पाकिस्तान को इस बार क्या सऊदी अरब और चीन भी नहीं बचा पाएंगे

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पाकिस्तान चौतरफ़ा संकट से घिरता जा रहा है. पाकिस्तान पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि यह संकट संभवतः 1971 से भी ज़्यादा बदतर है.

1971 में ही पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हुआ था. पिछले हफ़्ते पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और आर्मी प्रमुख सैयद आसिम मुनीर यूएई गए थे और दोनों ने आर्थिक मदद की गुहार लगाई थी.

शहबाज़ शरीफ़ ने बताया था कि यूएई ने दो अरब डॉलर के क़र्ज़ भुगतान की मियाद बढ़ाने और एक अरब डॉलर का अतिरिक्त क़र्ज़ देने का वादा किया है. पाकिस्तान ख़ुद को किसी भी तरह डिफ़ॉल्ट होने से बचाने की कोशिश कर रहा है.

शहबाज़ शरीफ़ ने पिछले साल अप्रैल में प्रधानमंत्री बनने के बाद मिफ़्ताह इस्माइल को वित्त मंत्री बनाया था. अब पाकिस्तान के वित्त मंत्री शहबाज़ शरीफ़ के बड़े भाई नवाज़ शरीफ़ के वफ़ादार इशाक़ डार हैं.

मिफ़्ताह इस्माइल ने कहा है कि पाकिस्तान पर दुनिया का क़र्ज़ क़रीब 100 अरब डॉलर है और इस वित्तीय वर्ष में 21 अरब डॉलर का क़र्ज़ चुकाना है. अगले तीन सालों तक क़रीब 70 अरब डॉलर का क़र्ज़ पाकिस्तान को चुकाना है.

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के पास विदेशी मुद्रा महज़ 4.3 अरब डॉलर बची है. यह पिछले नौ सालों में सबसे निचले स्तर पर है. 4.3 अरब डॉलर में पाकिस्तान अपने एक महीने का आयात बिल भी नहीं भर सकता है.

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चौतरफ़ा संकट में घिरा पाकिस्तान

पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था बुरी तरह से आयात पर निर्भर है. सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के कई ऐसे वीडियो पोस्ट किए जा रहे हैं जिनमें दिख रहा है कि खाने-पीने के सामान के लिए लोग आपस में लड़ रहे हैं. एक व्यक्ति की इसमें मौत भी हो गई थी.

पाकिस्तानी लेखक और सिटीग्रुप इमर्जिंग मार्केट्स इन्वेस्टमेंट के पूर्व प्रमुख यूसुफ़ नज़र ने लिखा है कि अर्थव्यवस्था पर लिखने वाले पाकिस्तान की समस्या को महज़ दो मोर्चो पर देखते हैं- एक चालू खाता घाटा और दूसरा राजस्व घाटा.

{image-"पाकिस्तान पर दुनिया का क़र्ज़ क़रीब 100 अरब डॉलर है और इस वित्तीय वर्ष में 21 अरब डॉलर का क़र्ज़ चुकाना है. अगले तीन सालों तक क़रीब 70 अरब डॉलर का क़र्ज़ पाकिस्तान को चुकाना है.", Source: मिफ़्ताह इस्माइल, Source description: पाकिस्तान के पूर्व वित्त मंत्री, Image: मिफ़्ताह इस्माइल hindi.oneindia.com}

यूसुफ़ नज़र ने लिखा है, ''पाकिस्तान महज़ इन दो समस्याओं से नहीं जूझ रहा है. पाकिस्तान बौद्धिक दिवालियापन, सेना की अदूरदर्शिता, राजनीतिक, बिज़नेस और संभ्रांत वर्ग के पास ज़मीन के स्वामित्व जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है.

अमेरिकी अर्थशास्त्री विलियम इस्टर्ली ने कहा था कि पाकिस्तान की राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था विरोधाभासी है. यहां प्रगति नहीं है. पिछले 25 सालों से प्रगति यहाँ अटकी रही.''

यूसुफ़ नज़र ने लिखा है, ''25 साल पहले पाकिस्तान में प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत की तुलना में 46 फ़ीसदी ज़्यादा थी जो कि अब 20 फ़ीसदी कम हो गई है. आख़िर क्या ग़लत हुआ? बर्लिन की दीवार गिरने के बाद पूरी दुनिया वैश्वीकरण के रास्ते पर बढ़ी. भारत, चीन और बांग्लादेश ने इसका फ़ायदा उठाया.

