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एग्गिट पोल की सुनामी तो चुनाव में नहीं दिखी, क्या तेजस्वी की बढ़त ‘एरर ऑफ केलकुलेशन’है?

भारत के चुनावी इतिहास में क्या किसी एलायंस को पिछले चुनाव की तुलना में 20 फीसदी अधिक वोट मिले हैं ? बिहार विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल में महागठबंधन को करीब 44 फीसदी वोट मिलने का अनुमान लगाया है। अगर ऐसा है तो बिहार का यह संभावित जनादेश किसी आठवें आश्चर्य से कम नहीं होगा। पिछले दो चुनावों में राजद और कांग्रेस के वोट शेयर लगभग समान रहे हैं। लालू प्रसाद की मौजूदगी या गैरमौजूदगी का इस पर कोई फर्क नहीं पड़ा। अगर इसमें भाकपा माले के वोट प्रतिशत को भी जोड़ दिया जाय तो तीनों का आंकड़ा करीब 25 फीसदी के आसपास बैठता है। लेकिन ऐस क्या हुआ कि 2020 में इनका मत प्रतिशत 44 फीसदी पर पहुंच गया ? एग्जिट पोल केवल अनुमान हैं। चुनाव से ठीक पहले 22 अक्टूबर को लोकनीति- सीएसडीएस के ओपिनियन पोल में बताया गया था कि नीतीश कुमार की वापसी हो सकती है। इसमें एक अहम बात ये बतायी गयी थी कि 10 फीसदी वोटर ऐसे हैं जिन्होंने अभी ये नहीं तय किया था कि किसको वोट देना है। यानी 10 फीसदी को फ्लोटिंग वोटर के रूप में दर्शाया गया था। किसी चुनाव में 10 फीसदी वोट शेयर के उछाल पर यकीन किया जा सकता है लेकिन 20 प्रतिशत का जंप तो अतिशयोक्तिपूर्ण लग रहा है।

क्या वोट शेयर में 20 फीसदी की उछाल संभव है ?

क्या वोट शेयर में 20 फीसदी की उछाल संभव है ?

2010 में राजद को 18.84 और कांग्रेस को 8.38 फीसदी वोट मिले थे। 2015 में राजद को 18.4 तो कांग्रेस को 6.7 फीसदी वोट मिले थे। 2015 में भाकपा माले को 1.5 फीसदी वोट मिला था। इन तीनों का सम्मिलित वोट शेयर 25.16 फीसदी हुआ। 2020 के एग्जिट पोल में इनको करीब 44 फीसदी वोट मिलता हुआ दिखाया जा रहा है। ये आंकड़े तो लहर नहीं बल्कि तूफान के संकेत हैं। लेकिन हकीकत ये है कि चुनाव के दौरान कोई हवा तक महसूस नहीं की गयी। महागठबंधन को 44 फीसदी वोट तभी मुमकिन है जब सवर्ण और अतिपिछड़े वोटरों ने भी इसे थोक में वोट दिया हो। नीतीश कुमार ने अतिपिछड़े समुदाय के पांच लोगों के सांसद बना कर उनका दिल जीत था। क्या इतनी आसानी से अतिपिछड़ों ने नीतीश क साथ छोड़ दिया ? क्या यह मुमकिन है ? सी वोटर एग्जिट पोल एजेंसी के प्रमुख यशवंत देशमुख का कहना है कि इस बार सवर्ण युवा वोटरों की एक तादाद ने महागठबंधन को समर्थन दिया है। वैचारिक रूप से यह अविश्वसनीय लगता है।

क्या 10 लाख नौकरी के वादे ने कमाल किया ?

क्या 10 लाख नौकरी के वादे ने कमाल किया ?

एग्जिट पोल के मुताबिक 10 लाख सरकारी नौकरी का वादा तेजस्वी के लिए गेमचेंजर साबित हुआ। अगर नौकरी देने पर वोट की गारंटी होती तो सबसे अधिक जनसमर्थन पुष्पम प्रिया को मिलना चाहिए था। पुष्पम प्रिया ने तो 80 लाख रोजगार देने की बात कही थी। उन्होंने इसके लिए खाका भी पेश किया था। लेकिन पुष्पम की तो कहीं चर्चा भी नहीं हो रही। भाजपा ने भी 19 लाख रोजगार देने क वादा किया था। लेकिन भाजपा को तो पिछड़ता हुआ दिखाया जा रहा है। इस सवाल के उठाने पर एग्जिट पोल के विश्लेषक ये कहते हैं कि चूंकि सबसे पहले तेजस्वी ने पासा फेंका इसलिए केवल उन्हें ही इसका फायदा मिला। ये तो वही बात हो गयी जैसे कोई गारमेंट सेल में ये कहे कि पहले आओ, पहले पाओ नहीं तो बाद में पछताओ। क्या वोटरों ने तेजस्वी की 10 लाख नौकरी पर भरोसा कर लिया और 80 लाख की नौकरी के ऑफर को ठुकरा दिया ?

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    एग्जिट पोल के अलग-अलग संकेत

    एग्जिट पोल के अलग-अलग संकेत

    आठ एग्जिट पोल में से 4, महागठबंधन की सरकार बनती दिखा रहे हैं जब कि 4 त्रिशंकु विधानसभा या एनडीए के पक्ष में संकेत दे रहे हैं। इसलिए किसी एक नतीजे पर पहुंचने में मुश्किल दिखायी पड़ रही है। यानी एक संभावना यह भी हो सकती है कि किसी गठबंधन को बहुमत न मिले। अब सवाल ये है कि आखिर किसी एजेंसी के सर्वे को सही माना जाय ? 2015 के विधानसभा चुनाव में आजतक-सिसरो एग्जिट पोल में एनडीए को बहुमत मिलने की बात कही गयी थी। महागठबंधन का पिछड़ता दिखाया गया था। लेकिन जब वोटों की गिनती हुई तो महागठबंधन बाजी मार ले गया और एनडीए औंधे मुंह नीचे गिर पड़ा। टुडेज चाणक्या के एग्जिट पोल में भी एनडीए को बहुमत मिलने का संकेत दिया गया था लेकिन यह भी गलत साबित हुआ था। 2015 के एग्जिट पोल में भाजपा के लिए जितनी सीटों का अनुमान लगाया गया था हकीकत में वह इसके आसपास भी नहीं रही थी। एग्जिट पोल केवल अनुमान हैं। कौन सही होगा और कौन गलत, यकीन से कुछ नहीं कहा जा सकता।

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