फ्रांस जैसा डिफेंस पार्टनर बन पाएगा जर्मनी..? राजदूत ने दिए संकेत, लेकिन क्या भारत का जीत पाएगा विश्वास..
Germany India Military Ties: जर्मनी ने संकेत दिए हैं, कि वो भारत के साथ अपनी सैन्य भागीदारी को उच्च स्तर पर ले जाना चाहता है, यानि जर्मनी ने संकेत दिए हैं, कि वो भारत के साथ डिफेंस पार्टनरशिप को नेक्स्ट लेवल पर ले जाना चाहता है, लेकिन क्या ये संभव है?
क्योंकि, जर्मनी अपने डिफेंस सेक्टर में अपने धीमेपन के लिए बदनाम रहा है। जर्मनी में डिफेंस सेक्टर के लिए जो बजट आवंटित किए जाते हैं, वो सालों तक यूंही पड़े रहते हैं, लेकिन इसके बावजूद जर्मन डिफेंस मिनिस्टर बोरिस पिस्टोरियस की लोकप्रियता उच्चतम स्तर पर बनी हुई है।

लेकिन जर्मनी ने अब अपनी रक्षा क्षमताओं, सैन्य तैनाती, सैन्य तैयारी और उत्पादन के साथ-साथ रक्षा उत्पादन को भी ज्यादा गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है, क्योंकि अब जर्मनी महसूस कर रहा है, कि वर्षों से शांति ने जर्मनी के डिफेंस सेक्टर में एक गहरा अंतर पैदा कर दिया है, जिसे भरने की जरूरत है, जिसमें भारत के साथ डिफेंस पार्टनरशिप भी शामिल है।
भारत-जर्मनी डिफेंस पार्टनरशिप
यूक्रेन संकट में जर्मनी की भागीदारी के बीच, भारत और जर्मनी ने 27 फरवरी को बर्लिन में उच्च रक्षा समिति (एचडीसी) की बैठक की थी। भारतीय रक्षा सचिव गिरिधर अरामाने ने अपने समकक्ष, जर्मन रक्षा राज्य सचिव बेनेडिक्ट जिमर से मुलाकात की थी। जिसमें द्विपक्षीय सुरक्षा और रक्षा मुद्दों की सामान्य श्रृंखला पर चर्चा की गई। इस बैठक में भारत और जर्मनी के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में रक्षा सहयोग के तेजी से विकास पर जोर दिया गया।
जर्मन अधिकारी ने क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति पर अपने विचार रखे, खास तौर पर उन सेक्टर्स में, जहां मुख्य रूप से जर्मनी के लिए यूक्रेन और भारत के लिए इंडो-पैसिफिक में जहां खतरा है। हालांकि, भारत, यूक्रेन को लेकर किसी भी रक्षा संबंधी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेगा।
जर्मनी, इंडो-पैसिफिक में संयुक्त अभ्यास में ज्यादा सशक्त रूप से हिस्सा लेना चाहता है और भारतीय और जर्मन नौसेना, पहले ही लाल सागर के आसपास के क्षेत्र में समुद्री डकैती के खिलाफ संयुक्त अभियान चला चुकी है। ये संयुक्त अभ्यास तब होते हैं, जब जर्मन जहाज इस क्षेत्र का दौरा करते हैं।
क्या भारत को डिफेंस टेक्नोलॉजी देगा जर्मनी?
