Jabalpur News: जलते अंगारों की धूप खप्पर आरती, मां दुर्गा की विदाई में बंगाल के ‘सिंदूर खेला’ की रस्म
जबलपुर, 05 अक्टूबर: शारदेय नवरात्रि के बाद दशहरा आयोजन के हर जगह अलग अलग रंग देखने को मिलते है। इसी कड़ी में मप्र के बेहद ख़ास जबलपुर के दुर्गोत्सव में बंगाल की झलक भी देखने को मिलती है। बंगाली समाज द्वारा रखी जाने वाली दुर्गा प्रतिमाओं की विदाई के वक्त 'सिंदूर खेला' की रस्म अदा की जाती है। सुहागन महिलाएं मूर्ति पूजा के बाद खप्पर धूप आरती ख़ास अंदाज में करते नजर आती हैं।

मानो मैसूर कलकत्ता उतर आया जबलपुर में
मप्र का जबलपुर इकलौता ऐसा शहर है जहां मैसूर और पश्चिम बंगाल जैसे दशहरा दुर्गोत्सव का अहसास होता हैं। जाबालि ऋषि की तपोभूमि संस्कारधानी नाम से विख्यात इस शहर में दुर्गोत्सव पर्व की शुरुआत बंगाली समाज ने ही की थी। जिसका जीवंत उदहारण शहर में आज भी रखी जा रही बंगाली शैली की प्रतिमाएं है। बदलते वक्त के साथ पश्चिम बंगाल के रहने वाले लोगों की संख्या में इजाफा हुआ तो दुर्गोत्सव में भी उस शैली की प्रतिमाओं के रखे जाने का सिलसिला भी बढ़ता चला गया।

‘सिंदूर खेला’ की निभाई जाती है रस्म
जबलपुर का फेमस सिटी बंगाली क्लब भी उन्ही में से है। जहां कई दशकों से दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन होता है। नौ दिन मां दुर्गा की आराधना में लीन समाज के लोग आखिरी दिन यानि दशहरा को माता रानी को विदा कर विसर्जित करते है। उससे पहले यहां सिंदूर उत्सव मनाया जाता है। सुहागन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती है,फिर एक दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख सम्रद्धि की कामना करती है।

खप्पर धूप आरती का विशेष महत्त्व
बंगाली समाज की बबीता घोष ने बताया कि आखिरी दिन विसर्जन के पूर्व मातारानी को प्रसन्न करने विशेष आयोजन होता है। सिंदूर खेला आयोजन के साथ भाव खेलती महिलाएं देखी जा सकती है। साथ ही खाप्पत धूप आरती की जाती है। महिलाएं अलग-अलग अंदाज में जलते अंगारों की धूप को पात्र में रखती है फिर कोई हाथ में धारण करता है तो कोई मुहं में उस पात्र को दांतों से दबाकर अपनी आस्था प्रगट करता है। यह सिलसिला विसर्जन कुंड तक चलता है। जिसमें समाज के हर तबके के लोग शामिल होते है।

नौ दिनों के लिए मायके आती मां दुर्गा
बंगाली समाज द्वारा जबलपुर में पारंपरिक शैली में रखी जाने वाली दुर्गा प्रतिमाओं के बारे में ऐसी मान्यता है कि जगत जननी नौ दिनों के लिए अपने मायके आती है। श्रद्धा भक्ति भाव से नौ दिनों तक उनकी आराधना की जाती है। नौ दिनों में हर दिन अलग-अलग पूजा का विधान निभाया जाता है। फिर आखिरी विसर्जन के दिन सिंदूर उत्सव के साथ मां को विदा करने महिलाएं भी विसर्जन घाट तक जाती है। ढोल नगाड़ों की थाप पर पूरे रास्ते महिलाएं थिरकती है।

1872 से ऐतिहासिक परंपरा
जबलपुर के विचारक और प्रसिद्द लेकर प्रशांत पोल बताते है कि संस्कारधानी में दुर्गोत्सव का आजादी के पहले का सम्रद्ध इतिहास है। 1857 की क्रांति ख़त्म होने के कुछ सालों बाद मुंबई-हावड़ा रेल लाइन बिछाने की नींव रखी गई थी। इस रेल लाइन के बीच में पड़ने वाला जबलपुर शहर का स्टेशन मुख्य जंक्शन था। 1870 में रेल लाइन का काम पूरा होने के बाद जब ट्रेन चलना शुरू हुई तो काम के सिलसिले में कई बंगाली परिवार शहर पहुंचे। दो साल बाद यानी 1872 में ब्रजेश्वर दत्त के यहां मिट्टी की मूर्ति स्थापित हुई। फिर दुर्गोत्सव में दुर्गा प्रतिमाएं रखने का सिलसिला बढ़ता ही चला गया।












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