लेकिन पाकिस्तान की नींद नहीं खुली. भारत, चीन और बांग्लादेश ने वैश्वीकरण के हिसाब से अपनी नीतियां बनाईं और मौक़े को भुनाया. वहीं पाकिस्तान दुनिया को शीत युद्ध वाली मानसिकता से ही देखता रहा. पाकिस्तान को लगा कि उसे विदेशी मदद मिलती रहेगी.''

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यूसुफ़ नज़र ने लिखा है, ''मिसाल के तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान ने कैसे अपनी नीति का दुरुपयोग किया. अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान की नीति रणनीतिक रूप से किसी आपदा की तरह रही है. दो दशकों तक तालिबान का समर्थन करते रहे और अगस्त 2021 में में तालिबान सत्ता में लौटा तो इसका जश्न मनाया गया.

तालिबान के लौटने पर इमरान ख़ान ने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान के लोगों ने ग़ुलामी की बेड़ियां तोड़ दी हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया.''

पटना में एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज के निदेशक रहे और अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, ''पाकिस्तान को पश्चिम अब मदद नहीं कर रहा है. वो दिन भी दूर नहीं है जब सऊदी अरब और चीन भी मदद नहीं करेंगे. बिना अपने हितों को सुरक्षित किए कोई भी मुफ़्त में मदद नहीं करता है.''

{image-"पाकिस्तान आईएमएफ़ से फंड लेने के लिए उसकी शर्तों के हिसाब से आर्थिक सुधार की बात मान लेता है लेकिन आईएमएफ़ प्रोग्राम ख़त्म होते ही फिर से पुरानी राह अपना लेता है.", Source: मलीहा लोधी, Source description: पाकिस्तान की पूर्व राजनयिक, Image: मलीहा लोधी hindi.oneindia.com}

''केवल पाकिस्तान की बात नहीं है. पूरे दक्षिण एशिया का यही हाल है. भारत की स्थिति भी 1991 में यही थी और आने वाले दिन भारत के लिए भी अच्छे नहीं हैं. पूरा दक्षिण एशिया पश्चिम का उपभोक्ता बना हुआ है. उपभोक्ता तभी तक उपभोग करता है, जब तक उसके पास पैसे होते हैं.

पाकिस्तान का व्यापार घाटा बढ़ रहा है और भारत का भी अच्छा नहीं है. भारत भले तीन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन गई है और ब्रिटेन पीछे छूट गया है, लेकिन ब्रिटेन में प्रति व्यक्ति आय की तुलना भारत से कर लीजिए तो पता चल जाएगा कि हम कहाँ टिकते हैं.''

प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, ''हम दुनिया के बाज़ार बने हुए हैं. हम कुछ बेच नहीं रहे हैं बल्कि ख़रीद रहे हैं. हमें बताया जा रहा है कि पाकिस्तान दुश्मन है और हथियार बेचने वाला दोनों देशों को हथियार दे रहा है. हमें बुनियादी चीज़ें समझने की ज़रूरत है, लेकिन कोई समझने के लिए तैयार नहीं है.''

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भारत की भी हुई थी पाकिस्तान जैसी हालत

जून 1991 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग ख़ाली हो चुका था. एक अरब डॉलर से भी कम बचा था. ये डॉलर महज़ 20 दिनों के तेल और फ़ूड बिल के भुगतान में ख़त्म हो जाते.

भारत के पास इतनी विदेशी मुद्रा भी नहीं थी कि बाक़ी दुनिया से कारोबार कर सके. भारत का विदेशी क़र्ज़ 72 अरब डॉलर पहुँच चुका था. ब्राज़ील और मेक्सिको के बाद भारत तब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क़र्ज़दार देश था.

देश की अर्थव्यवस्था और सरकार से लोगों का भरोसा ख़त्म होने लगा था. महंगाई, राजस्व घाटा और चालू खाता घाटा दोहरे अंक में पहुँच गए थे.

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1990 में भारत के आर्थिक संकट में समाने की कुछ वजहें अन्तरराष्ट्रीय भी थीं. 1990 में गल्फ़ वॉर शुरू हुआ और इसका सीधा असर भारत पर पड़ा. वैश्विक स्तर पर तेल की क़ीमतें बढ़ गईं और इसकी चपेट में भारत भी आ गया.

1990-91 में पेट्रोलियम आयात बिल दो अरब डॉलर से बढ़कर 5.7 अरब डॉलर हो गया. ऐसा तेल की क़ीमतें बढ़ने और आयात के वॉल्यूम में वृद्धि के कारण हुआ.