भारत और जर्मनी के अधिकारियों के बीच हुई बैठक में रक्षा उत्पादन उद्योगों के बीच बेहतर रक्षा साझेदारी और जुड़ाव की आवश्यकता पर चर्चा की गई। उन्होंने कई संभावित रक्षा परियोजनाओं, विशेष रूप से पनडुब्बियों, टैंकों और इलेक्ट्रॉनिक और साइबर-संबंधित उपकरणों को लेकर चर्चा की। खासकर, भारत के रक्षा उत्पादन उद्योग के विकास में योगदान देने वाली हाई जर्मन टेक्नोलॉजी पर ध्यान केंद्रित किया गया।
हालांकि, फरवरी 2023 में प्रधानमंत्री मोदी और जर्मन चांसलर स्कोल्ज़ के बीच हुए शिखर सम्मेलन के बाद भारत और जर्मनी के बीच रक्षा जुड़ाव धीमा हो गया था। लेकिन, 2023 के मध्य में जर्मन रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस की भारत यात्रा ने सुस्ती को फिर से रफ्तार दे दिया।
भारत-जर्मनी सैन्य सहयोग उपसमूह की 16वीं बैठक दिसंबर की शुरुआत में आयोजित की गई थी। एमसीएफजी मुख्यालय एकीकृत रक्षा कर्मचारियों और जर्मन सशस्त्र बलों के अंतर्राष्ट्रीय सहयोग विभाग के बीच नियमित जुड़ाव के माध्यम से रक्षा सहयोग को बढ़ावा देने के लिए स्थापित मंच है।
वहीं, अब जर्मनी के राजदूत ने हाल ही में एक भारतीय न्यूजपेपर को दिए गये इंटरव्यू में भारत और जर्मनी के बीच रणनीतिक सहयोग के उन पहलुओं की तरफ ध्यान देने की बात कही है, जिसपर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया।
जर्मन राजदूत का संदेश था, कि जर्मनी अब रणनीतिक रक्षा सहयोग बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहा है, जो तीन-आयामी होगा। यानि, ज्यादा से ज्यादा सैन्य अभ्यास, रक्षा उपकरणों की बिक्री में तेजी और पनडुब्बियों के निर्माण को लेकर हाई टेक्नोलॉजी हार्डवेयर के उत्पादन पर ध्यान देना।
राजदूत का संदेश था, कि जर्मनी की झिझक दूर हो गई है और अब राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उन्होंने इसका श्रेय जर्मनी को नाटो के बाहर, खासकर एशिया और इंडो-पैसिफिक में साझेदार तलाशने को दिया। इस संदर्भ में भारत को समान मूल्यों वाले एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में देखा जाता है।
जर्मनी से क्या उम्मीद की जा सकती है?
इस साल अगस्त में तमिलनाडु में भारत में कई देशों का शक्ति सैन्य अभ्यास होने वाला है, जिसमें 12 टॉरनेडो जेट, 8 यूरोफाइटर्स, कई एयरबस 300 मिड-एयर ईंधन भरने वाले टैंकर और एयरबस 400M सैन्य परिवहन विमानों सहित 32 जर्मन वायु सेना के विमान भाग लेने वाले हैं।
जर्मन दल के साथ कॉर्डिनेशन में 15 फ्रांसीसी और स्पेनिश विमानों के भाग लेने की उम्मीद है। अक्टूबर में, एक जर्मन फ्रिगेट और लड़ाकू सहायता जहाज के भी गोवा का दौरा करने की उम्मीद है।

ऐसे अभियानों में वे आम तौर पर अदन की खाड़ी, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के आसपास और दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक में भारतीय जहाजों के साथ युद्धाभ्यास होगा।
जर्मनी अब स्पष्ट रूप से इंडो-पैसिफिक में भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ अपनी अंतरसंचालनीयता बढ़ाना चाहता है। फ्रांस इस क्वाड प्लस दृष्टिकोण का पालन कर रहा है, और जर्मनी भी इसका पालन करने के लिए तैयार है।
वहीं, जहां तक रक्षा उत्पादन का सवाल है, भारत के 6 एडवांस स्टील्थ डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के निर्माण प्रोजेक्ट में जर्मनी ने वापस दिलचस्पी दिखा दी है। अब वे एक स्पेनिश डिफेंस कंपनी के साथ प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन जब बोरिस पिस्टोरियस ने 2023 में भारत का दौरा किया, तो थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स ने मझगांव डॉकयार्ड के साथ एक उत्पादन सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।
हालांकि, कुछ भारतीय विश्लेषकों का मानना है, कि जर्मन उत्साह वास्तविक है, लेकिन क्या उनके पास भारत में इसे आगे बढ़ाने की सही रणनीति है? उनका मानना है, कि उनकी पनडुब्बियां स्पैनिश पनडुब्बियों से बेहतर हैं, लेकिन भारत में तकनीक के अलावा उत्पादन की लागत और उनके निर्माण की गति भी मायने रखती है।
निश्चित तौर पर, जर्मनी की तुलना फ्रांस से की जाती है, जो वर्तमान में भारत का सबसे मजबूत और विश्वसनीय डिफेंस पार्टनर बन चुका है, लेकिन जर्मनी के इतिहास को देखते हुए भारत का विश्वास जीतना उसके लिए मुश्किल होगा। और जर्मनी ने हालिया समय में कोई बड़ा डिफंस समझौता भी नहीं किया है। लिहाजा, जर्मनी को फिर से भारत का विश्वास जीतने की जरूरत होगी और तभी जाकर वो फ्रांस जैसा विश्वसनीय डिफेंस पार्टनर बन पाएगा।
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