'पृथ्वी के सूरज' के शक्तिशाली चुंबक का काम पूरा, अकेले ही विमानवाहक पोत को उठाने की रखता है क्षमता
नई दिल्ली, 10 सितंबर: इंसानों ने बिजली उत्पादन के लिए बहुत से स्त्रोत तैयार कर लिए हैं, लेकिन उनमें हर स्त्रोत पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे कि अगर जल्द ही स्वच्छ ऊर्जा के स्त्रोत को नहीं तैयार किया गया, तो इंसानों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। इसी मुद्दे को देखते हुए कई देश मिलकर एक स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की मशीन तैयार कर रहे हैं, जो भविष्य की तस्वीर बदलकर रख देगा। इसे 'पृथ्वी का सूरज' (Sun on Earth) भी कहा जा रहा है।

35 देश प्रोजेक्ट में शामिल
वैज्ञानिक पिछले 10 सालों से एक विशेष प्रकार का मैग्नेट तैयार करने में जुटे हैं, जो विशालकाय मशीन इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (आईटीईआर) का हिस्सा है। गुरुवार को वैज्ञानिकों के हाथ एक बड़ी कामयाबी लगी, जहां विशाल चुंबक के पहले हिस्से की डिलीवरी हुई। इसकी क्षमता इतनी ज्यादा है कि ये एक अमेरिकी विमानवाहक पोत को भी आसानी से उठा सकता है। इस चुंबक की लंबाई 60 फीट और चौड़ाई 14 फीट है। जिसे प्रोजेक्ट में शामिल 35 देशों ने तैयार किया है।

नहीं निकलेगा विनाशकारी कचरा
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों और एक निजी कंपनी ने इस हफ्ते घोषणा की थी कि उन्होंने दुनिया के सबसे मजबूत उच्च तापमान सुपरकंडक्टिंग चुंबक का सफल परीक्षण कर लिया है। ये पृथ्वी के सूरज को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक परमाणु रिएक्टर ऊर्जा उत्पादन के साथ बहुत ज्यादा विनाशकारी कचरे का उत्पादन करते हैं, लेकिन उनका ये उपकरण स्वच्छ और असीमित ऊर्जा का उत्पादन करेगा।

2026 तक काम करने लगेगा रिएक्टर
आईटीईआर के प्रवक्ता लाबन कोब्लेंट्ज़ ने कहा कि आईटीईआर अब 75 प्रतिशत पूरा हो चुका है। उम्मीद है कि 2026 तक इसका रिएक्टर काम करने लगेगा। सेंट्रल सोलनॉइड का पहला मॉड्यूल वैज्ञानिकों के आत्मविश्वास को बढ़ा रहा है। देखा जाए तो ये पूरी मशीन जटिल इंजीनियरिंग का नायाब नमूना है। इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य 2035 तक प्लाज्मा को गर्म कर 10 गुना ज्यादा एनर्जी का उत्पादन करना है।

ये हैं खासियतें?
इसके ताकत की बात करें, तो इसमें हाइड्रोजन प्लाज्मा को 150 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक हीट किया जा सकता है, जो सूरज के भीतरी भाग से 10 गुना ज्यादा गर्म होगा। सबसे खास बात तो ये है कि इस मशीन के चलने से ना तो ग्रीनहाउस गैस (कार्बन डाई आक्साइड, नाइट्रस आक्साइड, मीथेन आदि) का उत्सर्जन होगा और ना ही इससे रेडियोएक्टिव कचरा निकलेगा। जिससे प्रदूषण को काफी हद तक कम करके स्वच्छ ऊर्जा बनाई जाएगी। इन्हीं सब खासियतों को देखते हुए इसे पृथ्वी का सूरज कहा जा रहा है।

कितना आ रहा खर्च?
इस पर 24 बिलियन डॉलर्स का खर्च आने की उम्मीद है। भारत के हिसाब से ये राशि 17 खरब रुपये होगी। वहीं इस प्रोजेक्ट में भारत, चीन, जापान, कोरिया, रूस, यूके, अमेरिका और स्विट्जरलैंड जैसे 35 देशों से मदद ली जा रही है।
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