इसका सीधा असर भारत के व्यापार संतुलन पर पड़ा. इसके अलावा खाड़ी के देशों में काम करने वाले भारतीयों की कमाई भी बुरी तरह से प्रभावित हुई और इससे विदेशों से आने वाला रेमिटेंस प्रभावित हुआ. भारत में उस वक़्त राजनीतिक अनिश्चितता भी बढ़ गई थी. 1990 से 91 के बीच राजनीतिक अस्थिरता चरम पर रही.

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1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने गठबंधन सरकार बनाने से इनकार कर दिया था. इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी जनता दल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाई.

लेकिन यह गठबंधन सरकार जाति और मज़हब की लड़ाई में फँस गई. देश के कई हिस्सों में हिंसा हुई. दिसंबर, 1990 में वीपी सिंह को इस्तीफ़ा देना पड़ा. मई 1991 में आम चुनाव होने तक केयरटेकर सरकार रही. इसी राजनीतिक अस्थिरता के बीच 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या कर दी गई.

ऐसी स्थिति में भारत की अर्थव्यवस्था घुटने टेक चुकी थी. एनआरआई अपना पैसा निकालने लगे थे और निर्यातकों को लगने लगा था कि भारत उनका उधार नहीं चुका पाएगा. महंगाई सातवें आसमान पर थी. तेल की क़ीमतें बढ़ाई गईं, आयात रोका गया, सरकारी खर्चों में कटौती की गई और रुपए में 20 फ़ीसदी तक का अवमूल्यन किया गया. बैंकों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की.

आईएमएफ़ ने भारत को 1.27 अरब डॉलर का क़र्ज़ दिया. लेकिन इससे हालात नहीं सुधरे. वित्तीय वर्ष 1991 के अंत तक चंद्रशेखर की सरकार 20 टन सोना गिरवी रखने पर मजबूर हुई.

जब पीवी नरसिम्हा राव 21 जून 1991 में प्रधानमंत्री बने तो ऐसा लग रहा था कि भारत विदेशी क़र्ज़ तय तारीख़ पर नहीं चुका पाएगा और डिफ़ॉल्टर घोषित हो जाएगा. लेकिन पीवी नरसिम्हा राव ने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के ज़रिए कई सुधारों को अंजाम दिया और भारतीय अर्थव्यवस्था में संरचनागत बदलाव की बदौलत चीज़ें नियंत्रित हो पाईं.

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क़र्ज़ के भरोसे चलता रहा पाकिस्तान

अमेरिका, ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की राजदूत रहीं मलीहा लोधी ने 16 जनवरी को पाकिस्तान के अंग्रेज़ी अख़बार डॉन में पाकिस्तान के दिवंगत अर्थशास्त्री मीकाल अहमद के उद्धरण का उल्लेख किया है. मीकाल अहमद ने कहा था, ''पाकिस्तान आईएमएफ़ से फ़ंड लेने के लिए उसकी शर्तों के हिसाब से आर्थिक सुधार की बात मान लेता है, लेकिन आईएमएफ़ प्रोग्राम ख़त्म होते ही फिर से पुरानी राह अपना लेता है.''

मलीहा लोधी ने लिखा है कि यह बात मीकाल अहमद ने 23 साल पहले कही थी, लेकिन पाकिस्तान में दो दशक बाद भी कुछ नहीं बदला है. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो पाकिस्तान में चाहे सेना की सरकार रही हो या सिविलियन सरकार किसी ने अर्थव्यवस्था की असल बीमारी ठीक करने की कोशिश नहीं की.

मलीहा लोधी ने लिखा है, ''पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की विदेशी मदद और क़र्ज़ से निर्भरता कभी ख़त्म नहीं हुई. किसी ने आर्थिक संप्रभुता के लिए ईमानदार कोशिश नहीं की. हद तो यह हो गई है कि दोस्त देशों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से क़र्ज़ लेने का जश्न सरकार मना रही है. यहां तक कि मीडिया में भी क़र्ज़ मिलने की ख़ुशी मनाई जा रही है. विदेशी क़र्ज़ों से देश का आर्थिक संकट ख़त्म नहीं होने जा रहा है.''

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मलीहा लोधी का कहना है, ''शीत युद्ध के दौरान पाकिस्तान अमेरिकी खेमे में था. ऐसे में पाकिस्तान को उस दौर में पश्चिम से सस्ता और आसान क़र्ज़ मिल जाता था. पाकिस्तान की सरकारों ने इन क़र्ज़ों को ही समाधान मान लिया और कोई आर्थिक सुधार नहीं किया.

इन्हें लगा कि जो टैक्स मिल रहा है, वो पर्याप्त है. विकास और उपभोग दोनों के मामले में पाकिस्तान की निर्भरता विदेशी क़र्ज़ों और मदद पर बढ़ती गई.''

