मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे है, तो जनता के मुद्दे भी उफनने लगे हैं। जबलपुर में सिहोरा तहसील को जिला बनाने की मांग एक बार फिर गूंजने लगी है। 2003 में हुई घोषणा के बाद से इसे जिले का दर्जा दिलाने अब तक खोखले वादों के सिवाय कुछ नहीं हुआ। रीवा से अलग होकर मऊगंज भी जिला बनने की क़तर में खड़ा होगा, लेकिन सिहोरा को उसके हाल पर छोड़ दिया है। मज़बूरी में इस बार यहां की पब्लिक आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। विधानसभा क्षेत्र में नारा लगना शुरू हो गया है कि- 'नहीं बना जिला, तो ढहा देंगे किला'। गौर करने वाली बात यह है कि जिला के दर्जे से महरूम सिहोरा, किसी वक्त 976 गांवों के साथ राज्य की सबसे बड़ी तहसील मानी जाती थी।

सिहोरा को जिला बनाने फिर सुलगने लगी आग

सिहोरा को जिला बनाने फिर सुलगने लगी आग

एमपी के जबलपुर की 8 तहसीलों में से प्रमुख तहसील सिहोरा को जिला बनाने की मांग फिर बुलंद हो गई है। यह जानते हुए कि सिलसिलेवार चुनावी साल है। यानी अपने हक़ की लड़ाई अभी नहीं, तो फिर कभी नहीं। इसके लिए दो दशक पहले गठित हुई 'जिला सिहोरा आंदोलन समिति' के इंकलाब की आग फिर भड़कना शुरू हो गई है। अर्थी जुलूस निकाले जा रहे है और पुतले फूंके जा रहे हैं। समिति ने यहां 9 अप्रैल को हजारों लोगों के साथ जंगी आन्दोलन करने का ऐलान कर दिया हैं। जिसमें मांग उठा रहे सदस्य किसी भी हद तक जा सकते हैं।

दो दशक में 8 नए जिले, सिहोरा जहां का तहां

दो दशक में 8 नए जिले, सिहोरा जहां का तहां

रीवा जिले से मऊगंज को हटाकर जिस अंदाज में जिला बनाने का फैसला लिया गया। उससे यहां के लोगों के आक्रोश की आग की लपटे और बढ़ गई हैं। 1998 में जब कटनी जिला बना, तो संयुक्त छत्तीसगढ़ के साथ एमपी में कुल 61 जिले थे। दो साल बाद 16 जिलों के साथ छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया। तब मप्र में जिलों की संख्या 45 रह गई थी। मऊगंज को जोड़ लिया जाए तो, तब से अब तक प्रदेश में कुल जिलों की संख्या 53 हो जाती हैं। इन आंकड़ों से भन्नाए सिहोरा के लोगों ने अब अपने इरादे स्पष्ट कर दिए है कि वह किसी कीमत पर न तो झुकेंगे और न ही सियासतदानों की चिकनी-चुपड़ी बातों में आने वाले हैं। यहां कलेक्टर-एसपी की पदस्थापना न होने के नतीजे आगामी विधानसभा चुनाव में दिखाई पड़ सकते हैं।

..तो नहीं बचेगा जबलपुर का आस्त्तिव

..तो नहीं बचेगा जबलपुर का आस्त्तिव

इस मामले पर एक्सपर्ट्स की अलग-अलग राय हैं। जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार चैतन्य भट्ट बताते है कि सिहोरा यदि जिला बना तो उसका गुजर बसर एक विधानसभा पर ही निर्भर रहेगा। मऊगंज की तरह जिले बनाने की घोषणा करना बहुत आसान है। उससे पहले इंफ़्रास्ट्रक्चर की तरफ भी झांकना जरुरी हैं, आने वाले वक्त में उस इलाके का भविष्य क्या होगा? चैतन्य भट्ट का कहना है कि हमेशा कर्ज में डूबे रहने वाली सरकारें ऐसे जिलों का पेट कैसे भरेंगे? चाहे वह प्रशासनिक भूख हो या फिर उस क्षेत्र का विकास? दूसरी बड़ी बात जबलपुर के आस्त्तिव की भी है। सरकार, सिहोरा के हरगढ़ में प्रस्तावित हर्बल पार्क को तक, ठीक ढंग से अमल में ला नहीं पाई और हस्र मनेरी जैसा है। तो ऐसे में जिला स्वरुप में सिहोरा की तस्वीर को पहचानने की भी जरुरत है।

2003 में कैबिनेट से मिल चुकी है मंजूरी

2003 में कैबिनेट से मिल चुकी है मंजूरी

इस वाजिब हक़ के लिए क्षेत्र के कई बुद्धिजीवी सालों से संघर्ष रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े यहां के रहने वाले नरेंद्र त्रिपाठी बताते है कि प्रदेश में कांग्रेस की दिग्विजय सरकार के वक्त सिहोरा को जिला बनाने की घोषणा हुई थी। एक अक्टूबर 2003 को हुई कैबिनेट की बैठक में मंदसौर जिले की गरोठ तहसील के साथ जबलपुर के सिहोरा को जिला बनाने मंजूरी दी। चुनाव की आचार संहिता लग जाने जाने की वजह से तत्कालीन सरकार द्वारा गठित राजनीतिक समिति ने 1 जनवरी 2004 से दोनों तहसीलों के आस्त्तिव में आने का फैसला लिया था।

नोटिफिकेशन भी हो चुका है जारी

नोटिफिकेशन भी हो चुका है जारी

जिला सिहोरा आंदोलन समिति से जुड़े क्षेत्र के विकास दुबे बताते है कि 2003 में सिहोरा और गरोठ को जिला बनाने, जब तत्कालीन कैबिनेट ने मंजूरी दी थी, उसके बाद कई संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन भी हो चुका हैं। दावे-आपत्तियों के बाद सिहोरा जिले की सीमा का भी निर्धारण हुआ। जिसमें पूरा मझौली, ढीमरखेड़ा और बहोरीबंद का क्षेत्र शामिल हुआ। बाकायदा 11 जुलाई 2003 को मध्य प्रदेश के राज पत्र में प्रकाशन भी हुआ। जो आज तक निरस्त नहीं हुआ है। उसके बावजूद बाकी की औपचारिकताओं को पूरा नहीं किया जा रहा हैं।

अड़ंगे की ये है भी है मुख्य वजह

अड़ंगे की ये है भी है मुख्य वजह

इस मुद्दे पर क्षेत्र के कई सामाजिक संगठन एकजुट हैं। क्षेत्रीय निवासी मयंक तिवारी का कहना है कि सिहोरा दो पाटों में फंसा हैं। 1998 में जबलपुर से कटकर कटनी जिला बना। जिसमें जिले के राजस्व का बड़ा आधार माने जाने वाला हिस्सा कटनी के हवाले हो गया। खनिज की खदानों से भरपूर सिहोरा बेल्ट ही अब जबलपुर जिले के राजस्व खजाने की लाज बचाता हैं। दूसरी बड़ी वजह इस जिले की घोषणा को लेकर लगा, कांग्रेस शासन का ठप्पा हैं। कुछ जनप्रतिनिधियों को अपने राजनीतिक हित प्रभावित होने का भी खतरा हैं। मौजूदा सत्ता को लगता है कि यदि सिहोरा को जिला का दर्जा दे दिया गया तो इसका क्रेडिट तत्कालीन दिग्विजय सिंह के वक्त की सरकार को जाएगा। वहीं जबलपुर जिला के राजस्व की भरपाई कहाँ से होगी?

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