''अमेरिका से शीत युद्ध की दोस्ती सैन्य गठजोड़ में भी आई. इसके बाद 1980 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत यूनियन के हमले के ख़िलाफ़ पाकिस्तान को पश्चिम से आर्थिक मदद मिलती रही.

9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को सामरिक रूप से अहम माना और आर्थिक पैकेज मिलता रहा. अमेरिका की मदद से आईएमएफ़ भी पाकिस्तान की मदद करता रहा और क़र्ज़ चुकाने की मियाद बढ़ती रही.''

शीत युद्ध, अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत यूनियन का हमला और 9/11 हमले के दौरान पाकिस्तान की जनरल ज़िया-उल हक़ से लेकर परवेज़ मुशर्रफ़ की सरकार विदेशी मदद के दम पर आगे बढ़ती रही.

जब तक पश्चिम की मदद मिलती रही तब तक लगा कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कोई मसला नहीं है. लेकिन क़र्ज़ और विदेशी मदद के दम पर जारी प्रगति टिकाऊ नहीं होती है. मदद रुकते ही ग़ुब्बारे से हवा निकलने लगती है.

कहा जाता है कि पाकिस्तान ने कभी अपनी अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याओं की ओर नहीं देखा.

मलीहा लोधी कहती हैं, ''विदेशी क़र्ज़ों की उपलब्धता और विदेशों में रह रहे पाकिस्तानियों की देश में आने वाली कमाई को ही समाधान मान लिया गया और कोई आर्थिक सुधार नहीं किया गया. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की स्ट्रक्चरल समस्या से कभी टकराने की कोशिश नहीं की गई.

इसका नतीजा यह हुआ कि जब पश्चिम से आसान और सस्ते क़र्ज़ बंद हो गए तो उसकी जगह महंगे विदेशी क़र्ज़ों ने ले ली. क़र्ज़ आधारित ग्रोथ न केवल अल्पकालिक होती है बल्कि इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है. पाकिस्तान क़र्ज़ों के जाल में फँसता चला गया.''

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पाकिस्तान पर बढ़ता विदेशी क़र्ज़

पाकिस्तान के अर्थशास्त्री साकिब शहरानी का कहना है कि अगले दो सालों में हर साल पाकिस्तान को 20-20 अरब डॉलर से ज़्यादा क़र्ज़ का भुगतान करना है.

साकिब ने अल-जज़ीरा से कहा है, ''2017 में हमारा वार्षिक क़र्ज़ भुगतान सात अरब डॉलर के क़रीब था. इस साल और अगले साल हमें 20-20 अरब डॉलर से ज़्यादा भुगतान करने हैं. क़र्ज़ चुकाने के लिए भी क़र्ज़ लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. लेकिन ये सब उपाय टिकाऊ नहीं हैं.

सरकार को अब स्पष्ट आर्थिक नीति बनाने की ज़रूरत है. यह सरकार इस समस्या को सियासी चश्मे से देख रही है. ये इस साल जून-जुलाई तक टालना चाहते हैं. जून-जुलाई में ही इस सरकार का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है.

मलीहा लोधी मानती हैं कि पाकिस्तान की पश्चिम पर निर्भरता अब रणनीतिक साझीदार चीन, सऊदी अरब और खाड़ी के देशों पर शिफ़्ट हो गई है. अब पश्चिम के बदले ये देश ही पाकिस्तान को डिफ़ॉल्ट होने से बचा रहे हैं. हाल ही में सऊदी अरब और यूएई ने पाकिस्तान के लिए क़र्ज़ अदायगी की मियाद बढ़ाने और नया क़र्ज़ देने की घोषणा की है.

पाकिस्तान डॉलर बचाने के लिए आयात को सीमित कर रहा है. यहाँ तक कि मैन्युफ़ैक्चरिंग के सामान को भी ख़रीदने से परहेज़ किया जा रहा है. इसका नतीजा यह हुआ कि कई फ़ैक्ट्रियों को बंद करना पड़ा. पिछले हफ़्तों में पाकिस्तान में स्थानीय कार प्लांट टोयोटा मोटर और सुज़ुकी मोटर ने अपना उत्पादन रोक दिया था. इसके अलावा टेक्स्टाइल और अन्य मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर की भी यही हालत है.

अमेरिका के डेलावेयर यूनिवर्सिटी में भारतीय मूल के प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान का कहना है कि पाकिस्तान जिस तरह एक के बाद एक संकट से घिरता जा रहा है, उन्हें ठीक नहीं किया गया तो उसके टूटने का ख़तरा बढ़ सकता है.

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